विकास की अंधी दौड़ में ‘राख’ होता रायगढ़; क्या अगली पीढ़ी को विरासत में सिर्फ बीमारियां मिलेंगी?







रायगढ़@TAKKAR न्यूज : छत्तीसगढ़ की ‘संस्कारधानी’ और ‘ऊर्जा राजधानी’ के रूप में विख्यात रायगढ़ जिला आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां विकास की परिभाषा धुंधली पड़ती जा रही है। चारों ओर फैली फैक्ट्रियों की चिमनियाँ और उनसे निकलता काला धुआं जिले की अर्थव्यवस्था को तो रफ्तार दे रहा है, लेकिन यहाँ की फिजाओं में ‘जहर’ घोल रहा है। सवाल यह है कि जिस विकास की कीमत आने वाली पीढ़ी को अपनी सेहत से चुकानी पड़े, क्या उसे वाकई विकास कहा जाना चाहिए?
धूल की चादर और सांसों पर पहरा: पर्यावरण का कत्ल..
रायगढ़ की सड़कों पर उड़ती फ्लाई ऐश (राख) और हवा में घुले पीएम 2.5 कणों ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। शहर से लेकर गांव तक, हर घर की छतों और पेड़ों के पत्तों पर जमी राख की मोटी परत यह बताने के लिए काफी है कि पर्यावरण विभाग की फाइलें भले ही ‘ग्रीन’ हों, लेकिन जमीन ‘ग्रे’ (धूसर) हो चुकी है।
• बीमारियों का गढ़: जिले के अस्पतालों में सांस की बीमारी, अस्थमा, सिलिकोसिस और चर्म रोगों के मरीजों की संख्या में 40% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
• प्रदूषित जल स्रोत: फैक्ट्रियों का प्रदूषित पानी और राख सीधे तौर पर नदी-नालों में मिल रहे हैं, जिससे भूजल स्तर न केवल गिर रहा है, बल्कि जहरीला भी हो रहा है।
स्थानीय रोजगार का ‘मृगतृष्णा’: आखिर क्यों उपेक्षित है स्थानीय युवा?
उद्योगों की स्थापना के समय प्रशासन और कंपनियां बड़े-बड़े वादे करती हैं कि स्थानीय लोगों को प्राथमिकता मिलेगी। लेकिन हकीकत इसके उलट है।
जांच का विषय: रायगढ़ के उद्योगों में उत्तर प्रदेश और बिहार के श्रमिकों की भारी तादाद एक गंभीर सवाल खड़ा करती है। क्या रायगढ़ का युवा अकुशल है? या फिर कंपनियां कम वेतन और बिना किसी कानूनी पचड़े के बाहरी मजदूरों को रखना ज्यादा सुरक्षित समझती हैं? स्थानीय युवाओं का आरोप है कि उन्हें केवल ‘चौकीदारी’ या ‘सफाई’ जैसे कामों तक सीमित रखा जाता है, जबकि तकनीकी और बेहतर पदों पर बाहरी लोगों का कब्जा है।
‘मूकदर्शक’ पर्यावरण विभाग: जनसुनवाई की साख पर सवाल?
रायगढ़ में पर्यावरण विभाग की भूमिका हमेशा से संदेह के घेरे में रही है। नियम कहते हैं कि यदि जनता का विरोध हो और पर्यावरण को अपूरणीय क्षति की संभावना हो, तो परियोजना को मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए।
• रस्म अदायगी बनी जनसुनवाई: जिले में होने वाली जनसुनवाइयां अब केवल एक संवैधानिक औपचारिकता बनकर रह गई हैं। हजारों की संख्या में विरोध प्रदर्शन और सैकड़ों आपत्तियों के बावजूद, अंततः रिपोर्ट ‘सहमति’ में कैसे बदल जाती है, यह एक रहस्य बना हुआ है।
• कार्यवाही में कोताही: जब भी प्रदूषण की शिकायत होती है, विभाग ‘नोटिस’ जारी कर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर लेता है। भारी जुर्माने या तालाबंदी जैसी सख्त कार्यवाही आज तक बड़े घरानों के खिलाफ देखने को नहीं मिली।
आगामी अडानी प्लांट की जनसुनवाई: लिटमस टेस्ट या फिर वही कहानी?
आने वाले कुछ दिनों में अडानी प्लांट को लेकर होने वाली जनसुनवाई ने जिले का पारा चढ़ा दिया है। यह न केवल प्रशासन के लिए बल्कि पर्यावरण विभाग के लिए भी एक ‘लिटमस टेस्ट’ है।
• जनता का रुख: स्थानीय ग्रामीण अपनी जमीन और हवा बचाने के लिए लामबंद हो रहे हैं।
• प्रशासनिक चुनौती: क्या प्रशासन इस बार विरोध के स्वरों को दबाएगा या फिर जनता की जायज चिंताओं को सरकार तक पहुंचाएगा? अगर इस बार भी जनसुनवाई में स्थानीय हितों की अनदेखी हुई, तो यह लोकतंत्र और पर्यावरण दोनों के लिए एक काला अध्याय होगा।
बड़ा सवाल: हम विरासत में क्या छोड़कर जा रहे हैं?
हम सड़कों का जाल बिछा रहे हैं, बड़े पावर प्लांट लगा रहे हैं, लेकिन क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक स्वच्छ वातावरण दे पा रहे हैं? यदि कल का बच्चा शुद्ध हवा के लिए तरसेगा और पानी के लिए बोतलों पर निर्भर रहेगा, तो यह करोड़ों का निवेश और विकास किस काम का?
रायगढ़ की जनता अब विकास का विरोध नहीं, बल्कि ‘जिम्मेदार विकास’ की मांग कर रही है। अब देखना यह है कि आगामी जनसुनवाई में विभाग जनता के पक्ष में खड़ा होता है या फिर औद्योगिक हितों की बलि वेदी पर रायगढ़ के भविष्य को चढ़ा दिया जाता है।
प्रशासन को चाहिए कि वह उद्योगों की मॉनिटरिंग के लिए एक पारदर्शी और डिजिटल सिस्टम बनाए, जिसमें आम नागरिक भी प्रदूषण की रियल-टाइम जानकारी देख सकें। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी है।












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