लैलूंगा तहसीलदार की कार्यप्रणाली पर गहराया ‘संदेह’, क्या माफिया को बचाने के लिए रची गई ‘जवाबी स्टे’ की साजिश?







बेमिसाल फुर्ती: माफिया के अवैध कॉम्पलेक्स पर स्टे के बाद भी काम जारी, पर शिकायतकर्ता के ‘पीएम आवास’ पर स्टे लगाने में नहीं लगी देर!
सवाल: आखिर किसने की शिकायत? क्या बिना जांच पड़ताल के ही तहसीलदार ने जारी कर दिया गरीब के मकान पर स्थगन आदेश?
रायगढ़/लैलूंगा@TAKKAR न्यूज :- लैलूंगा तहसील में न्याय की तराजू अब रसूखदारों के पक्ष में झुकती नज़र आ रही है। कुंजारा पंचायत में ‘बड़े झाड़ के जंगल’ पर हिस्ट्रीशीटर द्वारा किए गए अवैध कब्जे की पोल खोलना अब शिकायतकर्ता जनेश्वर महतो के लिए भारी पड़ता दिख रहा है। जिस सिस्टम को सरकारी जमीन की रक्षा करनी थी, वह अब शिकायतकर्ता के अपने सिर की छत छीनने पर आमादा है। सूत्रों की मानें तो तहसीलदार लैलूंगा ने शिकायतकर्ता के प्रधानमंत्री आवास पर स्थगन आदेश जारी कर दिया है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
जांच की खानापूर्ति या बदले की कार्रवाई?
शिकायतकर्ता के पीएम आवास पर स्टे जारी होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर इसकी शिकायत किसने की? क्या तहसीलदार ने स्टे जारी करने से पहले मौके का मुआयना किया? क्या कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट तैयार की गई थी या फिर केवल माफिया के दबाव में ‘टेबल के नीचे’ से यह आदेश पारित कर दिया गया?
नियमानुसार, किसी भी सरकारी योजना (पीएम आवास) के तहत बने मकान पर स्टे देने से पहले एक लंबी कानूनी प्रक्रिया और ठोस आधार की आवश्यकता होती है। यदि तहसीलदार ने बिना किसी शिकायत की सत्यता जाँचे और बिना स्थलीय निरीक्षण के यह आदेश जारी किया है, तो यह सीधे तौर पर कर्तव्य की अनदेखी और पद का दुरुपयोग है।
दोहरा मापदंड: माफिया को अभयदान, गरीब पर प्रहार!
एक तरफ लैलूंगा तहसीलदार का स्टे ऑर्डर हिस्ट्रीशीटर के 5 दुकानों वाले अवैध कॉम्प्लेक्स को रोकने में ‘नाकाम’ साबित हुआ है। कलेक्टर की 24 तारीख की डेडलाइन भी बीत गई, लेकिन अवैध निर्माण पर एक ईंट तक नहीं हिली। वहीं दूसरी तरफ, शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई में ऐसी ‘सुपरफास्ट’ रफ़्तार दिखाई गई, जिससे तहसीलदार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर तहसीलदार की कलम माफिया के सामने ‘नतमस्तक’ और गरीब के सामने ‘तलवार’ क्यों बन जाती है?
विधायक विद्यावती सिदार का क्षेत्र और ‘अंधेरगर्दी’
यह सारा तमाशा लैलूंगा विधायक विद्यावती सिदार के विधानसभा क्षेत्र में हो रहा है। स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि क्या उनके निर्वाचन क्षेत्र में प्रशासनिक अधिकारी इतने निरंकुश हो चुके हैं कि वे अपनी मर्जी से किसी का भी घर उजाड़ सकते हैं? विधायक के क्षेत्र में इस तरह की ‘अंधेरगर्दी’ न केवल सरकार की छवि धूमिल कर रही है, बल्कि आम जनता का सिस्टम से भरोसा भी उठा रही है।
तहसीलदार पर कार्रवाई की उठ रही मांग!
लैलूंगा की जनता और जागरूक नागरिक अब लैलूंगा तहसीलदार की भूमिका की उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं। यदि यह सिद्ध होता है कि पीएम आवास पर स्टे बिना किसी जांच और द्वेषवश दिया गया है, तो तहसीलदार के ऊपर तत्काल दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
• क्या रायगढ़ कलेक्टर अपने मातहत अधिकारी की इस ‘मनमानी’ पर संज्ञान लेंगे?
• क्या लैलूंगा में कानून का राज स्थापित होगा या फिर माफिया के रसूख के आगे प्रशासन घुटने टेके रखेगा?
प्रमुख बिंदु जो तहसीलदार को कटघरे में खड़ा करते हैं:
1. शिकायत का आधार: शिकायतकर्ता के पीएम आवास के विरुद्ध शिकायत किसने की और उस शिकायतकर्ता की क्रेडिबिलिटी क्या है?
2. जांच रिपोर्ट: क्या स्टे जारी करने से पहले कोई पंचनामा या राजस्व निरीक्षक (RI) की रिपोर्ट ली गई?
3. सिलेक्टिव एक्शन: माफिया के काम को न रुकवा पाना और शिकायतकर्ता को परेशान करना—क्या यह ‘मैनेजमेंट’ का हिस्सा है?












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