नई दिल्ली@TAKKAR न्यूज :- देश की राजधानी का हृदय कहे जाने वाले जंतर-मंतर की हवाओं में इन दिनों बेचैनी और आक्रोश का मिला-जुला अक्स तैर रहा है। जो जंतर-मंतर दशकों से भारतीय लोकतंत्र में असहमतियों, आंदलनों और शोषितों की आवाज़ का सबसे बड़ा गवाह रहा है, वह एक बार फिर पुलिसिया बूटों की थाप और सत्ता के दमन चक्र का मूक दर्शक बन गया। नीट (NEET) पेपर लीक जैसी राष्ट्रीय शर्मिंदगी की निष्पक्ष जांच और देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले 21 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे प्रख्यात शिक्षाविद और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक को जिस नाटकीय और बलपूर्वक तरीके से पुलिस ने उठाया, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।
शनिवार की अहले सुबह, जब देश का एक बड़ा हिस्सा गहरी नींद में था, तब दिल्ली पुलिस के जवान सादे लिबास में जंतर-मंतर पहुंचते हैं। यह कोई सामान्य पुलिसिया गश्त नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। पुलिस के जवानों ने प्रदर्शनकारियों की नजरों और कैमरों के लेंस से सच्चाई को छिपाने के लिए सफेद चादरों का एक अभेद्य घेरा बनाया। इसी सफेद पर्दापोशी के बीच, 21 दिनों से भूखे, शारीरिक रूप से कमजोर लेकिन इरादों से फौलाद बन चुके सोनम वांगचुक को जबरन उठाया गया और दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। इस कार्रवाई ने रातों-रात एक शांत और गांधीवादी तरीके से चल रहे अनशन को उग्र राजनीतिक और सामाजिक बहस के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
सत्ता प्रतिष्ठान और दिल्ली पुलिस इस पूरी कार्रवाई को पूर्णतः कानूनी और मानवीय जामा पहनाने की कोशिश कर रहे हैं। पुलिस प्रशासन का स्पष्ट तर्क है कि यह कोई राजनीतिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश का अनुपालन है जिसमें वांगचुक की लगातार गिरती सेहत और 9 किलो से अधिक वजन कम होने के बाद उनके नियमित मेडिकल चेकअप और आवश्यकता पड़ने पर इलाज की बात कही गई थी। सत्ताधारी दल के प्रवक्ताओं का भी यही कहना है कि सरकार के लिए एक नागरिक के प्राणों की रक्षा सर्वोपरि है और अदालत के निर्देशों का अक्षरशः पालन किया गया है।
लेकिन, इस सरकारी तर्क की कलई खुद सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो के बयानों से उखड़ती नजर आती है। गीतांजलि ने पुलिस और प्रशासन के दावों को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक सुनियोजित सरकारी साजिश करार दिया है। उनका साफ कहना है कि सफदरजंग के ही डॉक्टरों द्वारा किए गए चेकअप में वांगचुक के शरीर के सभी मानक (वाइटल्स) बिल्कुल सामान्य थे। प्रशासन की तरफ से पोटैशियम का स्तर 2.9 बताकर जान का खतरा बताया गया, जबकि गीतांजलि का दावा है कि असल में यह स्तर 4.3 था जो कि पूर्णतः सामान्य है। सबसे बड़ा सवाल जो गीतांजलि ने खड़ा किया, वह यह कि यदि पुलिस की मंशा केवल स्वास्थ्य लाभ देने की थी, तो परिजनों को कोई मेडिकल रिपोर्ट क्यों नहीं दिखाई गई? बिना सहमति के उन्हें अस्पताल में क्यों और कैसे कैद कर लिया गया?
