रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- जिले के पुसौर तहसील अंतर्गत ग्राम लारा में स्थापित मेसर्स एनटीपीसी लिमिटेड (NTPC) का सुपर थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट इन दिनों अपनी बेतहाशा बिजली उत्पादन के लिए कम और पर्यावरण के साथ किए जा रहे भद्दे खिलवाड़ के लिए ज्यादा चर्चा में है। विकास और ऊर्जा के नाम पर क्षेत्र की आबोहवा में जहर घोलने का सिलसिला लगातार जारी है। ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली खतरनाक राखड़ (फ्लाई ऐश) के समुचित और सुरक्षित परिवहन के कड़े नियमों को इस महारत्न कंपनी ने पूरी तरह से ताक पर रख दिया है। सरेआम उड़ती इस राख ने जहां एक ओर ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया है, वहीं खेतों की उपजाऊ मिट्टी भी बंजर होने की कगार पर पहुंच गई है। इस गंभीर अंधेरगर्दी को संज्ञान में लेते हुए क्षेत्रीय पर्यावरण कार्यालय, रायगढ़ ने एनटीपीसी प्रबंधन के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार किया है और लगातार पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति (जुर्माना) अधिरोपित कर यह साफ कर दिया है कि प्रकृति के साथ यह मनमानी अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
नियमों की धज्जियां और हवा में घुलता प्रदूषण..
ताप विद्युत संयंत्रों से जनित राखड़ का निष्पादन और परिवहन हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। इसके लिए पर्यावरण विभाग द्वारा स्पष्ट गाइडलाइन तय की गई है कि राखड़ का परिवहन पूरी तरह से ढके हुए वाहनों में, बिना किसी रिसाव के किया जाना चाहिए। लेकिन एनटीपीसी लारा के मामले में जमीनी हकीकत इन नियमों से कोसों दूर है। बेतरतीब और खुले ट्रकों में ले जाई जा रही राखड़ हवा में उड़कर पूरे इलाके को एक डस्ट चेंबर में तब्दील कर रही है। राहगीरों का सांस लेना दुश्वार हो गया है और दृश्यता कम होने से हादसों का अंदेशा भी बना रहता है। पर्यावरण विभाग के अधिकारियों द्वारा जब-जब औचक निरीक्षण किया गया या शिकायतें मिलीं, तब-तब एनटीपीसी प्रबंधन की इस घोर लापरवाही का पर्दाफाश हुआ है।
सुधरने को तैयार नहीं प्रबंधन, हर महीने हो रही दंडात्मक कार्रवाई..
हैरत की बात यह है कि पर्यावरण विभाग द्वारा बार-बार जुर्माना लगाए जाने के बावजूद एनटीपीसी प्रबंधन के रवैये में कोई खास सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। विभाग द्वारा की गई दंडात्मक कार्रवाइयों की फेहरिस्त इस बात की गवाही देती है कि कंपनी के लिए पर्यावरण से ज्यादा शायद अपने मुनाफे की चिंता है। आंकड़ों की इबारत बेहद चौंकाने वाली है। इस सिलसिले की शुरुआत 3 जून 2025 को हुई, जब राखड़ के अनुचित परिवहन पर विभाग ने सीधा 3,32,250 रुपये का भारी-भरकम जुर्माना ठोका। लगा कि शायद इस बड़ी कार्रवाई से प्रबंधन की नींद टूटेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी महीने 26 जून 2025 को फिर से नियमों की अनदेखी पकड़ी गई और 2,02,500 रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति अधिरोपित की गई।
यह सिलसिला यही नहीं रुका। जैसे-जैसे महीने बीतते गए, एनटीपीसी की लापरवाही की दास्तान और भी लंबी होती गई। 15 जुलाई 2025 को 61,500 रुपये और महज दो हफ्ते बाद 29 जुलाई 2025 को पुनः 67,500 रुपये का दंड लगाया गया। इसके बाद साल के अंत में 11 दिसंबर 2025 को एक बार फिर बड़ी लापरवाही सामने आई, जिसके एवज में विभाग ने 1,77,000 रुपये का जुर्माना लगाकर कंपनी को सख्त संदेश देने की कोशिश की।
नए साल में भी नहीं बदली पुरानी आदतें..
