रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- जिले के तमनार ब्लॉक का नागरामुड़ा जंगल आज सिर्फ पेड़ों के कटने का गवाह नहीं बना, बल्कि उसने एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के चीरहरण और कॉरपोरेट जगत की असीमित क्रूरता को अपनी खुली आंखों से देखा है। विकास की उस अंधी और रक्तरंजित दौड़ में, जहां मुनाफे की भूख इंसानी संवेदनाओं को निगल जाती है, वहां सबसे पहले हाशिए पर खड़े उन आदिवासियों की बलि चढ़ाई जाती है, जिनका जीवन जल, जंगल और जमीन के बिना शून्य है। आज सुबह जब नागरामुड़ा के शांत और पवित्र जंगलों में जिंदल पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) की भारी-भरकम कटर मशीनों की कानफोड़ू गर्जना गूंजी, तो वह महज लकड़ी काटने की आवाज नहीं थी, बल्कि वह उन हजारों ग्रामीणों के सीने पर चलने वाली आरी थी, जिन्होंने इन पेड़ों को अपनी संतानों की तरह सींचा और सहेजा था। पूरी पुलिसिया ताकत और प्रशासनिक अमले की सरपरस्ती में आज कॉरपोरेट ने न केवल प्रकृति का कत्लेआम किया, बल्कि अपने ही किए गए वादों की सरेआम हत्या कर दी।
भरोसे का कत्ल और एक कॉरपोरेट का 'सफेद झूठ'
यह पूरा घटनाक्रम किसी खौफनाक साजिश से कम नहीं है, जिसकी पटकथा कुछ ही दिनों पहले बड़ी ही चालाकी से लिखी गई थी। इसी महीने की पहली तारीख को जेएसपीएल के जनसंपर्क अधिकारी ने एक सार्वजनिक मंच से पूरी ढिठाई के साथ मीडिया और ग्रामीणों की आंखों में धूल झोंकते हुए यह दावा किया था कि इस खदान परियोजना के लिए किसी भी कीमत पर पेड़ों की कटाई नहीं होगी। उस झूठे आश्वासन ने आंदोलनरत ग्रामीणों को एक पल के लिए यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि शायद कंपनी के भीतर इंसानियत और प्रकृति के लिए थोड़ी सी जगह बची है। लेकिन आज का दिन उस 'सफेद झूठ' के बेनकाब होने का दिन था। आज जब अत्याधुनिक मशीनों का जत्था जंगल का सीना चीरने पहुंचा, तो ग्रामीणों को यह समझते देर नहीं लगी कि वह बयान केवल उनके उग्र होते जन-आक्रोश को शांत करने और उनकी एकता में सेंध लगाने का एक कूटनीतिक षड्यंत्र था। यह उस विश्वास का कत्ल है, जिसके बाद अब विस्थापन और मुआवजे के नाम पर कंपनी द्वारा बांटे जाने वाले किसी भी प्रलोभन पर यकीन करना आत्महत्या के समान होगा।
सत्ता की खामोशी और कुचले जाते संवैधानिक अधिकार
इस विनाशलीला के बीच जो सबसे डरावना पहलू उभर कर सामने आया है, वह है राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की रहस्यमयी और शर्मनाक खामोशी। एक ऐसा देश जहां संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून के तहत आदिवासियों को ग्राम सभा के माध्यम से अपने संसाधनों पर सर्वोच्च अधिकार दिया गया है, वहां उसी ग्राम सभा को जूतों तले रौंद कर यह कटाई की जा रही है। जब यह गैरकानूनी और अनैतिक कृत्य चल रहा था, तब प्रशासन कहां था? क्या सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों के कान इतने बहरे हो चुके हैं कि उन्हें मशीनों के आगे जान की बाजी लगाकर लेटे हुए आदिवासियों की चीखें सुनाई नहीं दे रही हैं? विडंबना देखिए कि जिस पुलिस बल का गठन आम आदमी के अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ था, वह आज पूरी बेशर्मी से एक उद्योगपति के निजी सुरक्षा गार्ड की भूमिका में नजर आ रही है। यह मौन स्वीकृति इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि प्रशासन ने कॉरपोरेट के रसूख और तिजोरी के सामने अपने घुटने टेक दिए हैं।
