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रायगढ़ RTO: ‘मौत के लाइसेंस’ की होम डिलीवरी… दलाल सिर्फ टाइपिस्ट, असली खेल ‘साहब’ के पासवर्ड में!

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सदन में विधायक अनुज शर्मा के आंकड़ों ने खोली परिवहन विभाग की पोल; इधर रायगढ़ में अफसर खुद बांट रहे बिना ट्रायल लाइसेंस, व्हाट्सएप पर ‘ब्लॉक’ कर सिस्टम से कर रहे ‘पास’!!

रायगढ़@टक्कर न्यूज :- क्या आप जानते हैं कि आपके बगल से गुजरने वाली भारी-भरकम गाड़ी का ड्राइवर शायद कभी ड्राइविंग ट्रैक पर गया ही न हो? यह कोई डराने वाली कल्पना नहीं, बल्कि रायगढ़ की सड़कों का वह खौफनाक सच है, जिसकी पटकथा रायगढ़ क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) की वातानुकूलित केबिनों में लिखी जा रही है। एक ग्रामीण के हालिया खुलासे ने RTO के उस ‘लाइसेंस सिंडिकेट’ को बेनकाब कर दिया है, जहां ड्राइविंग स्किल की नहीं, बल्कि ‘रिश्वत के वजन’ की टेस्टिंग होती है। RTO का भ्रष्ट तंत्र अपनी गर्दन बचाने के लिए सारा ठीकरा दलालों (एजेंटों) पर फोड़ देता है, लेकिन सच यह है कि दलाल सिर्फ एक मोहरा है। असली रिमोट कंट्रोल और ‘पास’ करने का बटन तो RTO साहब के ही हाथ में है।

सदन में गूंजा घपला: अनुज शर्मा के ‘डेटा बम’ से मंत्री केदार कश्यप निरुत्तर

रायगढ़ का यह RTO घपला सिस्टम के उस नासूर का सबूत है, जिसकी गूंज हाल ही में विधानसभा में भी सुनाई दी।

सदन में परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर जोरदार हमला बोलते हुए विधायक अनुज शर्मा ने सीधे परिवहन मंत्री केदार कश्यप को कटघरे में खड़ा कर दिया। > विधायक शर्मा ने पूरे छत्तीसगढ़ का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए सदन में चौंकाने वाले आंकड़े रखे। उन्होंने बताया कि— “प्रदेश में हर महीने जितने हजार ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए जा रहे हैं, उनके मुकाबले ट्रायल ट्रैक पर गाड़ी चलाकर टेस्ट देने वालों की संख्या 10% भी नहीं है!” उन्होंने मंत्री से सीधा सवाल दागा कि जब 90% आवेदकों ने कभी ट्रैक का मुंह ही नहीं देखा, तो परिवहन विभाग का सिस्टम उन्हें ‘पास’ कैसे कर रहा है? रायगढ़ RTO में बिना ट्रायल लाइसेंस जारी करने का यह ताजा मामला, विधायक अनुज शर्मा के उन्हीं आंकड़ों का सबसे बड़ा और पुख्ता प्रमाण है।

RTO का सच: दलाल सिर्फ ‘मोहरा’, असली खिलाड़ी ‘अधिकारी’

जब भी भ्रष्टाचार की बात उठती है, प्रशासन दिखावे के लिए कुछ दलालों को बाहर कर देता है। लेकिन तकनीकी सच्चाई कुछ और ही है:

दलाल की औकात सिर्फ ‘डेटा एंट्री’ तक: कोई भी एजेंट या दलाल सिर्फ ‘सारथी पोर्टल’ पर आवेदक की आईडी से ऑनलाइन फॉर्म भर सकता है और फीस जमा कर सकता है। उसका अधिकार क्षेत्र वहीं खत्म हो जाता है।

अधिकारी के पास है ‘ब्रह्मास्त्र’: मोटर व्हीकल एक्ट के तहत, बिना ड्राइविंग ट्रायल के कोई पास नहीं हो सकता। किसी भी आवेदक को ‘पास’ या ‘फेल’ करने का अधिकार, सिस्टम का फाइनल अप्रूवल और डिजिटल सिग्नेचर सिर्फ और सिर्फ RTO के अधिकृत अधिकारी (MVI या RTO) के पास होता है।

निष्कर्ष: साफ है कि अगर कोई बिना गाड़ी चलाए लाइसेंस पा रहा है, तो वह दलाल की नहीं, बल्कि उस भ्रष्ट RTO अधिकारी की मेहरबानी है जिसने अपनी आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल कर उसे ‘पास’ किया है।

