कुंजारा का ‘कपट-तंत्र’: शिकायतकर्ता को डराने फर्जी नोटिस का सहारा, उप-सरपंच ने ही खोल दी सरपंच की पोल, विधायक की चुप्पी और प्रशासन के ‘झूठ’ पर उठे गंभीर सवाल..?

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कुंजारा का ‘कपट-तंत्र’: शिकायतकर्ता को डराने फर्जी नोटिस का सहारा, उप-सरपंच ने ही खोल दी सरपंच की पोल, विधायक की चुप्पी और प्रशासन के ‘झूठ’ पर उठे गंभीर सवाल..?

रायगढ़/लैलूंगा@TAKKAR न्यूज :- भ्रष्टाचार के खिलाफ उठने वाली आवाजों को किस तरह सत्ता, रसूख और प्रशासनिक मिलीभगत से कुचला जाता है, इसका सबसे वीभत्स और पेचीदा उदाहरण लैलूंगा विकासखंड के ग्राम पंचायत कुंजारा में देखने को मिल रहा है। ‘बड़े झाड़ के जंगल’ (खसरा नंबर 243/1) पर भू-माफियाओं द्वारा किए जा रहे अवैध व्यावसायिक निर्माण की पोल खोलने वाले ग्रामीण जनेश्वर महतो को अब पंचायत के ही एक ‘फर्जी’ चक्रव्यूह में फंसाने की खौफनाक साजिश रची गई है।

इस मामले में अब जो नया और बड़ा खुलासा हुआ है, उसने सरपंच और सचिव को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा कर दिया है।

उप-सरपंच का बड़ा धमाका: “नोटिस पूरी तरह फर्जी, नहीं हुई कोई ग्राम सभा”

भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए पंचायत किस हद तक गिर सकती है, इसका प्रमाण 30 अप्रैल 2026 को जनेश्वर महतो के घर पर चस्पा किया गया बेदखली का नोटिस है। इस नोटिस में सरपंच सुषमा भगत और सचिव परमेश्वर विश्वास के हस्ताक्षर हैं, जिसमें 13 अप्रैल की पंचायत बैठक और 17 अप्रैल की ग्राम सभा का हवाला देकर जनेश्वर के मकान को अवैध घोषित किया गया है।

लेकिन, इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब गांव के ही उप-सरपंच जय मंगल भगत ने इस नोटिस की धज्जियां उड़ा दीं। उप-सरपंच ने स्पष्ट और दो टूक शब्दों में खंडन करते हुए कहा है कि, “नोटिस में जिन तारीखों का जिक्र है, उस दिन इस जमीन या जनेश्वर महतो के मकान को लेकर कोई ग्राम सभा या पंचायत की बैठक हुई ही नहीं है। जो बैठकें हुईं, उनके मुद्दे बिल्कुल अलग थे।” उप-सरपंच के इस बयान ने पंचायत के कर्ताधर्ताओं को नंगे कर दिया है। यह स्पष्ट हो चुका है कि सरपंच और सचिव ने अपने पद का घोर दुरुपयोग करते हुए एक फर्जी दस्तावेज तैयार किया और एक ईमानदार नागरिक के घर पर चस्पा कर दिया।

भू-माफिया का खौफनाक सच: जिस घर को सरकार ने बनाया, उसे पंचायत ने बता दिया अवैध?

यह पूरा मामला महज़ एक नोटिस का नहीं, बल्कि रसूखदारों की प्रतिशोध की आग का है। जरा इस घटनाक्रम की टाइमलाइन को समझिए:

• 30 अप्रैल 2026 (दोपहर): जनेश्वर महतो रायगढ़ कलेक्ट्रेट पहुँचकर अतिरिक्त कलेक्टर को अवैध कब्जे के खिलाफ पुख्ता सबूत सौंपते हैं। ऊपर से जांच के कड़े आदेश जारी होते हैं।

• 30 अप्रैल 2026 (शाम): रसूखदारों और पंचायत तंत्र में हड़कंप मचता है। आनन-फानन में सरपंच और सचिव मिलकर एक ‘फर्जी’ नोटिस तैयार करते हैं और शिकायतकर्ता के उसी घर पर चिपका देते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जनेश्वर महतो का जो मकान ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के तहत स्वीकृत है, जिसकी किश्तें खुद शासन ने जारी की हैं, वह अचानक उसी शाम अवैध कैसे हो गया? क्या पंचायत के सरपंच और सचिव अब प्रधानमंत्री की योजनाओं से भी ऊपर हो गए हैं?

खामोश विधायक: आखिर क्यों मौन हैं विद्यावती सिदार?

लैलूंगा क्षेत्र का कुंजारा अब अवैध कब्जों और जंगल की बेशकीमती जमीनों की लूट का केंद्र बन चुका है। लगातार खबरें प्रकाशित होने के बावजूद, स्थानीय विधायक विद्यावती सिदार की रहस्यमयी चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

उनके ही विधानसभा क्षेत्र में ‘बड़े झाड़ के जंगल’ पर भू-माफियाओं का कंक्रीट का साम्राज्य खड़ा हो रहा है, एक शिकायतकर्ता को फर्जी नोटिस देकर प्रताड़ित किया जा रहा है, और माफिया घर जाकर गालियां और धमकियां दे रहे हैं। फिर भी क्षेत्र की जनप्रतिनिधि का इस पूरे मामले से नजरें चुराना, आखिर किस ओर इशारा करता है? क्या यह मौन किसी मौन-सहमति का प्रतीक है?

प्रशासन का ‘झूठ-तंत्र’: कौन सच्चा, तहसीलदार या थानेदार?

इस मामले ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली को भी एक हास्यास्पद लेकिन खतरनाक मजाक बनाकर रख दिया है।

अवैध निर्माण को लेकर तहसीलदार उज्जवल पांडे का दावा है कि उन्होंने 15 अप्रैल 2026 को ही स्टे (काम रोको) आदेश जारी कर दिया था और निर्माण रोकने के लिए लैलूंगा थाना प्रभारी को बल भेजने की लिखित सूचना दी थी।

वहीं दूसरी ओर, थाना प्रभारी गिरधारी साहू का साफ कहना है कि उन्हें तहसीलदार की ओर से न तो कोई आदेश पत्र मिला है और न ही फोन पर कोई सूचना दी गई है।

एक ही सिस्टम के दो जिम्मेदार अधिकारी एक-दूसरे को झुठला रहे हैं। तो आखिर गुमराह कौन कर रहा है?

• क्या तहसीलदार ने स्टे ऑर्डर केवल फाइलों में दबाकर रखा?

• या पुलिस जानबूझकर भू-माफियाओं को संरक्षण दे रही है?

माफियाओं का आतंक और न्याय की गुहार:

कुंजारा में अब स्थिति यह है कि अवैध निर्माण में लिप्त रसूखदार (जिनमें सरपंच पति दिलकुमार भगत और अन्य शामिल हैं) शिकायतकर्ताओं के घर जाकर जांच के नाम पर धमकियां और गाली-गलौज कर रहे हैं।

प्रशासन को अब यह तय करना होगा कि वह दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा करने वाले सरपंच, सचिव और भू-माफियाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जेल भेजेगा, या फिर एक आम नागरिक को भ्रष्टाचार की बलि चढ़ने देगा। कुंजारा की यह आग अब सिर्फ एक जमीन की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की साख की परीक्षा बन चुकी है।

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