एक्सक्लूसिव खुलासा: लैलूंगा में सिस्टम ‘सरेंडर’, हिस्ट्रीशीटर के खौफ से बड़े झाड़ के जंगल’ पर तन गया अवैध कॉम्प्लेक्स!!

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कलेक्टर का अल्टीमेटम हवा में, तहसीलदार का ‘स्टे’ सिर्फ कागजों का शेर! कुंजारा पंचायत में धड़ल्ले से बन गईं 5 दुकानें

रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- क्या रायगढ़ जिले के लैलूंगा जनपद क्षेत्र में कानून का राज खत्म हो चुका है? क्या यहां प्रशासन ने भू-माफियाओं और हिस्ट्रीशीटरों के आगे पूरी तरह घुटने टेक दिए हैं? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि कुंजारा पंचायत में सरकारी मशीनरी की आंखों में धूल झोंककर, बल्कि यूं कहें कि उनकी मूक सहमति से बड़े झाड़ के जंगल’ को कंक्रीट के अवैध कॉम्प्लेक्स में तब्दील कर दिया गया है। एसडीएम और कलेक्टर के आदेश यहां बेमानी हो चुके हैं और तहसीलदार का ‘स्थगन आदेश’ (STAY ORDER) सिर्फ रद्दी का एक टुकड़ा बनकर रह गया है। शिकायतकर्ता चीख-चीख कर सबूत दे रहे हैं, लेकिन ‘साहब’ हैं कि कुंभकर्णी नींद से जागने को तैयार नहीं।

अमृत सरोवर से शुरू हुई लूट, अब सरकारी जमीन पर कब्जा:

कुंजारा पंचायत के निवासी जनेश्वर महतो ने इस पूरे ‘महा-गठजोड़’ की पोल खोलकर रख दी है। उनकी शिकायत के मुताबिक, पंचायत में धांधली की शुरुआत ‘अमृत सरोवर’ तालाब के निर्माण से ही हो गई थी, जहां नियमों को ताक पर रखकर बेखौफ जेसीबी मशीनों से काम कराया गया। जब उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हो गए कि उन्होंने सीधे खसरा नंबर 243/1 (शासकीय भूमि) पर कब्जा कर अवैध कॉम्प्लेक्स तानना शुरू कर दिया। जनदर्शन से लेकर कलेक्टर तक शिकायत पहुंची। नतीजतन, तहसीलदार ने ‘स्टे ऑर्डर’ तो जारी कर दिया, लेकिन यह आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित रहा। मौके पर काम एक दिन के लिए भी नहीं रुका और आज वहां लगभग 5 दुकानें सीना ताने खड़ी हैं।

खौफ का साम्राज्य: सरपंच पति की आपराधिक कुंडली और सफेदपोशों का हाथ!!

आखिर वो कौन है जिसके आगे पूरा प्रशासनिक अमला थर-थर कांप रहा है? जनेश्वर महतो के मुताबिक, इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड कोई और नहीं बल्कि कुंजारा का सरपंच पति दिलकुमार भगत है। दिलकुमार कोई आम ग्रामीण नहीं है, बल्कि उसकी पृष्ठभूमि रेंजर हत्याकांड, अन्य हत्याओं और गांजा तस्करी जैसे संगीन अपराधों से जुड़ी है, जिसके चलते वह जेल की हवा भी खा चुका है। गांव में उसका इतना खौफ है कि कोई उसके खिलाफ मुंह खोलने की जुर्रत नहीं करता। आरोप तो यहां तक हैं कि उसे जनपद उपाध्यक्ष सुक्कन मनोज का सीधा राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। इसी ‘खादी और खाकी’ के गठजोड़ के कारण तहसीलदार ने शिकायतकर्ता से यहां तक कह दिया कि “उनके पास और भी बहुत काम हैं।”

24 तारीख बीत गई, कहां गई कलेक्टर की रिपोर्ट?

इस मामले में प्रशासनिक संवेदनहीनता की हद देखिए। कलेक्टर और एसडीएम ने सख्त निर्देश देते हुए इस पूरे प्रकरण में तीन दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट तलब की थी। 24 तारीख की मियाद भी गुजर चुकी है, लेकिन न तो रिपोर्ट फाइल हुई और न ही अवैध निर्माण पर एक भी ईंट गिरने से रोकी गई। जब इस गंभीर मसले पर लैलूंगा तहसीलदार (उज्जवल पांडे) से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया, तो उन्होंने फोन उठाना और जवाब देना ही मुनासिब नहीं समझा। बड़ा सवाल यह है कि जब स्टे ऑर्डर लागू है, तो काम क्यों नहीं रुका? क्या तहसीलदार की भूमिका भी इस मामले में संदिग्ध है? शिकायतकर्ता के आरोप इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि बिना मिलीभगत के इतना बड़ा ढांचा खड़ा नहीं हो सकता।

पंचायती राज का उड़ा मजाक: “पतिदेव देखते हैं काम”

जब इस पूरे घोटाले पर कुंजारा की सरपंच (सुषमा भगत) से जवाब मांगा गया, तो उनका बयान पंचायती राज व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा था। उन्होंने सवालों से बचते हुए गैर-जिम्मेदाराना लहजे में कहा, “मुझे किसी प्रकार की जानकारी नहीं है, पूरा काम मेरे पतिदेव देखते हैं।” यह बयान इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि कैसे महिला आरक्षण को ढाल बनाकर पंचायत की सत्ता एक हिस्ट्रीशीटर के हाथों में सौंप दी गई है। अगर उन्हें जानकारी नहीं थी, तो अब जानकारी मिलने के बाद उन्होंने प्रशासन से कार्रवाई की मांग क्यों नहीं की?

विधायक की चुप्पी पर उठते सवाल?

यह पूरा मामला लैलूंगा विधायक विद्यावती सिदार के विधानसभा क्षेत्र का है। स्थानीय जनता और जनप्रतिनिधि अब सीधे सवाल कर रहे हैं कि क्या विधायक महोदय को अपने क्षेत्र में खुलेआम चल रहे इस ‘भू-माफिया राज’ की कोई भनक नहीं है? यदि है, तो वे खामोश क्यों हैं? जनता मांग कर रही है कि विधायक इस मामले में तत्काल संज्ञान लें और दोषियों पर एफआईआर दर्ज करवाएं।

अब जनपद सीईओ पर टिकी निगाहें:

लैलूंगा की जनता अब जनपद सीईओ की ओर देख रही है। क्या वे इस अवैध कब्जे पर बुलडोजर चलवाकर प्रशासन का इकबाल बुलंद करेंगे, या फिर यह मामला भी लालफीताशाही की फाइलों में दबकर रह जाएगा? अगर जल्द ही इस अवैध कॉम्प्लेक्स पर हथौड़ा नहीं चला, तो वह दिन दूर नहीं जब भू-माफिया धमकी की नोक पर पूरे लैलूंगा की सरकारी और नजूल जमीनों को बेच खाएंगे।

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