लहूलुहान पीड़ित थानों के चक्कर काटता रहा, पुलिस सीमा विवाद में उलझी; वाइन शॉप संचालक पर देशी कट्टे और चाकू से जानलेवा हमले का आरोप







रायगढ़@TAKKAR न्यूज: छत्तीसगढ़ और ओडिशा की सीमा पर कानून-व्यवस्था पूरी तरह दम तोड़ चुकी है। दिनदहाड़े हथियारों से लैस बदमाशों का खौफनाक तांडव और उसके बाद ‘रक्षक’ कहलाने वाली पुलिस की अमानवीयता—ये दोनों घटनाएं सभ्य समाज और पुलिसिया कार्यप्रणाली के मुंह पर करारा तमाचा हैं। खून से लथपथ एक आम नागरिक अपनी जान बचाकर थाने पहुंचता है, लेकिन चक्रधरनगर (रायगढ़) पुलिस सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए उसे ‘सीमा विवाद’ का बहाना बनाकर बैरंग दुत्कार देती है।
गिद्ध दृष्टि और खौफनाक साजिश
टारपाली (रायगढ़) के निवासी अरविन्द कुमार गुप्ता अपने भांजे की शादी का कार्यक्रम संपन्न कराकर लौट रहे थे। उनके बैग में 50 हजार रुपये नकद थे। दोपहर 3:48 बजे जब वे बिलाईमुण्डा के एक वाइन सेंटर पर रुके, तो वहां के संचालक की गिद्ध दृष्टि उनके रुपयों से भरे बैग पर पड़ गई। यही चंद रुपये एक खौफनाक साजिश की वजह बन गए।
देशी कट्टा, बटन चाकू और मौत का तांडव
अरविंद जैसे ही वहां से निकलने लगे, वाइन शॉप के मालिक और उसके पांच हथियारबंद गुंडों ने उन्हें घेर लिया। बदमाशों के हाथों में देशी कट्टा, बटन वाला चाकू, हॉकी स्टिक और कील जड़े डंडे थे। रुपयों का बैग लूटने के इरादे से उन्होंने अरविंद के सिर पर देशी कट्टे की मुठिया (बट) से प्राणघातक प्रहार किया, जिससे उनका सिर बुरी तरह फट गया।
जब एक गुंडे ने सीधे चेहरे की तरफ चाकू से वार किया, तो अपनी जान बचाने के लिए पीड़ित ने नंगे हाथों से चाकू की धार पकड़ ली। उनकी हथेली और उंगलियां कटकर लहूलुहान हो गईं। हॉकी स्टिक की मार सहते हुए अरविंद किसी तरह मौत के मुंह से छिटककर अपनी गाड़ी से भागे, लेकिन पीछे से भी उन पर लाठियां बरसाई गईं।
खाकी पर बदनुमा दाग: संवेदनहीनता की पराकाष्ठा
इस खौफनाक वारदात से भी ज्यादा शर्मनाक पुलिस का रवैया रहा। मौत के साये से निकलकर, खून से सना पीड़ित जब न्याय और प्राणों की रक्षा की आस में रायगढ़ के चक्रधरनगर थाने पहुंचा, तो वहां कानून के रखवालों ने संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दीं।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट और कड़ा निर्देश है कि किसी भी संज्ञेय अपराध में पुलिस सीमा का बहाना बनाए बिना तत्काल ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज करेगी। लेकिन चक्रधरनगर थाने में बैठे बिना नेमप्लेट वाले विवेचक ने पीड़ित से सरेआम बदसलूकी की और तुगलकी फरमान सुना दिया कि— “यह केस उड़िया (ओडिशा) का है, वहीं जाकर अपनी FIR कराओ।”
सिस्टम से सीधे सवाल
यह घटना पुलिस महकमे पर एक बड़ा सवालिया निशान है। क्या पुलिस का काम केवल सीमाओं के नक्शे नापना रह गया है? जब एक नागरिक की जान पर बन आई हो, तब उसे थानों के बीच फुटबॉल की तरह उछाला जाना कहां का न्याय है? अब देखना यह है कि क्या रायगढ़ के आला अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर बेलगाम अपराधियों और इस घोर लापरवाह विवेचक पर कोई सख्त कार्रवाई करेंगे, या यह मामला भी पुलिसिया फाइलों और सीमा विवाद की आड़ में दफन हो जाएगा।












Leave a Reply