दरअसल, इस पूरी पुलिसिया कार्रवाई के पीछे की असल क्रोनोलॉजी को समझने के लिए हमें 20 जुलाई की उस तारीख पर गौर करना होगा, जिसने सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी थी। सोनम वांगचुक और उनके समर्थकों ने 20 जुलाई को संसद भवन तक एक विशाल मार्च निकालने का ऐलान किया था। सरकार इस बात को भली-भांति जानती थी कि नीट पेपर लीक से आहत देश का युवा पहले से ही बारूद के ढेर पर बैठा है। अगर वांगचुक की अगुवाई में यह संसद मार्च निकलता, तो यह केवल दिल्ली की सड़कों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक छात्रों के आक्रोश का एक ऐसा जन सैलाब उमड़ता, जिसे संभालना मौजूदा सरकार के लिए लोहे के चने चबाने जैसा साबित होता। विपक्ष का भी यही आरोप है कि सरकार ने वांगचुक की सेहत के बहाने दरअसल उस संभावित तूफान को अस्पताल के एक कमरे में कैद करने की साजिश रची है।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर देश की सियासत का तापमान सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। विपक्षी दल, जिनमें कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी मुख्य रूप से शामिल हैं, सरकार पर अलोकतांत्रिक होने और तानाशाही रवैया अपनाने का संगीन आरोप लगा रहे हैं। विपक्ष का तर्क है कि आज़ाद भारत के इतिहास में यह कैसी विडंबना है कि 93 से अधिक पेपर लीक होने के बावजूद शिक्षा मंत्री अपने पद पर विराजमान हैं, और जब देश का कोई नागरिक इसके खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठाता है, तो उसे रातों-रात किडनैप कर लिया जाता है। 21 दिनों तक चले इस आमरण अनशन के दौरान देश के प्रधानमंत्री या सरकार के किसी भी प्रतिनिधि ने प्रदर्शनकारियों से संवाद करने की जहमत तक नहीं उठाई। जो प्रधानमंत्री 'परीक्षा पे चर्चा' के भव्य आयोजन करते हैं, उनका 'पेपर लीक' जैसे ज्वलंत मुद्दे पर रहस्यमयी मौन और अनशनकारियों के प्रति संवेदनहीनता, कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
दूसरी ओर, इस आंदोलन की रूपरेखा और इसके भटकाव को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कई वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों का मानना है कि जो आंदोलन विशुद्ध रूप से छात्रों के भविष्य और नीट पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ था, वह जंतर-मंतर पर आते-आते अपनी मूल दिशा से भटक गया। आरोप हैं कि इस मंच को वामपंथी छात्र संगठनों, स्टैंड-अप कॉमेडियंस और अन्य असंबद्ध समूहों ने हाईजैक कर लिया था। जहां छात्रों के भविष्य पर गंभीर विमर्श होना चाहिए था, वहां गिटार बजाए जा रहे थे, विदेशी तर्ज पर गाने गाए जा रहे थे और यह आंदोलन एक गंभीर सत्याग्रह के बजाय एक 'पिकनिक स्पॉट' में तब्दील होता नजर आ रहा था। यही कारण है कि इसे 2011 के अन्ना आंदोलन जैसा व्यापक जन समर्थन हासिल नहीं हो सका।
हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने अब इस दमन के विरोध में स्वयं भूख हड़ताल शुरू कर दी है और सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग कर डाली है। इससे स्पष्ट है कि सरकार भले ही वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाने में कामयाब हो गई हो, लेकिन विरोध की जो चिंगारी सुलग चुकी है, वह इतनी आसानी से बुझने वाली नहीं है।
अंततः, यह पूरा घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य को लेकर एक गहरी चिंता पैदा करता है। क्या हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहां संवाद की जगह सफेद चादरों ने ले ली है? क्या शांतिपूर्ण असहमति को अब पुलिसिया बूटों तले रौंदना ही नया 'न्यू नॉर्मल' बन गया है? सोनम वांगचुक आज भले ही सफदरजंग अस्पताल की दीवारों के पीछे हों, लेकिन जंतर-मंतर की खाली हुई वह जगह देश के हुक्मरानों से चीख-चीख कर पूछ रही है कि सवा सौ करोड़ के इस लोकतंत्र में छात्रों के भविष्य और नागरिकों की अभिव्यक्ति की आज़ादी की असल कीमत क्या रह गई है? यह लड़ाई अब केवल नीट परीक्षा तक सीमित नहीं है, यह लड़ाई अब लोकतंत्र में सवाल पूछने के उस मौलिक अधिकार की है, जिसे सत्ता की सफेद चादरों से ढंकने का एक क्रूर और असफल प्रयास किया गया है।
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