रायगढ़/TAKKAR न्यूज@दीपक शोभवानी :- कलयुग के इस भागदौड़ भरी दुनिया में अगर कोई आपसे कहे कि किसी गांव में आज तक सांप या बिच्छू के डंक से किसी की जान नहीं गई है, तो शायद आप एक पल के लिए यकीन नहीं करेंगे। विज्ञान के इस दौर में चमत्कारों की कहानियों को लोग अक्सर कोरी कल्पना मान लेते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के पुसौर ब्लॉक में बसा ग्राम कलमीगुड़ी आज भी एक ऐसा जीवंत और रहस्यमयी सत्य है, जिसे देखकर अच्छे-अच्छे नास्तिकों का सिर भी श्रद्धा से झुक जाता है। रायगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह छोटा सा गांव, जिसकी आबादी महज 500 लोगों के आसपास है, इन दिनों देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है।
जब महाशिवरात्रि का पावन पर्व आता है, तब इस शांत और छोटे से गांव का नजारा किसी महाकुंभ में बदल जाता है। रायगढ़ के स्थानीय लोगों के अलावा पड़ोसी राज्यों जैसे बिहार, झारखंड और ओडिसा से भी शताधिक संख्या में श्रद्धालु कई किलोमीटर की लंबी और कठिन यात्रा तय करके भगवान गुप्तेश्वर महादेव के दर्शन के लिए यहां खिंचे चले आते हैं। ग्रामवासियों के अनुसार, इस विशेष अवसर पर यहां पचास हजार से भी अधिक लोगों की विशाल भीड़ उमड़ती है। लेकिन इस भीड़ और मेले से भी ज्यादा हैरान करने वाली है इस जगह की उत्पत्ति और इसके साथ जुड़े वे अनसुलझे रहस्य, जो रोंगटे खड़े कर देते हैं।
जब गौ माता के थनों से अपने आप बहने लगा था दूध
इस चमत्कारी मंदिर के इतिहास के पन्नों को जब हम पलटते हैं, तो हमें गांव के बुजुर्ग ग्रामीण भगतराम गुप्ता और युवा प्रेमानंद गुप्ता, नित्यानंद गुप्ता व सुशील प्रधान जैसे लोगों के जरिए एक बेहद दिलचस्प कहानी मिलती है। बुजुर्गों के बताए अनुसार, पुरानी बातों को याद करते हुए गांव के लोग बताते हैं कि बहुत पहले पोरथ धाम से एक काली गाय रोज चरते-चरते इस विशेष स्थान पर आकर खड़ी हो जाती थी। सबसे बड़ा चमत्कार यह था कि जैसे ही वह गाय उस जगह पर रुकती, उसके थनों से अपने आप दूध की धारा बहने लगती थी और जमीन पर गिरने लगती थी। उस स्थान पर हमेशा एक अजीब सी तेज जलन महसूस होती थी।
गांव के पूर्वजों, जिन्हें लोग सोमनाथ और गोटिया के नाम से जानते हैं, उन्हें यह अंदेशा हुआ कि शायद इस जमीन के भीतर कोई पुराना खजाना या गुप्त संपत्ति दबी हुई है। इसी लालच और जिज्ञासा में चार लोगों ने मिलकर उस जमीन की खुदाई शुरू कर दी। लेकिन जैसी ही खुदाई आगे बढ़ी, जमीन के भीतर से सोना-चांदी तो नहीं निकला, बल्कि भगवान भोलेनाथ का एक स्वयंभू शिवलिंग, नंदी महाराज, भैरव और एक पत्थर की चौखट बाहर आ गई। इस घटना के बाद जो हुआ उसने पूरे गांव को दहशत में डाल दिया—खुदाई करने वाले उन चारों लोगों की ठीक अगले ही दिन रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई। इस खौफनाक और दैवीय घटना के बाद गांववालों के मन में भगवान शिव के प्रति डर और अटूट श्रद्धा दोनों घर कर गए, और सबने मिलकर वहां लकड़ी व मिट्टी का मंदिर बनाकर शिवलिंग की स्थापना की।
