रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- किसी भी राज्य या राष्ट्र के लिए 'विकास' एक ऐसा जादुई शब्द होता है जो समृद्धि, रोजगार और एक सुनहरे भविष्य की तस्वीर उकेरता है। लेकिन छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और कला धानी कहे जाने वाले रायगढ़ जिले में इस 'विकास' शब्द ने एक बेहद खौफनाक और डरावना रूप ले लिया है। यहाँ विकास का अर्थ गगनचुंबी इमारतें या खुशहाल गांव नहीं, बल्कि काले धुएं का गुबार, राख से पटी हुई उपजाऊ जमीनें, सूखी नदियां और अपने ही जल-जंगल-जमीन से बेदखल होते हजारों लोग हैं। औद्योगीकरण की जिस अंधी दौड़ में रायगढ़ को झोंक दिया गया है, वह अब एक विनाशकारी मॉडल बन चुका है। खदानों और भारी उद्योगों के विस्तार के लिए तमनार, तुरुंगा और गारे-पेल्मा जैसे करीब दस गांवों को पूरी तरह से उजाड़ने की तैयारी चल रही है। इन गांवों के बाशिंदे, जो पीढ़ियों से इस माटी से जुड़े हैं, आज अपने ही घर में शरणार्थी बनने को मजबूर हैं। इसके साथ ही, पूरे जिले में प्रदूषण के कारण जो अघोषित स्वास्थ्य आपातकाल लागू हो गया है, वह एक मूक नरसंहार से कम नहीं है। इन सब पर पर्दा डालने के लिए प्रशासन ने 'ऑक्सीजन जोन' का जो शिगूफा छोड़ा है, वह प्रशासनिक संवेदनहीनता और छलावे की चरम सीमा है। यह रिपोर्ट रायगढ़ के इसी दर्द, सुलगते जन-आक्रोश और प्रशासनिक विफलता की जमीनी हकीकत का पर्दाफाश करती है।
विस्थापन का दंश और नक्शे से मिटते गांवों की त्रासदी
जब कोई उद्योग स्थापित होता है, तो कागजों पर वह सिर्फ जमीन का अधिग्रहण होता है, लेकिन धरातल पर वह एक पूरी सभ्यता का विनाश होता है। तमनार, तुरुंगा और गारे-पेल्मा ब्लॉक के गांव आज इसी विनाश की कगार पर खड़े हैं। ये गांव केवल ईंट-पत्थर के मकानों का समूह नहीं हैं; ये आदिवासियों और मूलनिवासियों की सदियों पुरानी संस्कृति, उनकी परंपराओं और उनके आजीविका का केंद्र हैं। जब कोई गांव उजड़ता है, तो केवल घर नहीं टूटता, बल्कि वहां का सामाजिक ताना-बाना, वहां के देवगुड़ी (पूजा स्थल), खेत-खलिहान और पीढ़ियों की यादें हमेशा के लिए बुलडोजर के नीचे दफ्न हो जाती हैं। उद्योग विस्तार की बलि चढ़ रहे इन गांवों के ग्रामीण आज भारी दहशत में हैं। उन्हें मुआवजे के नाम पर जो कुछ भी दिया जा रहा है, वह उनके स्थायी जीवन और सम्मान के आगे बेहद बौना है। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए आज जनता सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करने को मजबूर है। धरने दिए जा रहे हैं, लेकिन सत्ता, प्रशासन और उद्योगपतियों का गठजोड़ इस आक्रोश को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रशासन ग्रामीणों के इस दर्द को क्यों नहीं समझ पा रहा है। क्या कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे के आगे लोकतंत्र की आवाज इतनी कमजोर हो गई है कि रायगढ़ के वजूद और संस्कृति को हमेशा के लिए मिटाने की मौन स्वीकृति दे दी गई है।
राख के गुबार में घुटती जिंदगियां और अघोषित 'हेल्थ इमरजेंसी'
अगर आपको नरक का साक्षात दर्शन करना हो, तो रायगढ़ के औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास बसे गांवों का दौरा कर लीजिए। उद्योगों की चिमनियों से चौबीसों घंटे उगला जाने वाला काला जहरीला धुआं और खुले में डंप की जा रही फ्लाई ऐश (राख) यहाँ के लोगों के लिए मौत का परवाना बन चुकी है। हवा में घुले कोयले के कणों और भारी धातुओं ने रायगढ़ की आबोहवा को पूरी तरह से विषाक्त कर दिया है। उद्योग प्रभावित इलाकों में शायद ही कोई ऐसा घर हो, जहां कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार न हो। छोटे बच्चे और युवा गंभीर त्वचा रोगों, डर्मेटाइटिस और एलर्जी से पीड़ित हैं, जबकि बुजुर्गों में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों से जुड़ी जानलेवा बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। यह कोई आम स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि एक पूर्ण विकसित 'हेल्थ इमरजेंसी' है। प्रदूषण केवल हवा तक सीमित नहीं है। फ्लाई ऐश को बिना किसी वैज्ञानिक तरीके के खुले में डंप किया जा रहा है, जो बारिश के दिनों में बहकर जलस्रोतों और नदियों में मिल जाती है। भूजल इतना प्रदूषित हो चुका है कि वह पीने लायक नहीं रहा और खेतों में राख की परत बिछ जाने से उपजाऊ जमीनें बंजर हो रही हैं। इस अमानवीय स्थिति का जिम्मेदार कौन है, यह सवाल आज हर ग्रामीण की जुबान पर है। जब आज की तारीख में मौजूदा उद्योगों ने ही जिले को 'गैस चैंबर' बना दिया है, तो भविष्य की कल्पना ही सिहरन पैदा करती है। आने वाले समय में जब प्रस्तावित नए प्लांट और खदानें शुरू होंगी, तब रायगढ़ में इंसान के रहने लायक एक इंच भी जगह नहीं बचेगी।
