रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- छत्तीसगढ़ प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था एक बार फिर बड़े संकट के मुहाने पर खड़ी हो गई है। अपनी न्यायोचित मांगों को लेकर पिछले कई दिनों से आवाज बुलंद कर रहे एमबीबीएस के छात्र और इंटर्न डॉक्टर अब आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए हैं। सरकार की लगातार हो रही अनदेखी और सुस्त रवैये से क्षुब्ध होकर इन भावी डॉक्टरों ने रात लगभग नौ बजे से मेडिकल कॉलेज परिसर में अनिश्चितकालीन हड़ताल का शंखनाद कर दिया है। इस हड़ताल का सीधा और खौफनाक असर आम जनता पर पड़ना तय है, क्योंकि डॉक्टरों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक वे काम पर नहीं लौटेंगे।
काले कपड़े और रैलियों से शुरू हुआ विरोध, अब अनिश्चितकालीन हड़ताल में बदला
अपनी मांगों को लेकर इन छात्रों का यह आक्रोश कोई एक दिन का नतीजा नहीं है। प्रशासन और सरकार का ध्यान खींचने के लिए इन चिकित्सा छात्रों ने हर संभव शांतिपूर्ण रास्ता अपनाया। कभी हाथों में काली पट्टी और काले कपड़े पहनकर विरोध दर्ज कराया, तो कभी बाइक रैली निकालकर अपनी एकता का प्रदर्शन किया। इसके अलावा, इन्होंने कलेक्ट्रेट पहुंचकर ज्ञापन भी सौंपा, लेकिन सिस्टम के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। अंततः, थक-हारकर और सरकार के रवैये से निराश होकर इन छात्रों को अपनी चार साल की पढ़ाई के बाद होने वाली इंटर्नशिप के दौरान अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठने का कठोर निर्णय लेना पड़ा। कोई भी छात्र आंदोलनकारी नहीं बनना चाहता, लेकिन हठधर्मिता ने उन्हें सड़कों पर उतरने को विवश कर दिया है।
दस साल की कड़ी तपस्या का मोल सिर्फ 15,900 रुपये? डॉक्टरों का छलका दर्द
इस पूरे जन-आंदोलन के केंद्र में इंटर्नशिप के दौरान मिलने वाली वह मामूली राशि है, जो इन डॉक्टरों के पसीने और मेहनत का सरासर अपमान है। हड़ताली डॉक्टरों का स्पष्ट कहना है कि साढ़े चार साल की कठिन पढ़ाई और नेशनल लेवल के अत्यंत प्रतिस्पर्धी एग्जाम (जहां 25-30 लाख छात्रों का कंपटीशन होता है) को पास करने के बाद उन्हें अपनी ड्यूटी के एवज में मात्र 15,900 रुपये का स्टाइपेंड दिया जा रहा है, जो कि अन्य राज्यों की तुलना में बेहद कम और निराशाजनक है। इन युवा डॉक्टरों की मांग है कि उनके ड्यूटी घंटों को देखते हुए इस राशि को बढ़ाकर न्यूनतम 30,000 रुपये किया जाए। छात्रों का दर्द इस बात को लेकर भी है कि जीवन के कीमती दस साल इस पेशे को देने के बाद भी उन्हें आर्थिक रूप से इतना कमजोर रखा जा रहा है, जिससे वे अपने गांव के साथियों और समाज के सामने खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। यह स्थिति उनके लिए अत्यंत पीड़ादायक और रोना आने वाली है।
कागजों में उलझी फाइलें, आश्वासन की घुट्टी से छात्रों में भारी आक्रोश
प्रशासनिक लेटलतीफी इस कदर हावी है कि 12 महीने की इंटर्नशिप में से दो महीने केवल आश्वासन सुनते-सुनते ही बीत चुके हैं। छात्रों का कहना है कि सरकार की तरफ से उन्हें कोई स्पष्ट और ठोस जवाब नहीं मिल रहा है और न ही संवाद की कोई अच्छी पहल हो रही है। फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल तक सरकने और कागजी कार्रवाई आगे बढ़ने का हवाला देकर उन्हें केवल टरकाया जा रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर कोई परिणाम नहीं निकल रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो उनके बचे हुए 10 महीने भी बिना स्टाइपेंड बढ़े ही खत्म हो जाएंगे। रायगढ़ के इन छात्रों ने स्थानीय विधायक और प्रदेश के वित्त मंत्री ओपी चौधरी, स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री से भी इस मामले में त्वरित हस्तक्षेप कर समाधान निकालने की भावुक अपील की है।
ओपीडी से लेकर आईसीयू तक सेवाएं ठप, मरीजों की जान पर मंडराया बड़ा खतरा
इस हड़ताल का सबसे भयावह पहलू यह है कि इंटर्न डॉक्टरों ने ओपीडी, आईसीयू और पीआईसीयू जैसी सभी महत्वपूर्ण सेवाएं पूरी तरह से बंद कर दी हैं। डॉक्टर खुद मानते हैं कि उनका मूल काम मरीजों की सेवा करना है और इस हड़ताल से मरीजों को होने वाली असुविधा और पीड़ा का उन्हें भी भीतर से गहरा दुख है। लेकिन व्यवस्था की संवेदनहीनता ने उन्हें अपने ही मरीजों से दूर कर दिया है। अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार तब तक मूकदर्शक बनी रहेगी जब तक कि रायगढ़ और प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा नहीं जाती? क्या इलाज के अभाव में तड़पते मरीजों की स्थिति ही इस सोए हुए सिस्टम को जगाने के लिए काफी होगी? सरकार को अपनी नींद से जागकर तुरंत इन डॉक्टरों की जायज मांगों को सुनना चाहिए और समाधान निकालना चाहिए, ताकि ये डॉक्टर वापस अपनी ड्यूटी पर लौट सकें और मरीजों की जान बचाई जा सके।
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