लगातार बढ़ रहा है शिवलिंग का आकार और पाताल में समा जाता है सारा जल
भगवान गुप्तेश्वर महादेव के इस मंदिर की बनावट और विशेषताएं भी विज्ञान को चुनौती देती हैं। गांव वालों का यह दावा है कि यहां स्थापित शिवलिंग बिल्कुल सीधा नहीं है, बल्कि वह थोड़ा तिरछा है। इसके तिरछे होने के पीछे भी वही पुरानी कहानी जुड़ी है कि जब इसे खजाने की लालच में खोदकर निकालने का प्रयास किया गया था, तब फावड़े या गैंती के प्रहार से इसका स्वरूप प्रभावित हुआ था।
सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि यह शिवलिंग समय के साथ लगातार बढ़ रहा है। सिर्फ शिवलिंग ही नहीं, बल्कि खुदाई के दौरान जो जटा मिली थी और जिसे फ्रेम लगाकर दीवार पर लगाया गया है, वह जटा भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। इसके अलावा नंदी महाराज की मूर्ति का आकार भी निरंतर बड़ा हो रहा है। मंदिर के पुजारी और भक्त जब यहां जलाभिषेक करते हैं, तो वे जितना भी पानी या दूध शिवलिंग पर अर्पित करते हैं, वह सब जमीन के अंदर चला जाता है। हैरानी की बात यह है कि वह पानी कहां जाता है और उसका स्रोत कहां है, इसका पता आज तक कोई नहीं लगा पाया है। ऐसा माना जाता है कि गुप्तेश्वर बाबा उस जल को गुप्त रूप से अपने भीतर धारण कर लेते हैं, इसीलिए इन्हें 'गुप्तेश्वर महादेव' कहा जाता है।
नाग देवता का वह अभय वरदान: जहां जहर भी हो जाता है बेअसर
कलमीगुड़ी गांव से जुड़ी एक और सबसे बड़ी और चौका देने वाली बात यह है कि इस गांव की परिधि के भीतर आज तक किसी भी व्यक्ति की मौत सांप, बिच्छू या किसी भी जहरीले जीव-जंतु के काटने से नहीं हुई है। इस पर विश्वास करना भले ही मुश्किल लगे, लेकिन यह वहां के हर एक बुजुर्ग की जुबान पर है।
इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा बताई जाती है कि पुराने समय में जब गांव के एक गोटिया कहीं जा रहे थे, तो एक नाग के फन में कांटेदार टेंगनी मछली का कांटा फंस गया था और वह तड़प रहा था। गोटिया जी ने बड़ी सावधानी से उस सांप के मुंह से कांटा बाहर निकाला और उसे जीवनदान दिया। उस रात नाग देवता ने उन्हें स्वप्न में आकर वरदान दिया था कि आज से इस गांव की सीमा में किसी भी जहरीले जीव के काटने से किसी की अकाल मृत्यु नहीं होगी। तब से लेकर आज तक, चाहे किसी को सांप ने डसा भी हो, लेकिन गांव की इस पवित्र सीमा के भीतर किसी की जान नहीं जाती। झारखंड से आकर यहां बसने वाले कपिल देव प्रसाद हों या बिहार और ओडिशा से आने वाले अन्य हजारों भक्त, सभी इस बात को मानते हैं कि इस गांव पर भगवान शिव और नाग देवता का साक्षात पहरा है।
आज जब लोग अपनी हर समस्या के लिए विज्ञान और अस्पतालों की तरफ भागते हैं, तब रायगढ़ का यह कलमीगुड़ी गांव आस्था, चमत्कार और विश्वास का एक ऐसा अनूठा संगम पेश करता है जो इंसानी बुद्धि को परे रखकर सीधे दिल को छू लेता है।
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