रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- क्या आप उस विकास की कल्पना कर सकते हैं, जिसकी नींव में इंसानी सांसों की लाशें चुनी गई हों? रायगढ़ जिले में आज ठीक यही हो रहा है। जिले की सीमा में दाखिल होते ही आसमान छूती चिमनियां दूर से एक 'शाइनिंग रायगढ़' की तस्वीर पेश करती हैं, लेकिन इन चिमनियों के ठीक नीचे जाकर देखिए—वहां की आबोहवा में जो धुआं तैर रहा है, वह विकास का नहीं, बल्कि 'विनाश' का साइलेंट किलर है। हर रोज नए प्लांट और कारखानों की बिछती बिसात ने रायगढ़ को एक ऐसे बारूद के ढेर पर बैठा दिया है, जहां आने वाले कल की तबाही का मंजर अभी से रूह कंपाने लगा है। सवाल यह नहीं है कि ये कंपनियां क्यों आ रही हैं? सवाल यह है कि इस अंधी दौड़ में आम आदमी की जिंदगी की कीमत 'जीरो' क्यों कर दी गई है?
यह किसी हॉरर फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि जिले के उन दर्जनों गांवों का कड़वा और नंगा सच है, जो इन औद्योगिक घरानों की चारदीवारी से सटे हैं। कंपनियों से निकलने वाली डस्ट, फ्लाई ऐश और जहरीली गैसों ने गांवों को गैस चेंबर में तब्दील कर दिया है। आज इन इलाकों में हर तीसरा घर अस्थमा, टीबी, ब्रोंकाइटिस और गंभीर त्वचा रोगों से जूझ रहा है। नौजवानों के फेफड़े समय से पहले बूढ़े हो रहे हैं। केवल हवा ही नहीं, भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा चुका है और खेतों में राख की परतें जमने से उपजाऊ जमीनें अब बंजर होने की कगार पर हैं। जब आज की तारीख में यह विभीषिका इतनी भयानक है, तो भविष्य में जब दर्जनों नई फैक्ट्रियां यहां अपना साम्राज्य फैला लेंगी, तब रायगढ़ का वजूद क्या बचेगा? क्या रायगढ़ एक जीता-जागता 'चेरनोबिल' बनने की राह पर है?
सबसे ज्यादा खौफनाक है प्रशासनिक तंत्र का वह सन्नाटा, जो इन चिमनियों के शोर में कहीं दब गया है। ऐसा नहीं है कि जनता खामोश है। पर्यावरण मानकों की धज्जियां उड़ाने वाली इन कंपनियों के खिलाफ सैकड़ों शिकायतें टेबल दर टेबल घूम रही हैं। जनसुनवाई के नाम पर होने वाली खानापूर्ति हो या फिर आरटीआई के तहत मांगे गए जवाब—सब कुछ फाइलों के तिलिस्म में उलझा दिया जाता है। जांच के नाम पर समितियां बनती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में कोई भी अफसर इन रसूखदार कंपनियों की मनमानी पर लगाम कसने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। बिना ईएसपी और डस्ट कंट्रोल सिस्टम के धड़ल्ले से चल रहे ये प्लांट खुलेआम सिस्टम के मुंह पर तमाचा जड़ रहे हैं।
वर्तमान सरकार की नीयत और उसकी नीतियों पर अगर निष्पक्ष नजर डाली जाए, तो यह साफ है कि किसी भी राज्य के लिए आर्थिक मजबूती, राजस्व और युवाओं के लिए रोजगार तभी संभव है, जब वहां बड़े उद्योग आएं। सरकार का विजन रायगढ़ को एक औद्योगिक हब बनाने का है, जो प्रगति के लिहाज से एक मास्टरस्ट्रोक है। विकास हो रहा है, यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन, जिस नौकरशाही और प्रशासनिक मशीनरी पर इस विजन को 'सुरक्षित' तरीके से लागू करने की जिम्मेदारी है, वह पूरी तरह फेल नजर आती है। सरकार को यह समझना होगा कि उनके 'विकास' के विजन को जमीनी स्तर पर प्रशासनिक सुस्ती ने 'विनाश' के मॉडल में तब्दील कर दिया है।
अगर रायगढ़ को इस आसन्न प्रलय से बचाना है, तो कागजी लीपापोती से बाहर आकर सिस्टम की कठोर सर्जरी करनी होगी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को मूकदर्शक की भूमिका छोड़नी होगी। जो प्लांट फिल्टर या डस्ट कंट्रोल यूनिट बंद करके रात के अंधेरे में जहर उगलते हैं, उन पर सिर्फ जुर्माना न लगाकर उन्हें सीधे सील करने जैसी निर्मम कार्रवाई की जरूरत है। इसके साथ ही, पर्यावरण मानकों की जांच स्थानीय अधिकारियों के भरोसे न छोड़कर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल या किसी स्वतंत्र राष्ट्रीय एजेंसी की सघन निगरानी में कराई जानी चाहिए। जो कंपनियां प्रदूषण फैला रही हैं, उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर प्रभावित गांवों के लोगों के इलाज और जीवन-स्तर सुधारने के लिए बने 'हेल्थ इमरजेंसी फंड' में जमा होना चाहिए। हर साल कंपनियों का स्वतंत्र ग्रीन ऑडिट अनिवार्य हो, ताकि जमीन और पानी का स्तर खराब होने पर उसकी पूरी जवाबदेही और रिकवरी कंपनी प्रबंधन पर तय की जा सके।
रायगढ़ को तरक्की के शिखर पर जाना है, इससे किसी को गुरेज नहीं। लेकिन वह तरक्की किस काम की, जो यहां के बाशिंदों को अस्पताल के बिस्तर तक पहुंचा दे? सत्ता के शीर्ष पर बैठे नीति-निर्माताओं को अब यह तय करना होगा कि उन्हें केवल फैक्ट्रियों के सायरन की आवाज सुननी है, या उस आम आदमी की खांसी, जो इन चिमनियों के धुएं में अपना कल तलाश रहा है। विकास का स्वागत है, लेकिन विनाश की शर्त पर नहीं!
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