रायगढ़/बस्तर@TAKKAR न्यूज :- 9 अगस्त को पूरी दुनिया में विश्व आदिवासी दिवस का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा था, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के डूमरपालना गांव में तस्वीर बिल्कुल उलट थी। यहाँ का जश्न केवल उत्सव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रकृति, संस्कृति और अस्तित्व को बचाने की एक खौफनाक और सुलगती हुई हुंकार बन गया। बैलाडीला की पहाड़ियों में हो रहे अंधाधुंध लौह अयस्क (आयरन ओर) खनन ने यहाँ के आदिवासियों से उनका सब कुछ छीन लिया है। जंगलों की छाती पर चल रही मशीनों और पहाड़ों से निकल रहे लाल मलबे ने यहाँ की जीवनरेखा कही जाने वाली नदियों और उपजाऊ खेतों को रक्त रंजित और बंजर कर दिया है। आज बस्तर के आदिवासी केवल अपनी संस्कृति का पर्व नहीं मना रहे, बल्कि वे अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं।
जल, जंगल और जमीन पर मंडरा रहा है मौत का साया..
डूमरपालना और उसके आसपास के एक दर्जन से अधिक गांवों के आदिवासियों का जीवन पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है। उनके लिए जंगल और पहाड़ महज प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उनकी आजीविका, संस्कृति, परंपरा और पहचान का आधार हैं। लेकिन बैलाडीला पहाड़ियों से हो रहे भारी उत्खनन के कारण जो अपशिष्ट और लाल मिट्टी निकलती है, उसे पहाड़ों के पीछे के गांवों में फेंका जा रहा है। यह लाल मिट्टी लगातार खेतों में समा रही है, जिससे हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन पूरी तरह बंजर हो चुकी है। खेतों की उर्वरता नष्ट हो चुकी है, पानी पूरी तरह दूषित और लाल हो चुका है, और गाँवों के जलस्त्रोत दम तोड़ चुके हैं। जिस पानी से कभी बस्तर के परिवारों का पेट पलता था और खेती लहलहाती थी, वही लाल पानी आज उनके सामने सबसे बड़ा अभिशाप और सवाल बनकर खड़ा हो गया है।
खामोश प्रशासन और उद्योगपतियों की क्रूरता का शिकार बनता बस्तर..
आदिवासियों का आरोप है कि शासन और प्रशासन विकास के नाम पर आदिवासियों के विनाश का खेल खेल रहे हैं। बैलाडीला के विभिन्न डिपोजिट्स (जैसे डिपो नंबर 4 और डिपो नंबर 5) के खुलने से बस्तर की भौगोलिक और पर्यावरणीय स्थिति पूरी तरह तहस-नहस हो चुकी है। शुद्ध लोहे को देश-विदेश में ढोया जा रहा है, और उसका कचरा, डस्ट और लाल कीचड़ स्थानीय आदिवासियों के हिस्से में आ रहा है। स्थानीय युवा अर्जुन और अन्य ग्रामीणों ने दर्द बयां करते हुए बताया कि उन्होंने कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने अपनी आवाज उठाई, चक्काजाम और हड़तालें कीं, लेकिन उन्हें सिवाए झूठे आश्वासनों और मुआवजे के नाम पर छलावे के कुछ नहीं मिला। आज स्थिति यह है कि न तो खेत बचे हैं, न हरियाली और न ही मवेशी। सैकड़ों की संख्या में पेड़ सूख चुके हैं और जलजीव काल के गाल में समा चुके हैं।
संस्कृति बचेगी या कारखाने? आदिवासियों का दो टूक सवाल?
विश्व आदिवासी दिवस के मंच से डूमरपालना के बुजुर्गों और युवाओं ने एक स्वर में यह चेतावनी दे दी है कि यदि उनके जल, जंगल और जमीन को बचाने का संघर्ष यूं ही उपेक्षित किया गया, तो वे अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए अंतिम सांस तक लड़ेंगे। उनका साफ कहना है कि जब जंगल और पहाड़ ही नहीं बचेंगे, तो आदिवासी संस्कृति और परंपरा की रक्षा कैसे होगी? शहरों में बैठकर आदिवासी दिवस के नाम पर केवल राजनीतिक रोटियां सेकने वालों को बस्तर के इन सुलगते जंगलों की सुध लेनी होगी। ग्रामीणों का यह हुजूम इस बात का गवाह है कि बस्तर का आदिवासी अब डरने वाला नहीं है; वह अपने हक, अपने वजूद और अपनी माटी के लिए अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार है।
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