काले धुएं का शहर और सियासत का ‘सस्ता’ नशा: प्लांटों की कालिख में ‘नेतागिरी’ कर रहा रायगढ़ का युवा, आखिर किस अंधेरे में है भविष्य?

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काले धुएं का शहर और सियासत का ‘सस्ता’ नशा: प्लांटों की कालिख में ‘नेतागिरी’ कर रहा रायगढ़ का युवा, आखिर किस अंधेरे में है भविष्य?

रायगढ़@टक्कर न्यूज :- आसमान की ओर सिर उठाएं तो कोल वाशरियों और स्पंज आयरन प्लांटों की चिमनियों से निकलता काला धुआं, और सड़क पर नजर दौड़ाएं तो गाड़ियों के काफिले पर उड़ते राजनीतिक दलों के झंडे। यह आज के रायगढ़ की वो कड़वी सच्चाई है, जिसे विकास के नाम पर ओढ़ा दिया गया है। लेकिन इस प्रदूषित हवा और धूल फांकती सड़कों के बीच एक और चीज है जो बड़ी खामोशी से दम तोड़ रही है— वह है यहाँ के युवाओं का भविष्य।

सवाल यह नहीं है कि रायगढ़ में प्रदूषण का स्तर क्या है; सवाल यह है कि जिस युवा पीढ़ी को इस कालिख के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए थी या अपने करियर की नींव रखनी चाहिए थी, वह आखिर ‘जिंदाबाद-मुर्दाबाद’ के नारों में क्यों उलझ गई है?

‘भौकाल’ की चाहत और खोखली राजनीति:

आज शहर के चौक-चौराहों, चाय की टपरियों और सोशल मीडिया पर नजर डालें, तो 18 से 25 साल के युवाओं की एक बड़ी फौज किसी न किसी राजनीतिक संगठन का झंडा उठाए खड़ी नजर आती है। बड़े नेताओं के साथ एक सेल्फी, सोशल मीडिया पर ‘युवा नेता’ का टैग और बुलेट पर पार्टी का गमछा— बस यही आज के कई युवाओं का अल्टीमेट गोल बन गया है।

राजनीतिक दल भी इस मनोविज्ञान को बखूबी समझते हैं। उन्हें रैलियों में भीड़ जुटाने, विरोध प्रदर्शनों में पुतले फूंकने और सोशल मीडिया पर ट्रेलिंग करने के लिए मुफ्त की ‘मैनपावर’ चाहिए। युवा इसे अपना ‘रसूख’ या ‘भौकाल’ समझ बैठते हैं, जबकि हकीकत में वे केवल एक राजनीतिक टूल मात्र हैं।

“रैलियों में सबसे आगे नारे लगाने वाले इन युवाओं को यह नहीं पता कि जिस वक्त वे किसी नेता की जय-जयकार कर रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त महानगरों में बैठा कोई दूसरा युवा अपने भविष्य के लिए किसी कॉरपोरेट या सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा होता है।”

अंधेरे में जाता भविष्य: नुकसान की कीमत कौन चुकाएगा?

राजनीतिक संगठनों में शामिल होने की इस अंधी दौड़ का सबसे बड़ा नुकसान युवाओं के करियर को हो रहा है:

• स्किल डेवलपमेंट का अभाव: डिग्री पूरी करने और कौशल (Skills) सीखने के सबसे अहम वर्षों को ये युवा राजनीतिक रैलियों और गुटबाजी में बर्बाद कर रहे हैं।

• रोजगार की दूरियां: जब 5-7 साल बाद ‘नेतागिरी’ का खुमार उतरता है और परिवार की जिम्मेदारियां कंधों पर आती हैं, तब तक उनके पास न तो कोई ठोस डिग्री होती है और न ही रोजगार लायक कोई अनुभव।

• अपराध और मुकदमों का जाल: कई बार छात्र राजनीति या युवा राजनीति के आवेश में आकर ये युवा मारपीट, चक्काजाम या अन्य विवादों में उलझ जाते हैं। एक बार पुलिस रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने के बाद सरकारी नौकरी और पासपोर्ट जैसे रास्ते भी बंद हो जाते हैं।

प्रदूषण से समझौता और असल मुद्दों से भटकाव:

रायगढ़ का सबसे बड़ा दर्द यहां का पर्यावरण है। लगातार बढ़ते इंडस्ट्रियल प्लांट शहर की आबोहवा में जहर घोल रहे हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जिन युवा राजनीतिक संगठनों को इस पर्यावरण विनाश, स्थानीय रोजगार और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाने चाहिए थे, वे पार्टी आलाकमान के निर्देश पर सिर्फ राजनीतिक एजेंडे सेट करने में लगे हैं।

नेताओं की गाड़ियां एसी हैं और उनके घर सुरक्षित, लेकिन जो युवा सड़कों पर धूल और प्रदूषण फांकते हुए उनके लिए पसीना बहा रहा है, उसे बदले में क्या मिल रहा है? केवल श्वास की बीमारियां और एक अंधकारमय भविष्य।

जागने का वक्त:

राजनीति बुरी चीज नहीं है, लोकतंत्र में युवाओं की भागीदारी जरूरी है। लेकिन राजनीति का मतलब अंधभक्ति और अपने भविष्य की बलि देना नहीं हो सकता। रायगढ़ के युवाओं को यह समझना होगा कि नेताओं के पीछे भीड़ बनकर चलने से उन्हें कभी ‘लीडरशिप’ नहीं मिलेगी। असली रसूख शिक्षा, रोजगार और सही मायनों में समाज के लिए कुछ करने में है।

अगर समय रहते रायगढ़ का युवा इस राजनीतिक मायाजाल से बाहर नहीं आया, तो आने वाले कुछ दशकों में इस शहर के पास न तो साफ हवा बचेगी और न ही एक काबिल युवा पीढ़ी; बचेंगे तो सिर्फ बंद कारखानों के खंडहर और भटके हुए युवाओं की भीड़।

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