RAIGARH: वार्ड-28 में करोड़ों की नजूल भूमि पर रसूखदारों की गिद्ध दृष्टि, आस्था की आड़ में कब्जे का बड़ा खेल उजागर!!

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RAIGARH: वार्ड-28 में करोड़ों की नजूल भूमि पर रसूखदारों की गिद्ध दृष्टि, आस्था की आड़ में कब्जे का बड़ा खेल उजागर!!

रायगढ़@टक्कर न्यूज :- शहर के वार्ड नंबर 28, चन्द्रनगर में बेशकीमती सरकारी नजूल भूमि की बंदरबांट का एक ऐसा खेल सामने आया है, जिसने प्रशासन और भू-माफियाओं के बीच के कथित गठजोड़ को बेनकाब कर दिया है। महुआ पेड़ के पास स्थित इस रिक्त शासकीय भूमि को लेकर मोहल्लेवासियों ने मोर्चा खोलते हुए कलेक्टर से गुहार लगाई है कि रसूखदारों के चंगुल से इस जमीन को मुक्त कराकर यहाँ सार्वजनिक मांगलिक भवन का निर्माण कराया जाए। स्थानीय निवासियों का सीधा आरोप है कि चन्द्र पैराडाइस से लगी इस जमीन को खुर्द-बुर्द करने के लिए न केवल फर्जी दावे किए जा रहे हैं, बल्कि इसमें नगर निगम के कुछ अधिकारियों और रसूखदार जनप्रतिनिधियों की मौन सहमति भी शामिल है।

मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब राजस्व विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर पंचनामा तैयार किया। इस जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। रिकॉर्ड के मुताबिक, इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा साल 2005-06 से ही सिविल न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन इस कानूनी पेचीदगी का फायदा उठाकर भू-माफिया अब जमीन को टुकड़ों में बेचने की फिराक में हैं। जांच के दौरान मौके पर पाया गया कि कब्जे की शुरुआत बेहद शातिर तरीके से की जा रही है। महुआ पेड़ के ठीक नीचे आस्था का सहारा लेते हुए महज 2×2 वर्ग फुट का एक चबूतरा और ‘धार्मिक पाठ’ का बहाना तैयार किया गया है। जानकारों का कहना है कि यह एक पुराना और आजमाया हुआ फॉर्मूला है, जहाँ पहले छोटे धार्मिक प्रतीक बनाए जाते हैं ताकि बाद में जब प्रशासन अतिक्रमण हटाने आए, तो उसे ‘धार्मिक भावनाओं’ का डर दिखाकर पीछे धकेला जा सके।

पंचनामे की रिपोर्ट ने इस अवैध कब्जे की पुष्टि भी कर दी है। जांच दल को मौके पर 15×46 वर्ग फुट के हिस्से पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण के साक्ष्य मिले हैं। सबसे गंभीर पहलू यह है कि चन्द्र पैराडाइस प्रोजेक्ट की सीमाओं को लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं। मोहल्लेवासियों का दावा है कि यदि इस प्रोजेक्ट का निष्पक्ष सीमांकन कराया जाए, तो सरकारी नजूल भूमि का एक बड़ा हिस्सा इनके अवैध कब्जे से मुक्त हो जाएगा। फिलहाल विवादित स्थिति के कारण यहाँ कोई बड़ा निर्माण तो नहीं हो पाया है, लेकिन जिस तरह से गुपचुप तरीके से जमीन की खरीद-बिक्री की योजना बनाई जा रही है, उससे मोहल्ले के भविष्य पर खतरा मंडरा रहा है।

स्थानीय नागरिकों ने कलेक्टर को सौंपे अपने ज्ञापन में स्पष्ट किया है कि यह जमीन शुरू से ही विवादित रही है और अब इसे सार्वजनिक हित में उपयोग किया जाना चाहिए। उनकी मांग है कि प्रशासन इस पूरी जमीन का नए सिरे से सीमांकन कराए और इसे ‘सार्वजनिक स्थल’ के रूप में चिन्हित करे। वार्डवासियों का कहना है कि शहर में तेजी से होते कंक्रीट के विस्तार के बीच उनके पास एक मांगलिक भवन तक की जगह नहीं बची है। ऐसे में यह नजूल भूमि उनके लिए आखिरी उम्मीद है। अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है—देखना यह होगा कि साहब का हंटर भू-माफियाओं पर चलता है या फिर रसूख के आगे कानून एक बार फिर बौना साबित होगा।

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