झीरम की अनसुलझी दास्तान: ‘जेब के सबूतों’ से लेकर NIA की ‘बंद फाइलों’ तक.. आखिर 30 शहादतों का सौदागर कौन?

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बस्तर की वो लाल मिट्टी और एक अधूरा इंसाफ!!

रायगढ़@टक्कर न्यूज :- कहानी की शुरुआत आज से नहीं, बल्कि 13 साल पहले 25 मई 2013 के उस मनहूस दिन से होती है। बस्तर की झीरम घाटी के घने जंगलों के बीच से कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ का काफिला गुजर रहा था। अचानक सन्नाटा चीरती हुई गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजी। यह कोई आम नक्सली एम्बुश नहीं था। यह एक सोची-समझी ‘टारगेटेड किलिंग’ थी।

गोलियों की बौछार के बाद नक्सली गाड़ियों के पास आए और बाकायदा नाम पुकारने लगे- “महेंद्र कर्मा कहां है? नंदकुमार पटेल कहां हैं?” उस दिन विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल और उदय मुदलियार समेत 30 से ज्यादा लोगों के खून से झीरम की घाटी लाल हो गई थी। एक पूरी की पूरी राजनीतिक पीढ़ी को उसी जंगल में दफ्न कर दिया गया।

एक ‘जेब’ जिसमें कैद था इंसाफ का तिलिस्म!

इस खून-खराबे के बाद कहानी में एंट्री होती है सियासत की। भूपेश बघेल विपक्ष के नेता थे। उन्होंने इस दर्दनाक घटना को एक नया मोड़ दिया। मंचों से गरजते हुए उन्होंने इसे ‘सुपारी किलिंग’ (राजनीतिक हत्या) बताया। उन्होंने तत्कालीन रमन सिंह सरकार पर सुरक्षा हटाने का आरोप लगाया, नक्सलियों के कमांडरों के नाम लिए, डॉ. रमन सिंह के नार्को टेस्ट की मांग की और सबसे बड़ा दावा किया- “झीरम कांड के सारे सबूत मेरी जेब में हैं।”

जनता ने इस ‘जेब’ पर भरोसा किया। कांग्रेस को सत्ता का ताज पहनाया। सबको लगा कि अब वो जेब खुलेगी, चेहरे बेनकाब होंगे और झीरम के शहीदों को इंसाफ मिलेगा। लेकिन… 5 साल बीत गए। सत्ता का सूरज ढल गया, पर वो रहस्यमयी जेब कभी नहीं खुली।

वर्तमान का पलटवार: “वो सबूत नहीं, सिर्फ एक सफेद झूठ था”

कहानी अब वर्तमान में आ चुकी है। छत्तीसगढ़ की सत्ता फिर से बदल चुकी है और अब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विष्णु देव साय बैठे हैं। भूपेश बघेल के उसी पुराने ‘जेब वाले बयान’ पर सीएम साय ने करारा प्रहार किया है।

सदन से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक, साय ने सीधे बघेल की आंखों में आंखें डालकर पूछा है- “अगर आपके पास सबूत थे, अगर आपको असली गुनहगारों के नाम पता थे, तो 5 साल तक आपकी सरकार खामोश क्यों रही? क्या वो सबूत सिर्फ चुनाव जीतने का टूल थे?” सीएम साय ने दो टूक कहा कि जब सबूत मांगे गए, तो जेब से सिर्फ ‘अखबार की कतरनें’ निकलीं। यह शहीदों के खून और उनके परिवारों के आंसुओं के साथ किया गया सबसे भद्दा राजनीतिक मजाक है।

कहानी का क्लाइमेक्स: NIA की ‘बंद फाइलें’ और सत्ता की खामोशी…

साय का कांग्रेस पर किया गया वार बिल्कुल सटीक है, लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा सस्पेंस अभी बाकी है। और यह सस्पेंस खुद सत्ता पक्ष (BJP) के इर्द-गिर्द घूमता है। झीरम कांड की जांच देश की सबसे बड़ी एजेंसी NIA (राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण) कर रही है।

अब जरा सोचिए- केंद्र में भी बीजेपी की मजबूत सरकार है और छत्तीसगढ़ में भी विष्णु देव साय की सरकार। तो फिर इस ‘डबल इंजन’ की ताकत के बावजूद, NIA की फाइनल रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं हुई? अगर भूपेश बघेल ‘जेब के सबूत’ का झूठ बोलकर राजनीति कर रहे थे, तो बीजेपी सरकार उस NIA रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखकर हमेशा के लिए कांग्रेस के दावों को बेनकाब क्यों नहीं कर देती? आखिर उस रिपोर्ट में ऐसा क्या है जिसे सामने लाने से बचा जा रहा है?

सत्ता की जवाबदेही पर नेगी का प्रहार:

इसी सियासी कोलाहल के बीच रायगढ़ से एक बेहद प्रासंगिक और सीधा सवाल उठा है। रायगढ़ कांग्रेस के ग्रामीण जिला अध्यक्ष नगेंद्र नेगी ने सत्ता की दुखती रग पर हाथ रखा है।

नेगी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि, “जब जांच एजेंसियां केंद्र सरकार के अधीन हैं और राज्य में भी विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार है, तो झीरम घाटी कांड से जुड़ी तमाम जानकारियां और NIA की रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए।” नेगी का यह आरोप बेहद गंभीर है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय मुख्य मुद्दे और जांच रिपोर्ट पर बात करने के बजाय, सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी कर इस पूरे मामले को भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सत्ता से सवाल पूछना है, और नेगी का यह सवाल सीधे तौर पर सरकार की मंशा को कटघरे में खड़ा करता है।

अंतिम पन्ना: आज भी खाली हाथ हैं वो आंखें…

झीरम घाटी का सच आज ‘सत्ता’ और ‘विपक्ष’ के बीच फंसी एक ऐसी फाइल बन गया है, जिसे हर कोई अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहा है। एक तरफ वो लोग हैं जिन्होंने ‘जेब में सबूत’ होने का दावा करके 5 साल सत्ता का सुख भोगा, तो दूसरी तरफ वो सरकार है जो खुद NIA की रिपोर्ट को दबाए बैठी है। इन दोनों के बीच अगर कोई हार रहा है, तो वो हैं झीरम के शहीदों के परिवार… जो 13 साल बाद भी अदालत की चौखट और नेताओं के बयानों में सिर्फ ‘इंसाफ’ ढूंढ रहे हैं।

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