रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य महकमे के खोखले दावों की कलई एक बार फिर सरेआम खुल गई है। जिन डॉक्टरों को 'धरती का भगवान' कहकर मंचों से तालियां बटोरी जाती हैं, आज वही डॉक्टर अपनी बुनियादी मांगों और हक की लड़ाई के लिए कड़कड़ाती धूप में जमीन पर दरी बिछाकर बैठने को विवश हैं। डबल इंजन की सरकार और सुशासन की दुहाई देने वाले स्वास्थ्य मंत्री के तमाम आश्वासन अब पूरी तरह बेअसर साबित हो चुके हैं। स्वास्थ्य मंत्री की चुप्पी और विभाग की उदासीनता ने पूरे सिस्टम को आईसीयू में धकेल दिया है। रायगढ़ के मेडिकल कॉलेज से शुरू हुआ यह जनाक्रोश अब सिर्फ डॉक्टरों की नाराजगी नहीं, बल्कि बेपरवाह हुकूमत के खिलाफ खुली बगावत बन चुका है।
17 मांगों पर महज एक 'लॉलीपॉप', 'फूट डालो-राज करो' की गंदी सियासत बेनकाब
स्वास्थ्य मंत्री के साथ बैठकों का दौर चला, लंबी चर्चाएं हुईं, टेबल पर 17-सूत्रीय मांगों का ठोस पुलिंदा सौंपा गया, लेकिन हासिल क्या हुआ? महज एक कोरा लॉलीपॉप। आंदोलन कर रहे जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (जेडीए) का सीधा आरोप है कि स्वास्थ्य मंत्री और शासन ने डॉक्टरों की चट्टानी एकता को तोड़ने के लिए 'फूट डालो और राज करो' की कुत्सित रणनीति अपनाई। केवल इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड में नाममात्र का इजाफा कर अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश की गई, जबकि पीजी रेजिडेंट्स, जेआर बॉन्डेड और एसआर बॉन्डेड डॉक्टरों को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया गया। जब डॉक्टर स्वास्थ्य मंत्री के चौखट पर दस्तक देते हैं, तो उन्हें वित्त विभाग का बहाना बनाकर टरका दिया जाता है, और वित्त विभाग में जाने पर स्वास्थ्य विभाग की फाइलें अटका दी जाती हैं। यह फुटबॉल वाला खेल अब डॉक्टरों के सब्र की सीमा पार कर चुका है।
'डिग्री के नाम पर बंधुआ मजदूरी मंजूर नहीं', महंगाई के दौर में स्टाइपेंड पर ताला क्यों?
जेडीए के प्रतिनिधियों ने साफ शब्दों में हुकूमत को आईना दिखाते हुए कहा कि सरकार उन्हें आधुनिक युग का बंधुआ मजदूर समझने की भूल न करे। सालों की कड़ी तपस्या और एमबीबीएस की कठिन पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉक्टरों के गले में दो-दो साल की बॉन्ड सेवा की बेड़ियां डाल दी जाती हैं। न तो महंगाई के अनुपात में स्टाइपेंड बढ़ता है और न ही वार्षिक इन्क्रीमेंट की कोई ठोस नीति बनाई जाती है। देश भर में महंगाई आसमान छू रही है, लेकिन डॉक्टरों के भत्ते वर्षों पुरानी व्यवस्था पर अटके पड़े हैं। रेजिडेंट्स चौबीसों घंटे, दिन-रात अस्पताल की रीढ़ बनकर आपातकालीन सेवाओं से लेकर वार्डों तक खून-पसीना एक करते हैं, लेकिन जब हक मांगने की बारी आती है, तो स्वास्थ्य मंत्री का महकमा आंखें मूंदकर बैठ जाता है।
ओपीडी ठप, पर्चियां हाथ में लिए रो रहे तीमारदार, आखिर इस बर्बादी का जिम्मेदार कौन?
सांकेतिक प्रदर्शनों को नजरअंदाज करने की भारी कीमत अब प्रदेश की बेबस जनता चुका रही है। 24 तारीख से ओपीडी सेवाओं का पूर्ण बहिष्कार जारी है, जिससे रोजाना 2000 से अधिक मरीजों का इलाज रुक गया है। अस्पताल परिसर में खड़ी गाड़ियों का अंतहीन काफिला और ओपीडी के बंद शटर के बाहर दर्द से कराहते मरीज चीख-चीखकर सरकार की विफलता बयां कर रहे हैं। दूर-दराज के गांवों से जीवन की आस लेकर पहुंचे गरीब मरीजों को बिना इलाज के बैरंग लौटना पड़ रहा है। जिस जनता ने चुनकर सरकार बनाई, आज उसी जनता की सांसें सरकारी हठधर्मिता की वजह से हलक में अटकी हैं। सवाल उठता है कि अगर इन लाचार मरीजों की जान पर बन आई, तो क्या स्वास्थ्य मंत्री इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेंगे?
अल्टीमेटम का काउंटडाउन शुरू: 28 तारीख के बाद संपूर्ण कार्य बहिष्कार का ऐलान
धरना स्थल पर गूंजते नारे और हाथों में लहराते पोस्टर साफ बता रहे हैं कि अब समझौता आर-पार का होगा। डॉक्टरों ने सीधे शब्दों में सरकार और स्वास्थ्य मंत्री को अंतिम चेतावनी दे दी है कि कागजी समीक्षाओं और झूठे आश्वासनों के दिन लद चुके हैं। अगर 28 तारीख तक सभी 17 मांगों पर समयबद्ध और सकारात्मक आदेश जारी नहीं किए गए, तो इमरजेंसी सेवाओं समेत संपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था का चक्का जाम कर दिया जाएगा। इसके बाद पैदा होने वाले किसी भी भयानक संकट और जनहानि का ठीकरा पूरी तरह स्वास्थ्य मंत्रालय और अड़ियल प्रशासनिक तंत्र के सिर फूटेगा। अब गेंद स्वास्थ्य मंत्री के पाले में है—या तो वे अपनी आंखें खोलें और न्याय करें, या फिर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह तबाह होते देखें।
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