मनरेगा में खुली लूट-खसोट : पुसौर जनपद पंचायत के अधिकारी गायब, पौधे कागजों में हरे-भरे, धरती पर गायब!!







रायगढ़/पुसौर@टक्कर न्यूज :- छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की जनपद पंचायत पुसौर में मनरेगा की करोड़ों रुपए की योजनाएं अब कागजी शेर बनकर रह गई हैं। ग्रामीण और जनप्रतिनिधि खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि जनपद के अधिकांश मनरेगा अधिकारी महीनों से मुख्यालय में दिखाई नहीं देते। न रहते हैं पुसौर में, न आते हैं दफ्तर। फिर भी वेतन पूरा, टीए-डीए पूरा और काम? वो तो कागजों में ही पूरा-पूरा!
सूत्र बता रहे हैं कि जनपद पंचायत पुसौर के तकरीबन 70-80% तकनीकी स्टाफ और प्रोग्राम अधिकारी रायपुर, बिलासपुर या रायगढ़ शहर में किराए के मकान लेकर आराम फरमा रहे हैं। सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक का दफ्तर कभी-कभार ही खुलता है। ग्राम पंचायतों से जब सचिव या रोजगार सहायक फाइल लेकर आते हैं तो ताला लटका मिलता है। मजदूरों की हाजिरी, मस्टरोल, मटेरियल बिल—सब कुछ “व्हाट्सएप गवर्नेंस” से पास हो रहा है।
इस साल का सबसे बड़ा घपला : वृक्षारोपण में करोड़ों का खेल: ग्रामीणों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस वर्ष मनरेगा में वृक्षारोपण के नाम पर करीब ढाई करोड़ रुपए से ज्यादा का प्रावधान था। कागजों में दिखाया गया है कि हजारों-हजार पौधे लगाए गए, गड्ढे खोदे गए, पानी डाला गया, घेरा बनाया गया। लेकिन जब ग्रामीणों से पूछो तो जवाब एक ही—“साहब, पौधा तो कागज में ही लगा दिए, असल में तो एक भी नहीं दिख रहा।”
कई पंचायतों में तो पौधे लगाने की जगह पहले से मौजूद जंगल के पेड़ों को ही “नया वृक्षारोपण” दिखा दिया गया। कुछ जगहों पर तो पौधे लगाए गए, लेकिन न पानी, न सुरक्षा—एक महीने में ही सूख गए। जीवित पौधों का प्रतिशत कागजों में 95% से ऊपर, धरती पर 5% भी मुश्किल से।
अधिकारी कभी साइट पर गए ही नहीं तो Geo-tag: फोटो कौन खींचता? ठेकेदार और कुछ सचिवों ने पुराने फोटो ही दोबारा अपलोड कर दिए।
मजदूरों का बकाया महीनों से अटका, भुगतान के नाम पर खानापूर्ति: मजदूर बताते हैं कि कई पंचायतों में 3-4 महीने से मजदूरी नहीं मिली। जब सचिव भुगतान के लिए जनपद आते हैं तो अधिकारी “आज नहीं हैं, कल आना” कहकर टाल देते हैं। फाइलें महीनों धूल फांकती रहती हैं। परेशान होकर मजदूर अब काम पर जाना ही छोड़ने लगे हैं।
जनप्रतिनिधि भी खफा, बोले—“अधिकारी को पुसौर में रहना होगा अनिवार्य”: सरपंच संघ और जनपद सदस्यों ने एक स्वर में मांग की है कि जनपद पंचायत पुसौर में सभी मनरेगा अधिकारियों और तकनीकी स्टाफ का मुख्यालय में निवास अनिवार्य किया जाए। बायोमेट्रिक हाजिरी लगे, CCTV लगे और हर महीने कम से कम 20 दिन मुख्यालय में उपस्थिति जरूरी हो। साथ ही पूरे जनपद में चल रहे सभी मनरेगा कार्यों, खासकर वृक्षारोपण की हाई लेवल जांच कराई जाए।
जिला मनरेगा अधिकारी अब तक खामोश: जिला पंचायत के मनरेगा सेल को कई बार शिकायत की गई, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीणों का कहना है कि अगर जल्दी ही ठोस कदम नहीं उठाए गए तो वे कलेक्टर कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।
मनरेगा गरीब का आखिरी सहारा है। अगर यही हाल रहा तो ग्रामीण क्षेत्र में न रोजगार बचेगा, न विकास और न ही भरोसा। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस खुले घपले पर कब संज्ञान लेता है और दोषी अधिकारियों पर कब गाज गिरती है।













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