रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- विश्व आदिवासी दिवस के पावन अवसर पर छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज, जिला रायगढ़ के बैनर तले स्थानीय प्रशासनिक अमले और शासन को एक उग्र एवं व्यापक संयुक्त ज्ञापन सौंपा गया है। समाज के जिला अध्यक्ष सुनील मिंज के नेतृत्व में सौंपे गए इस ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि राज्य का 61 प्रतिशत भौगोलिक हिस्सा पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, इसके बावजूद आदिवासियों के संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों का खुलेआम हनन हो रहा है। समाज ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि उनकी 18 सूत्रीय माँगों पर शासन स्तर पर त्वरित और ठोस पहल नहीं की गई, तो यह असंतोष एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले लेगा।
संविधान और पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों की हो रही अनदेखी
विश्व स्तर पर मनाए जाने वाले आदिवासी अधिकार दिवस के दिन रायगढ़ में आयोजित इस कार्यक्रम ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। समाज के प्रतिनिधियों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ गठन के इतने लंबे अरसे बाद भी स्थानीय स्तर पर नियोजन, आरक्षण रोस्टर और पेसा कानून (PESA Act) की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में खनिज संपदा की लूट और औद्योगीकरण के नाम पर मूल निवासियों को उनकी ही भूमि से बेदखल करने की गहरी साजिश रची जा रही है, जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
जनगणना में पृथक धर्म कोड और परिसीमन में सुरक्षा की पुरजोर मांग
ज्ञापन के राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों में सबसे प्रमुख मांग जनगणना में आदिवासियों के लिए 'आदिवासी धर्म' का अलग कॉलम जोड़ने की है। समाज का तर्क है कि आदिवासी परंपरा, आस्था और संस्कृति की स्वतंत्र पहचान को बचाए रखने के लिए यह निहायत जरूरी है। इसके साथ ही, भविष्य के परिसीमन में अनुसूचित क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व (MLA/MP) को कम करने या सुनियोजित तरीके से आदिवासी बाहुल्य सीटों को सामान्य श्रेणी में तब्दील करने की कुत्सित कोशिशों पर तत्काल कानूनी रोक लगाने की मांग की गई है।
कॉर्पोरेट निजीकरण और जल-जंगल-ज़मीन की हिफाजत पर कड़ा रुख
आदिवासी समाज ने अनुसूचित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, खनिज, वन और तमाम सार्वजनिक सेवाओं के अंधाधुंध निजीकरण पर पूर्ण विराम लगाने की मांग की है। बस्तर और सरगुजा संभाग में बिना ग्राम सभा की सहमति के किसी भी खदान या उद्योग को निजी हाथों में सौंपने की नीति को आदिवासी अस्मिता पर सीधा प्रहार बताया गया है। भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के मामलों में संवैधानिक सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन कराने तथा आदिवासियों की जमीन गैर-आदिवासियों को बेचने की अनुमति देने से पहले ग्राम सभा के अनुमोदन को अनिवार्य बनाने की हुंकार भरी गई है।
पेसा कानून का प्रभावी क्रियान्वयन और स्थानीय रोजगार पर जोर
राज्य और स्थानीय स्तर के मुद्दों को उठाते हुए ज्ञापन में कहा गया है कि पेसा अधिनियम के सभी प्रावधानों को जमीनी स्तर पर अमलीजामा पहनाया जाए ताकि ग्राम सभाओं को वास्तविक कार्यकारी और प्रशासनिक अधिकार मिल सकें। शासकीय और अर्धशासकीय सेवाओं में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देने के लिए विशेष नियम बनाए जाएं। इसके अलावा, रोजगार और उच्च शिक्षा में रोस्टर प्रणाली का कड़ाई से पालन हो और बैकलॉग के पदों को विशेष भर्ती अभियान चलाकर शत-प्रतिशत भरा जाए।
नक्सल मामलों के नाम पर निर्दोषों की प्रताड़ना और बजट के दुरुपयोग पर सवाल
ज्ञापन में इस बात पर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है कि अनुसूचित जनजाति घटक (TSP) के नाम पर मिलने वाली अरबों रुपयों की राशि का बड़ा हिस्सा या तो समय पर खर्च नहीं होता या फिर लैप्स हो जाता है, जिससे आदिवासी विकास पर ग्रहण लग रहा है। साथ ही, नक्सल मामलों के नाम पर जेलों में सड़ रहे निर्दोष आदिवासी युवाओं और ग्रामीणों के मामलों की उच्चस्तरीय न्यायिक समीक्षा कराकर उनकी तत्काल रिहाई और फर्जी मामलों की जांच के लिए एक स्वतंत्र टास्क फोर्स के गठन की मांग उठाई गई है।
प्रशासन ने लिया ज्ञापन, कार्रवाई का दिया भरोसा
विश्व आदिवासी दिवस के इस उग्र प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपने के दौरान जिला प्रशासन के नुमाइंदों ने समाज के प्रतिनिधियों की बातें पूरी गंभीरता के साथ सुनीं। प्रशासनिक अधिकारियों ने यह आश्वासन दिया है कि आदिवासी समाज द्वारा उठाए गए इन 18 गंभीर बिंदुओं और मांगों के दस्तावेज को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर शासन के उच्च स्तर तक प्रेषित किया जाएगा। बहरहाल, छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के इस तेवर ने यह साफ कर दिया है कि यदि उनके अधिकारों और अस्तित्व से खिलवाड़ जारी रहा, तो यह चिंगारी आने वाले दिनों में एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष का इतिहास लिखेगी।
टिप्पणियाँ (0)
अपनी टिप्पणी लिखें