'ऑक्सीजन जोन' का छलावा और 'ग्रीनवाशिंग' का घिनौना खेल
इस पूरी त्रासदी और हाहाकार के बीच रायगढ़ का प्रशासन जो रवैया अपना रहा है, वह जले पर नमक छिड़कने जैसा है। प्रशासन ने हाल ही में शहर के भीतर 'ऑक्सीजन जोन' बनाने का एक नया पीआर स्टंट शुरू किया है। पर्यावरण विज्ञान की भाषा में इसे 'ग्रीनवाशिंग' कहा जाता है, जिसका सीधा अर्थ है असल प्रदूषण को छुपाने के लिए हरियाली का झूठा दिखावा करना। यह विरोधाभास की पराकाष्ठा है कि एक तरफ खदानों के विस्तार और नए उद्योगों की स्थापना के लिए गारे-पेल्मा और तमनार जैसे क्षेत्रों में रातों-रात हजारों एकड़ के घने, प्राकृतिक और प्राचीन जंगल बेदर्दी से काटे जा रहे हैं। ये जंगल एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र थे, जो लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर प्राकृतिक रूप से ऑक्सीजन देते थे। और दूसरी तरफ, प्रशासन शहर के किसी कोने में चंद पेड़ लगाकर उसे 'ऑक्सीजन जोन' का नाम दे रहा है। क्या हजारों एकड़ पुराने और सघन जंगलों की कटाई की भरपाई, शहर में बनाए गए एक कृत्रिम 'ऑक्सीजन जोन' से हो सकती है? जनता भली-भांति समझ रही है कि 'ऑक्सीजन जोन' का बोर्ड टांगकर प्रशासन दरअसल बड़े उद्योगपतियों के बेलगाम प्रदूषण को छुपाने और उन्हें 'क्लीन चिट' देने का एक सुरक्षित रास्ता निकाल रहा है। यह पर्यावरण संरक्षण का मुखौटा पहनकर रायगढ़ की जनता की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास है।
कॉरपोरेट-प्रशासनिक गठजोड़ और एक भयावह भविष्य की ओर बढ़ते कदम
रायगढ़ की यह दुर्दशा एक दिन में नहीं हुई है। यह दशकों से चले आ रहे एक भ्रष्ट और जन-विरोधी कॉरपोरेट-प्रशासनिक गठजोड़ का नतीजा है। उद्योगों को स्थापित करते समय स्थानीय लोगों को रोजगार देने और पर्यावरण की सुरक्षा करने के जो वादे किए जाते हैं, वे सभी हवा हो जाते हैं। उद्योग करोड़ों-अरबों का मुनाफा कमा रहे हैं, लेकिन जिस जमीन से यह मुनाफा आ रहा है, वहां के लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद उद्योगों के आसपास ग्रीन बेल्ट विकसित नहीं किया जाता और प्रदूषण मानकों का कड़ाई से पालन नहीं होता। यदि हम आज रायगढ़ की वर्तमान स्थिति का आकलन करें, तो भविष्य का एक अत्यंत डरावना चित्र उभर कर सामने आता है। जब मौजूदा फैक्ट्रियां ही इस कदर तबाही मचा रही हैं, तो आने वाले कुछ सालों में रायगढ़ कैसा दिखेगा? क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को विरासत में पीने के लिए जहरीला पानी और सांस लेने के लिए फ्लाई ऐश से भरी हवा देंगे? अगर 'विकास' की यही परिभाषा है, तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम एक सामूहिक विनाश की ओर बढ़ रहे हैं।
निर्णायक घड़ी और बदलाव की दरकार
रायगढ़ आज एक ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा है। तमनार, तुरुंगा और गारे-पेल्मा के उजड़ते हुए गांव, अस्पतालों के बाहर लंबी कतारों में खड़े बीमार ग्रामीण, और दम तोड़ते जंगल इस बात की स्पष्ट गवाही दे रहे हैं कि हालात नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं। सरकार, पर्यावरण विभाग और स्थानीय प्रशासन को अब कुंभकर्णी नींद से जागना होगा। उन्हें यह तय करना होगा कि उनकी प्राथमिकता चंद कॉरपोरेट घरानों की तिजोरियां भरना है या लाखों आम नागरिकों के जीवन के अधिकार की रक्षा करना। नए उद्योगों के विस्तार और भूमि अधिग्रहण पर तब तक तत्काल रोक लगनी चाहिए, जब तक कि मौजूदा उद्योगों के प्रदूषण का निष्पक्ष पर्यावरणीय ऑडिट न हो जाए। नियमों का उल्लंघन करने वाले और फ्लाई ऐश खुले में डंप करने वाले उद्योगों पर सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। 'ऑक्सीजन जोन' जैसे ग्रीनवाशिंग प्रोजेक्ट्स के नाम पर जनता को गुमराह करना बंद कर, असली जंगलों को कटने से बचाया जाना चाहिए। रायगढ़ को बचाने की यह लड़ाई अब सिर्फ कुछ ग्रामीणों की लड़ाई नहीं रही; यह रायगढ़ के वजूद, उसकी संस्कृति और यहाँ के हर नागरिक की सांसों को बचाने की आखिरी जंग है। विकास जरूरी है, लेकिन वह विकास जो जीवन छीने, जो गांव उजाड़े और जो हवाओं में जहर घोल दे, वह साक्षात विनाश है। रायगढ़ अब ठोस जवाब और कार्रवाई मांग रहा है।
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