रायगढ़ में व्हाट्सएप पर ‘ब्लॉक गेम’ और जादू से बना लाइसेंस:

भ्रष्टाचार की यह दास्तान रायगढ़ के एक आम ग्रामीण की है, जिसने इस पूरे रैकेट की कलई खोल दी है:

शुरुआत: ग्रामीण ने लाइसेंस के लिए एक एजेंट को मोटी रकम दी। जब हफ्तों तक काम में देरी हुई, तो वह सीधा RTO दफ्तर पहुंच गया।

व्हाट्सएप पर संपर्क: RTO दफ्तर में जब अधिकारी ने टालमटोल की, तो ग्रामीण ने अधिकारी को सीधे व्हाट्सएप पर मैसेज किया और एजेंट को दिए गए ‘पैसे’ (रिश्वत) का हवाला दिया।

साहब का डर: ‘रिश्वत’ का जिक्र सुनते ही पोल खुलने के डर से अधिकारी ने झट से उस ग्रामीण को व्हाट्सएप पर ब्लॉक कर दिया।

सिस्टम का खेल: अधिकारी ने भले ही ब्लॉक कर दिया हो, लेकिन ‘सेटिंग’ पूरी हो चुकी थी। बिना कभी ट्रायल ट्रैक पर उतरे, बिना कोई गाड़ी चलाए, उसी अधिकारी के सिस्टम से ग्रामीण को ‘पास’ कर दिया गया और कुछ ही दिनों में असली लाइसेंस उसके घर पहुंच गया।

सड़कें बन रही हैं ‘डेथ जोन’

यह सिर्फ चंद रुपयों की रिश्वत का मामला नहीं है, यह सीधे तौर पर जनता की जान के साथ खिलवाड़ है। अगर कोई नौसिखिया बिना गाड़ी चलाना जाने ‘हैवी या लाइट’ लाइसेंस पा लेता है, तो इसका जिम्मेदार वह बाहर खड़ा दलाल नहीं, बल्कि वह RTO अधिकारी है। चंद रुपयों की लालच में रायगढ़ RTO के अफसर सड़कों पर ‘यमराज के दूत’ उतार रहे हैं। सड़क हादसों में जो खून बह रहा है, उसकी सीधी जिम्मेदारी इन बिना ट्रायल बांटे गए लाइसेंसों की है।

कलेक्टर महोदय! अब ‘मोहरों’ पर नहीं, ‘वजीरों’ पर हो कार्रवाई

रायगढ़ की जनता अब इस ‘लाइसेंस राज’ से त्रस्त आ चुकी है। प्रशासन की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। अब रायगढ़ जिला प्रशासन और परिवहन विभाग के उच्चाधिकारियों से सीधी मांग है:

सर्वर लॉग की जांच: उस ग्रामीण के मामले में सिस्टम के ‘सर्वर लॉग’ (Server Log) की तकनीकी जांच हो कि बिना ट्रायल ट्रैक पर आए, RTO अधिकारी के लॉगिन आईडी से उसे ‘पास’ कैसे किया गया?

ट्रायल वीडियो सार्वजनिक हों: सदन में अनुज शर्मा द्वारा रखे गए आंकड़ों को आधार मानकर, रायगढ़ में पिछले 1 साल में बने सभी लाइसेंसों के ‘ट्रायल वीडियो फुटेज’ मांगे जाएं। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

दोषी अफसरों पर FIR: व्हाट्सएप पर सबूत मिटाने की कोशिश करने वाले और सिस्टम को हैक करके बैठे उन सफेदपोश अधिकारियों पर सीधे एफआईआर (FIR) कब दर्ज होगी?

रायगढ़ RTO में फैला यह भ्रष्टाचार एक संगठित अपराध है। दलाल तो सिर्फ मोहरा हैं, असली बीमारी दफ्तर के अंदर बैठी है। जब तक ‘पास’ का बटन दबाने वाले भ्रष्ट अधिकारियों के कॉलर नहीं पकड़े जाएंगे, रायगढ़ की सड़कें हादसों का शिकार होती रहेंगी।

(नोट : इस खबर का फॉलोअप जारी है… देखना है कि क्या जिला प्रशासन सिर्फ मोहरों को पीटेगा, या असली ‘खिलाड़ियों’ पर गिरेगी गाज?)

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