रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- छत्तीसगढ़ की राजनीति में शांत नजर आने वाला रायगढ़ विधानसभा क्षेत्र अचानक एक हाई-वोल्टेज सियासी अखाड़े में तब्दील हो चुका है। सूबे के कद्दावर वित्त मंत्री और सत्ता के केंद्र बिंदु ओ.पी. चौधरी की मजबूत सियासी किलेबंदी के बीच, कांग्रेस ने एक अप्रत्याशित और धारदार रणनीति के तहत अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। भले ही ऊपर से यह एक सहज जन्मदिन का आयोजन प्रतीत हो, लेकिन इसके सियासी निहितार्थ इतने गहरे हैं कि इसने भाजपा खेमे में हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस के इस शक्ति प्रदर्शन ने साफ कर दिया है कि पार्टी ने अब 'नेट प्रैक्टिस' छोड़ सीधे तौर पर मुख्य पिच पर ताबड़तोड़ बल्लेबाजी का आगाज़ कर दिया है।

जन्मदिन का बहाना या शक्ति प्रदर्शन का नायाब पैंतरा?

गत 9 अगस्त को रायगढ़ में जो राजनीतिक नजारा देखने को मिला, उसने राजनीतिक गणित को हिला कर रख दिया। अवसर था रायगढ़ विधानसभा के अजेय योद्धा रहे, लगातार 23 वर्षों तक अपनी राजनीतिक धाक जमाने वाले पूर्व विधायक एवं मंत्री कृष्णकुमार गुप्ता के जन्मदिन का। इस आयोजन को मात्र एक पारिवारिक उत्सव समझना राजनीतिक भूल होगी। यह एक सुनियोजित सियासी शो था, जहां कांग्रेस के दिग्गजों का जमावड़ा लगा और कृष्णा जी के वफादार कार्यकर्ताओं का हुजूम सड़कों पर उतर आया।

इस आयोजन की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत, पूर्व विधायक नोबल वर्मा, पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल, लैलूंगा विधायक लालजीत सिंह राठिया, मेनका सिंह, परिवेश मिश्र, सारंगढ़ की पूर्व विधायक पद्मरा मनहर (पद्मा मनहर), पूर्व विधायक प्रकाश नायक और विधायक कविता प्राण लहरें जैसे दिग्गज एक मंच पर नजर आए। पूर्वांचल और पुसौर क्षेत्र से आए सैकड़ों कार्यकर्ताओं की भीड़ ने इसे एक विराट राजनीतिक रैली में तब्दील कर दिया।

लैलूंगा की त्रासदी और मंच से दिया गया बड़ा सियासी संदेश

राजनीतिक कार्यक्रमों में कई बार अप्रत्याशित परिस्थितियां बड़े संदेश दे जाती हैं। जन्मदिन के ठीक उसी दिन कांग्रेस खेमे के लिए एक दुखद खबर भी आई, जब लैलूंगा विधानसभा क्षेत्र की विधायक श्रीमती विद्यावती सिदार के पति कुंजबिहारी सिदार का निधन हो गया।

इस संवेदनशील मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि यदि वे लैलूंगा की इस दुख की घड़ी में शामिल हुए बिना सीधे इस कार्यक्रम में आते, तो रायगढ़ की मीडिया में इसे लेकर अलग ही सियासी बवाल खड़ा होता। यह बयान इस बात का गवाह था कि कांग्रेस नेतृत्व हर कदम बेहद नपे-तुले अंदाज में उठा रहा है।

उत्तराधिकार की घोषणा और अरुण गुप्ता की एंट्री

इस पूरे आयोजन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने माइक संभालते हुए खुला ऐलान कर दिया। उन्होंने कृष्णकुमार गुप्ता के संघर्षों और पार्टी के प्रति निष्ठा का जिक्र करते हुए सीधे तौर पर कहा कि अब समय आ गया है कि गुप्ता जी अपने बेटे अरुण कुमार गुप्ता को अपना राजनीतिक आशीर्वाद दें और उन्हें आगे लाकर कांग्रेस के साथ जोड़कर काम करें।

महंत के इस बयान ने इशारों-इशारों में अरुण गुप्ता को रायगढ़ की मुख्यधारा की राजनीति में प्रमोट करने का खुला संकेत दे दिया है। रायगढ़ की सियासत में पिछले कुछ समय से अग्रवाल समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व लगातार कम होता जा रहा है। इस दर्द को मंच से हवा देते हुए महंत ने याद दिलाया कि कृष्णकुमार गुप्ता ने अपने समाज और इस क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक कार्य किए हैं—यहांतक कि उद्योगपति ओ.पी. जिंदल को रायगढ़ लाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जयसिंह अग्रवाल का उदाहरण देते हुए यह जताया गया कि समाज की उम्मीदें अब किस दिशा में हैं। इन समीकरणों से साफ जाहिर है कि कांग्रेस आने वाले दिनों में अग्रवाल समाज के प्रतिनिधित्व के रूप में अरुण कुमार गुप्ता को अपना मुख्य दावेदार पेश करने की तैयारी में है।

