रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- छतीसगढ़ के रायगढ़ जिले में आदिवासी जमीनों की लूट और राजस्व विभाग के अधिकारियों की बेशर्म मिलीभगत का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जो सत्ता और रसूख के आगे कानून के बौने होने की गवाही दे रहा है। पुसौर तहसील के ग्राम नवापाली में स्थित खसरा नंबर 32/8 की कहानी महज एक जमीन की खरीद-बिक्री का विवाद नहीं है, बल्कि यह उस भ्रष्ट तंत्र का जीता-जागता सबूत है जहां पैसों की खनक के आगे आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को सरेआम कुचला जा रहा है। राजनीतिक रसूख और राजस्व विभाग के भ्रष्ट गठजोड़ के दम पर यहां भूमिहीन आदिवासियों को आबंटित शासकीय जमीन को भू-माफियाओं की जागीर में तब्दील कर दिया गया है।
यह रहस्यमयी और चौंकाने वाला मामला ग्राम नवापाली के एक गरीब भूमिहीन आदिवासी हीरालाल सिदार से जुड़ा है, जिनके पूर्वजों को शासन ने जीवन-यापन के लिए जमीन आबंटित की थी। कानूनन इस जमीन को बिना सक्षम न्यायालय या जिला कलेक्टर की अनुमति के बेचना या खरीदना पूर्णतः प्रतिबंधित है। लेकिन राजस्व विभाग के 'भगवान' रूपी पटवारियों और राजस्व निरीक्षकों (RI) ने कागजों में ऐसा चमत्कार किया कि वर्ष 2012 से 2014 के बीच महज एक फर्जी डायवर्शन के आधार पर यह आदिवासी जमीन एक स्कूल कारोबारी फागू लाल सिंह के नाम पर फर्जी तरीके से रजिस्ट्री कर दी गई। बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि एक आदिवासी को आबंटित शासकीय भूमि का व्यावसायिक डायवर्शन आखिर कैसे हो गया? बिना किसी सक्षम अनुमति के इसे सामान्य वर्ग के व्यक्ति के नाम नामांतरित कैसे कर दिया गया? यह कृत्य स्पष्ट रूप से भू-राजस्व संहिता की धारा 170 (ख) का खुला उल्लंघन है, जिस पर राजस्व अमले ने आपराधिक चुप्पी साधे रखी।
इस फरेब की दास्तान यहीं खत्म नहीं होती। खुद को पाक-साफ बताने वाले स्कूल संचालक फागू लाल सिंह ने शुरुआत में मीडिया और स्थानीय प्रशासन की आंखों में धूल झोंकते हुए दावा किया था कि उसने यह जमीन 'गुरु द्रोण स्कूल समिति' के तहत स्कूल और छात्रावास बनाने के लिए आदिवासी परिवार की सहमति से खरीदी है और इसे कभी बेचा नहीं जाएगा। लेकिन चंद सालों बाद ही इस लालची कारोबारी ने अपने तमाम वादों को दरकिनार करते हुए यह विवादित जमीन शहर के एक बेहद रसूखदार भू-माफिया प्रमोद कुमार अग्रवाल को बेच दी। आज आलम यह है कि ऑनलाइन 'भुइयां' ऐप के सरकारी रिकॉर्ड में यह जमीन प्रमोद अग्रवाल के नाम पर दर्ज है, जबकि मौके पर बोर्ड आज भी फागू लाल का लगा हुआ है। अब इस बेशकीमती आदिवासी जमीन को छोटे-छोटे टुकड़ों (प्लॉट) में बांटकर भारी मुनाफे में बेचने की तैयारी चल रही है और मौके पर अवैध रूप से डेवलपमेंट का कार्य भी धड़ल्ले से जारी है।
स्थानीय सूत्रों की मानें तो भू-माफिया प्रमोद कुमार अग्रवाल की पहुंच और धाक इतनी मजबूत है कि उसने टीवी टावर, अतरमुड़ा, एकताल, बिंजकोट, गोपालपुर, जामगांव, टारपाली और मेडिकल कॉलेज के आसपास के इलाकों में सैकड़ों एकड़ ऐसी शासकीय और आदिवासी जमीनों को कलेक्टर की अनुमति के बिना औने-पौने दामों में हड़प लिया है। प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का वह कथन यहां पूरी तरह से चरितार्थ होता है कि 'आरआई और पटवारी खुद को भगवान समझने लगे हैं।' इन्हीं भ्रष्ट अधिकारियों के आशीर्वाद से एक गरीब आदिवासी की जमीन रातों-रात रसूखदार कारोबारियों की तिजोरी भरने का साधन बन जाती है और असली हकदार दर-दर भटकने को मजबूर हो जाता है।
इस पूरे महाघोटाले पर जब रायगढ़ के एसडीएम महेश शर्मा से सवाल किया गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि साक्ष्यों के आधार पर शिकायत की जाती है, तो निश्चित तौर पर कड़ी कार्रवाई होगी और कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी के संज्ञान में प्रकरण लाकर इस अवैध खरीद-बिक्री में संलिप्त सभी लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया जाएगा। लेकिन यक्ष प्रश्न यह उठता है कि इतने संवेदनशील और गैरकानूनी मामले में प्रशासन किसी शिकायतकर्ता का इंतजार क्यों कर रहा है? क्या जिला प्रशासन को स्वतः संज्ञान लेकर इस अवैध पंजीयन को तत्काल निरस्त करते हुए भ्रष्ट राजस्व अधिकारियों और भू-माफियाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं करनी चाहिए? यह मामला केवल एक जमीन के टुकड़े का नहीं, बल्कि सिस्टम की उस दीमक का है जो आदिवासियों के अधिकारों को खोखला कर रही है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस पर कब जागता है। इस बड़े खुलासे के अगले अंक में हम इस भूमि सिंडिकेट से जुड़े कुछ और नए चेहरों और ताजा अपडेट्स से पर्दा उठाएंगे।
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