रायगढ़

रायगढ़ में फर्जी आरसी का जाल: परिवहन विभाग की निष्क्रियता से बढ़ रही संगठित चोरियां?

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आखिर कब जागेगा विभाग? परिवहन मंत्री केदार कश्यप की कार्यवाही का इंतजार की घड़ी कब होगी खतम?

रायगढ़@टक्कर न्यूज :- क्या परिवहन विभाग की लापरवाही आम नागरिकों की सुरक्षा को खतरे में डाल रही है? हाल ही में पुलिस द्वारा पर्दाफाश किए गए एक बड़े बाइक चोरी गिरोह ने इस सवाल को फिर से उठा दिया है। गिरोह ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए चोरी की बाइकों को वैध दिखाकर बाजार में बेचा, लेकिन विभाग की ओर से अब तक कोई जांच या कार्रवाई का नामोनिशान नहीं। जिले में 24 लोक सेवा केंद्र (PSK) होने तथा कुछ को सस्पेंड भी किया गया है उसके बावजूद एजेंटों का बोलबाला है, और फर्जी PSK ID का दुरुपयोग जारी। क्या यह विभाग की सोई हुई व्यवस्था का नतीजा है?

गिरोह का खुलासा: पुलिस की सक्रियता, विभाग की उदासीनता:

पुलिस ने SSP शशि मोहन सिंह के नेतृत्व में एक संगठित गिरोह को धर दबोचा, जिसमें बाइक चोर, ऑटो डीलर मैनेजर, खरीदार और PSK संचालक शामिल थे। गिरोह ने 25 चोरी की बाइकें (ज्यादातर HF डीलक्स), एक एप्पल लैपटॉप और कलर प्रिंटर बरामद किए, जिनकी कुल कीमत 16 लाख रुपये आंकी गई। मुख्य आरोपी मुकेश चौहान और उसके साथी विकेश दास महंत (जो पहले से जेल में) ने पूंजीपथरा, तमनार, घरघोड़ा और रायगढ़ के बाजारों से बाइकें चुराईं।

लेकिन असली खेल यहां से शुरू होता है:

गिरोह ने अजय पटेल और संजय अगरिया की मदद से फर्जी आरसी और रजिस्ट्रेशन तैयार किए। पूर्व RTO कंप्यूटर ऑपरेटर रहे अजय पटेल ने चेसिस नंबर से असली मालिक की जानकारी निकाली, अमेजॉन से PBC कार्ड मंगवाए, और कंप्यूटर में हेरफेर कर हूबहू फर्जी दस्तावेज प्रिंट किए। इनका इस्तेमाल कर ऑटो डीलरों को बाइकें बेची गईं, और कोतबा के एक डीलर को अंधेरे में रखकर 8 बाइकें ठिकाने लगाई गईं। पुलिस ने संगठित अपराध की धारा 112(2) BNS, फर्जी दस्तावेजों की 317(2) और 336(3) BNS जोड़ी, और 7 आरोपियों को गिरफ्तार किया।

परिवहन विभाग की चुप्पी: जांच अभियान क्यों नहीं?

यह सब PSK सेंटर्स के जरिए हुआ, जो परिवहन विभाग के अधीन हैं। जिले में 24 PSK सेंटर्स हैं, जिसमे कुछ को सस्पेंड किया गया है, लेकिन एजेंटों की भरमार है जो फर्जी ID और दस्तावेजों का खेल चला रहे हैं। इतने बड़े मामले के बावजूद विभाग ने अब तक कोई जांच अभियान नहीं चलाया। क्या PSK ID की जांच के लिए कोई सिस्टम है? या विभाग की नजरें बंद हैं? अगर पुलिस न होती, तो यह गिरोह और कितनी बाइकें बाजार में उतारता? नागरिकों से अपील तो SSP कर रहे हैं कि सेकंड-हैंड बाइक खरीदते समय कागजात जांचें, लेकिन विभाग खुद क्यों नहीं सक्रिय?

क्या है असली खतरा?

यह सिर्फ चोरी नहीं, बल्कि एक सिस्टेमैटिक लापरवाही का मामला है। फर्जी दस्तावेजों से न सिर्फ चोरियां बढ़ रही हैं, बल्कि सड़क सुरक्षा भी खतरे में है। अगर PSK सेंटर्स में एजेंटों का दखल जारी रहा, तो ऐसे गिरोह और पनपेंगे। विभाग की चुप्पी से सवाल उठता है: क्या वे जिम्मेदारी से भाग रहे हैं? नागरिकों की सुरक्षा के लिए जांच अभियान कब शुरू होगा? क्या परिवहन विभाग के जांच के आदेश देंगे जिला कलेक्टर?

SSP का संदेश साफ है:

“चोरी की बाइक न खरीदें, दस्तावेज जांचें।” लेकिन परिवहन विभाग को भी जगना होगा वरना। क्या अब कार्रवाई होगी, या यह चुप्पी जारी रहेगी? अधिक अपडेट्स के लिए जुड़े रहें।

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