साल 2026 की शुरुआत भी एनटीपीसी लारा के लिए पुरानी गलतियों के दोहराव के साथ हुई। जनवरी का महीना राखड़ परिवहन की बदइंतजामी का सबसे बड़ा गवाह बना। 2 जनवरी 2026 को 59,250 रुपये का जुर्माना लगा। इसके महज तीन दिन बाद 5 जनवरी को 52,425 रुपये का एक और नोटिस थमा दिया गया। हद तो तब हो गई जब 7 जनवरी 2026 को एक ही दिन में दो अलग-अलग मामलों में 60,000 रुपये और 30,000 रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई गई। यह साफ दर्शाता है कि संयंत्र से निकलने वाली राखड़ का परिवहन पूरी तरह से बेलगाम हो चुका था और ठेकेदारों पर कंपनी का कोई नियंत्रण नहीं रह गया था।
फरवरी और मार्च के महीनों में भी जुर्माने का यह मीटर बदस्तूर चालू रहा। 13 फरवरी 2026 को 55,245 रुपये और 18 फरवरी को 57,000 रुपये का आर्थिक दंड लगाया गया। इसके बाद मार्च में भी हवा में राखड़ उड़ने की घटनाएं सामने आईं, जिस पर 18 मार्च 2026 को 59,250 रुपये और 20 मार्च को 60,000 रुपये की पेनाल्टी लगाई गई।
लाखों की पेनाल्टी: क्या चंद रुपयों से वापस लौटेगी शुद्ध हवा?
गर्मी के मौसम में राखड़ उड़ने की समस्या और भी विकराल हो जाती है। इसे देखते हुए अप्रैल और मई 2026 में भी पर्यावरण विभाग ने अपनी कार्रवाई तेज रखी। 7 अप्रैल 2026 को एक बार फिर नियमों की भारी धज्जियां उड़ती मिलीं, जिसके चलते 1,70,010 रुपये का तगड़ा जुर्माना लगाया गया। इसके बाद 24 अप्रैल को 61,500 रुपये का दंड वसूला गया। मई के महीने में भी 4 मई को 60,000 रुपये, 13 मई को 55,500 रुपये और हाल ही में 21 मई 2026 को 43,650 रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति एनटीपीसी प्रबंधन पर लादी गई है।
पिछले एक साल के भीतर लगाए गए इन तमाम जुर्मानों को जोड़ दिया जाए, तो यह राशि 16 लाख रुपये के पार चली जाती है। यह महज कुछ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि विकास के नाम पर स्थापित किए गए ये संयंत्र पर्यावरण को कितनी गहरी चोट पहुंचा रहे हैं। क्षेत्रीय कार्यालय रायगढ़ की यह सख्ती काबिले तारीफ जरूर है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या केवल आर्थिक जुर्माना लगाकर इस 'उड़ते जहर' को रोका जा सकता है? यदि मेसर्स एनटीपीसी लिमिटेड लारा ने जल्द ही राखड़ परिवहन की कोई ठोस और सुरक्षित वैज्ञानिक कार्ययोजना लागू नहीं की, तो वह दिन दूर नहीं जब यह पूरा क्षेत्र एक बड़े पर्यावरणीय और मानवीय संकट की चपेट में आ जाएगा। अब समय आ गया है कि प्रशासन केवल जुर्माना वसूलने तक सीमित न रहे, बल्कि इस जानलेवा लापरवाही पर पूर्ण रूप से अंकुश लगाने के लिए कोई निर्णायक और कठोर कदम उठाए।
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