प्रलय को आमंत्रण: एक लाख पेड़ों की चिता पर विकास का महल
यदि हम इसे केवल एक गांव या जिले की समस्या मान रहे हैं, तो यह हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। करीब एक लाख पेड़ों को मशीनों के खूनी जबड़े में सौंप देना कोई सामान्य घटना नहीं है; यह एक पूरे के पूरे पारिस्थितिक तंत्र की निर्मम हत्या है। आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, बेतहाशा बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन जैसी विनाशकारी महामारियों से त्राहि-त्राहि कर रही है, तब इतनी बड़ी तादाद में हरे-भरे पेड़ों को काटना मानवता के खिलाफ एक अपराध है। नागरामुड़ा के जंगल सिर्फ लकड़ी के भंडार नहीं हैं; वे इस क्षेत्र की जलवायु के रक्षक हैं, भूजल स्तर के प्रहरी हैं। इन जंगलों के कटने से न केवल पर्यावरण का संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि यहां रहने वाले हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका की रीढ़ हमेशा के लिए टूट जाएगी। महुआ, तेंदूपत्ता, साल बीज और चार-चिरौंजी के सहारे अपने जीवन की गाड़ी खींचने वाले ये मूलनिवासी अब अपने ही घर में शरणार्थी बनने को मजबूर हो जाएंगे। क्या कोई भी आर्थिक पैकेज इन पीढ़ियों पुरानी संस्कृति और प्राकृतिक संपदा की भरपाई कर सकता है? कतई नहीं।
बारूद के ढेर पर बैठा तमनार: क्रांति की एक स्पष्ट आहट
धोखे और छलावे के इस खेल ने पूरे तमनार क्षेत्र को एक धधकते ज्वालामुखी के मुहाने पर ला खड़ा किया है। ग्रामीणों का धैर्य अब अपनी अंतिम सीमाएं लांघ रहा है। जब शांतिपूर्ण तरीके से किए गए विरोध, ग्राम सभा के संवैधानिक प्रस्तावों और आंखों के आंसुओं को व्यवस्था रद्दी की टोकरी में डाल देती है, तब आक्रोश का सैलाब सड़कों पर उतरने के लिए विवश हो जाता है। पिछले साल दिसंबर में लिबरा और धौराभाठा में जो हिंसक मंजर देखने को मिला था, वह इसी प्रशासनिक हठधर्मिता का परिणाम था। उस वक्त भी शासन-प्रशासन की जिद ने हालात को बेकाबू कर दिया था, जिसमें कई जानें दांव पर लग गई थीं। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि न तो जिंदल प्रबंधन ने अतीत की उन लपटों से कोई सबक सीखा है और न ही जिला प्रशासन ने अपनी कुंभकर्णी नींद त्यागी है।
नागरामुड़ा का यह संघर्ष अब उस निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां से पीछे हटने का मतलब है अपना अस्तित्व, अपनी पहचान और अपना सब कुछ खो देना। यह लड़ाई अब सिर्फ एक जंगल को बचाने की नहीं रह गई है, बल्कि यह कॉरपोरेट की अंतहीन लालच के खिलाफ मनुष्य और प्रकृति के सह-अस्तित्व की हुंकार बन चुकी है। यदि सरकार ने समय रहते इस अलोकतांत्रिक कटाई पर रोक लगाकर न्याय का पक्ष नहीं लिया, तो इतिहास के पन्नों में यह दर्ज किया जाएगा कि जब रायगढ़ के सीने पर आरी चल रही थी, तब लोकतंत्र के रखवाले किसी कॉरपोरेट के साथ मुनाफे का बंटवारा कर रहे थे। वक्त आ गया है कि सरकार कॉरपोरेट की गोद से उठकर अपने नागरिकों के साथ खड़ी हो, अन्यथा नागरामुड़ा की यह चिंगारी एक ऐसे जनांदोलन को जन्म देगी, जिसकी लपटों को संभालना किसी भी व्यवस्था के लिए नामुमकिन हो जाएगा।
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