प्लांट के गेट पर दम तोड़ता ‘युवा विजन’: नौकरी का शोर या ठेकेदारी की चाह?







रायगढ़ के युवा नेताओं की ‘सीमित’ राजनीति पर खड़े होते गंभीर सवाल!!
रायगढ़@टक्कर न्यूज :- जिले में औद्योगिक विकास की लहर के बीच स्थानीय युवाओं को रोजगार दिलाने का मुद्दा एक बार फिर गरमाया हुआ है। हाल ही में युवा नेताओं द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्तियों में उद्योगों में स्थानीय भागीदारी की ‘पुरजोर’ मांग की गई है। लेकिन, इन कागजी दावों के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि रायगढ़ की युवा राजनीति आज भी ‘प्लांट, नौकरी और धरने’ के त्रिकोण से बाहर नहीं निकल पा रही है। सवाल यह उठता है कि क्या हमारे युवा नेताओं के पास भविष्य के लिए कोई ठोस रोडमैप है, या यह सब केवल ‘ठेकेदारी’ की राह आसान करने का एक जरिया मात्र है?
मौतों पर मौन, फिर कैसी युवाओं की फिक्र?
रायगढ़ के उद्योगों में आए दिन होने वाले हादसे और मजदूरों की अकाल मृत्यु किसी से छिपी नहीं है। ‘कांड’ पर ‘कांड’ हो रहे हैं, लेकिन नौकरी की मांग करने वाले इन युवा नेताओं की जुबान सुरक्षा मानकों पर हमेशा सिली रहती है। जब प्लांट के भीतर मजदूरों का खून बहता है, तब ये विजनरी नेता कहां होते हैं? क्या युवाओं को केवल उन्हीं असुरक्षित प्लांटों में झोंक देना ही इनका एकमात्र लक्ष्य है?
प्रदूषण का जहर और ‘युवा’ चुप्पी:
रायगढ़ की हवा में घुलता जहर और काला धुआं यहां की पीढ़ी को बीमार बना रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि युवा नेता प्लांट में नौकरी तो मांगते हैं, लेकिन उसी प्लांट से निकलने वाले जानलेवा प्रदूषण पर एक शब्द नहीं बोलते। क्या विकास का यह मॉडल अधूरा नहीं है? क्या युवाओं के फेफड़ों की कीमत पर मिलने वाली नौकरी ही वास्तविक विकास है?
आत्मनिर्भरता से दूरी: क्या खुद आत्मनिर्भर हैं ये नेता?
एक तरफ देश ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बात कर रहा है, वहीं हमारे स्थानीय नेता युवाओं को केवल ‘चाकरी’ और ‘मजदूरी’ के सपने दिखा रहे हैं।
• सवाल: ये नेता स्वरोजगार या स्टार्टअप को लेकर विज्ञप्ति क्यों जारी नहीं करते?
• हकीकत: क्या ये खुद इतने सक्षम हैं कि दूसरों को आगे बढ़ना सिखा सकें?
आज का युवा डिजिटल फ्रॉड और ठगी का शिकार हो रहा है, लेकिन इन नेताओं के पास इन ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा करने का न समय है, न विजन।
पद मिलते ही बदल जाते हैं तेवर:
अक्सर देखा गया है कि संगठन में कोई भी नया पद मिलते ही युवा नेताओं की सक्रियता केवल प्लांटों के चक्कर काटने तक सीमित हो जाती है। जनता के बीच चर्चा है कि यह ‘नौकरी’ की मांग युवाओं के हित के लिए कम और अपनी ‘ठेकेदारी’ चमकाने के लिए ज्यादा होती है। छोटे-मोटे धरनों से शुरू होकर मैनेजमेंट से सांठगांठ तक का यह सफर रायगढ़ के असली मुद्दों को हाशिए पर धकेल रहा है।
कड़वा सच: रायगढ़ के युवाओं को आज ऐसे नेतृत्व की दरकार है जो उन्हें ‘मजदूर’ नहीं, ‘मालिक’ बनने की प्रेरणा दे। जो प्रदूषण मुक्त भविष्य और सुरक्षित कार्यस्थल की गारंटी मांगे। केवल नौकरी का झुनझुना थमाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले नेताओं को अब युवा खुद आईना दिखाने को तैयार हैं। शर्मनाक है कि विकास की बात करने वाले चेहरे विनाश के कारकों पर मौन हैं।












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