कार्यकर्ताओं की कसौटी और अरुण गुप्ता के सामने खड़ी चुनौतियाँ

पोस्टर और मंचों से उत्तराधिकार सौंप देना जितना आसान होता है, जमीन पर उसकी स्वीकार्यता हासिल करना उतना ही टेढ़ी खीर होता है। कांग्रेस ने भले ही अरुण गुप्ता को आगे बढ़ाने का दांव चल दिया हो, लेकिन इसके व्यावहारिक धरातल पर कई गंभीर सवाल खड़े हैं।

जो आम कार्यकर्ता सालों-साल केवल 'कृष्णा जी' के नाम पर कांग्रेस का झंडा उठाए फिरते थे, क्या वे उतनी ही सहजता से अरुण कुमार गुप्ता को अपना नेता स्वीकार कर पाएंगे? यह सवाल आज रायगढ़ के हर उस कार्यकर्ता के जेहन में है जो पार्टी की रीढ़ हैं। सच्चाई यह है कि आम कार्यकर्ताओं के बीच अभी तक अरुण गुप्ता का वह जमीनी परिचय नहीं बन पाया है, जिसकी दरकार एक जननेता को होती है।

जन्मदिन के इस जलसे में शिरकत करने वाले कुछ कार्यकर्ताओं से जब बात की गई, तो मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ का कहना था कि पार्टी आलाकमान जिसे भी उम्मीदवार तय करेगा, वे उसका समर्थन करेंगे। वहीं, कुछेक ने दबी जुबान में यह सवाल भी उठाया कि क्या आने वाला नेतृत्व कृष्णा जी की तरह आम कार्यकर्ताओं को वह मान-सम्मान दे पाएगा? यह तो वक्त ही तय करेगा कि अरुण गुप्ता इन कार्यकर्ताओं के दिलों में कितनी जगह बना पाते हैं। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस जन्मदिन के बहाने जिस भारी संख्या में भीड़ ने ताकत दिखाई है, यदि यह पूरा नेटवर्क सही मायनों में अरुण गुप्ता के पाले में शिफ्ट हो जाता है, तो रायगढ़ की राजनीति में भूचाल आना तय है।

ओ.पी. चौधरी की 'बैटिंग पिच' बनाम कांग्रेस का नया 'गेम प्लान'

दूसरी तरफ, रायगढ़ के राजनीतिक परिदृश्य के मुख्य संचालक और प्रदेश के वित्त तथा आवास मंत्री ओ.पी. चौधरी ने अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक सूझबूझ से 2028 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए विकास की एक बेहद मजबूत पिच तैयार कर रखी है। उनके द्वारा क्षेत्र में किए जा रहे ताबड़तोड़ विकास कार्यों के आगे विपक्ष लंबे समय तक रक्षात्मक मुद्रा में नजर आ रहा था।

लेकिन इस आयोजन ने साबित कर दिया है कि कांग्रेस अब चुप बैठने वाली नहीं है। क्या अरुण गुप्ता इस मजबूत राजनीतिक मैदान में उतरकर लंबी पारियां खेल पाएंगे? क्या वे अपनी बैटिंग से ओ.पी. चौधरी की गेंदबाजी पर चौके और छक्कों की बरसात कर सकेंगे? क्या वे ओ.पी. चौधरी द्वारा बिछाए गए क्षेत्ररक्षण को भेदकर सत्ता के किले को ध्वस्त कर पाएंगे या मैदान पर चारों खाने चित्त हो जाएंगे?

इन सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन यह अकाट्य सत्य है कि कांग्रेस ने ओ.पी. चौधरी की धारदार गेंदबाजी पर आक्रामक बैटिंग करने के लिए अपनी रणनीति को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। इस सियासी हलचल के बाद अब भाजपा और खुद ओ.पी. चौधरी के खेमे को भी यह समझ लेना होगा कि वे अपनी वर्तमान स्थिति को लेकर आत्ममुग्धता में न रहें। कांग्रेस की इस चाल को मात देने के लिए भाजपा को अपना क्षेत्ररक्षण और अधिक चाक-चौबंद करना होगा, अन्यथा यह जन्मदिन का बहाना कब एक बड़े सियासी तूफान में बदल जाएगा, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल होगा। रायगढ़ का यह राजनीतिक रणक्षेत्र अब और अधिक रोमांचक और संघर्षपूर्ण होने जा रहा है!