रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- विकास की अंधी दौड़ और कॉरपोरेट मुनाफे की वेदी पर एक बार फिर प्रकृति और आदिवासियों के अधिकारों की बलि चढ़ाने की पटकथा लिख दी गई है। रायगढ़ जिले के तमनार ब्लॉक अंतर्गत आने वाले ग्राम नागरामुड़ा के शांत और हरे-भरे जंगल आज भारी-भरकम कटर मशीनों की कानफोड़ू आवाजों और ग्रामीणों के आक्रोशित नारों से गूंज रहे हैं। क्षेत्र में प्रस्तावित जिंदल पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) के कोल ब्लॉक के लिए लगभग एक लाख पेड़ों की निर्मम कटाई का फरमान जारी कर दिया गया है। आज सुबह जब प्रशासनिक अमले और पुलिस बल की मौजूदगी में कंपनी के कर्मचारी पेड़ों का सीना चीरने के लिए अत्याधुनिक कटर मशीनें लेकर जंगल में दाखिल हुए, तो ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे गया। अपने जल, जंगल और जमीन को छिनता देख स्थानीय ग्रामीण अपना सारा कामकाज छोड़कर मशीनों के सामने दीवार बनकर खड़े हो गए हैं, जिसके चलते पूरे गारे पेलमा कोयला ब्लॉक क्षेत्र में स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई है और प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और शर्मनाक पहलू जेएसपीएल प्रबंधन का वह खुला धोखा है, जिसने कॉरपोरेट नैतिकता की धज्जियां उड़ा दी हैं। अभी एक महीने पहले ही, 1 जुलाई को जेएसपीएल तमनार के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) ने मीडिया और स्थानीय जनता के सामने पूरी जिम्मेदारी के साथ यह बयान दिया था कि खदान परियोजना के लिए किसी भी कीमत पर पेड़ों की कटाई नहीं की जाएगी। उस वक्त ग्रामीणों को लगा था कि शायद उनके शांतिपूर्ण विरोध और पर्यावरण की दुहाई को कंपनी ने समझ लिया है। लेकिन आज मशीनों के साथ जंगल में घुसी कंपनी की फौज ने यह साबित कर दिया है कि पीआरओ का वह बयान केवल जन-आक्रोश को शांत करने, ग्रामीणों की एकजुटता को तोड़ने और गुपचुप तरीके से अपनी खदान की राह आसान करने का एक सुनियोजित कॉरपोरेट छलावा था। आज जो कटर मशीनें नागरामुड़ा के जंगलों में चल रही हैं, वे केवल पेड़ों को नहीं काट रहीं, बल्कि उस विश्वास और वादे की भी हत्या कर रही हैं जो खुले मंच से किया गया था। इस विश्वासघात ने ग्रामीणों के भीतर एक ऐसा ज्वालामुखी भड़का दिया है, जिसे अब शायद कोई भी झूठा आश्वासन शांत नहीं कर पाएगा।
नागरामुड़ा और आसपास के क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों और स्थानीय ग्रामीणों के लिए यह जंगल केवल लकड़ी का भंडार नहीं है, बल्कि उनकी सांसों, उनकी संस्कृति और उनके जीवन यापन का एकमात्र सहारा है। पीढ़ियों से ये परिवार महुआ, तेंदूपत्ता, साल के बीज और अन्य लघु वनोपज पर निर्भर रहे हैं। खदान के नाम पर होने वाले इस विनाश से इस इलाके के लगभग 14 से 83 गांवों का अस्तित्व सीधे तौर पर खतरे में आ गया है। ग्रामीणों का तर्क बिल्कुल स्पष्ट और न्यायसंगत है कि इस कोयला खदान परियोजना के लिए पेसा (PESA) कानून का खुलेआम उल्लंघन करते हुए ग्राम सभा से कोई वैधानिक अनुमति नहीं ली गई है। लोकतंत्र की सबसे निचली और मजबूत इकाई 'ग्राम सभा' के अधिकारों को ताक पर रखकर, बंद कमरों में नीतियां बनाई जा रही हैं और उन्हें पुलिसिया डंडों के जोर पर थोपा जा रहा है। जब विस्थापन और पुनर्वास की बात आती है, तो स्थिति और भी भयावह नजर आती है। ग्रामीणों का आरोप है कि पड़ोसी राज्य ओडिशा में विस्थापितों को जिस तरह का सम्मानजनक मुआवजा और पुनर्वास पैकेज दिया जा रहा है, उसके मुकाबले छत्तीसगढ़ में उन्हें महज औने-पौने दाम देकर उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल करने की साजिश रची जा रही है।
इस पूरी त्रासदी में राज्य सरकार और जिला प्रशासन की खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। जब सरेआम एक कंपनी अपने वादे से मुकर कर, बिना ग्राम सभा की सहमति के लाखों पेड़ों को काटने पहुंच जाती है, तब प्रशासन मूकदर्शक क्यों बना रहता है? क्या हुक्मरानों की नजर में इन आदिवासियों के आंसुओं और इन कटते हुए पेड़ों की कोई कीमत नहीं है? पुलिस बल, जिसका मुख्य कार्य आम जनता के अधिकारों और कानून की रक्षा करना है, वह आज कॉरपोरेट घरानों के निजी सुरक्षा गार्ड की भूमिका में नजर आ रहा है। यह खामोशी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि व्यवस्था पूरी तरह से पूंजीपतियों के दबाव में काम कर रही है। क्या सरकार ऐसे ही चुप बैठे रहेगी? क्या न्याय की परिभाषा यही है कि मुनाफा कमाने के लिए प्रकृति को उजाड़ दिया जाए और मूलनिवासियों को उनके ही घर से विस्थापित कर दर-ब-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया जाए? सरकार का यह मौन पर्यावरण और मानवाधिकार दोनों के लिए एक भयानक खतरे की घंटी है।
पर्यावरणीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक लाख पेड़ों की कटाई इस क्षेत्र के लिए एक स्थायी विनाश का कारण बनेगी। पूरी दुनिया आज ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी महामारियों से जूझ रही है। रायगढ़ जिला, जो पहले से ही औद्योगिक प्रदूषण का दंश झेल रहा है, वहां से इतनी बड़ी तादाद में हरियाली का खात्मा हवा में जहर घोलने का काम करेगा। ये पेड़ ही हैं जो भूजल स्तर को बनाए रखते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और हजारों वन्यजीवों को आश्रय देते हैं। इस पूरे पारिस्थितिक तंत्र को रातों-रात नष्ट कर देने का परिणाम यह होगा कि आने वाले समय में यह पूरा क्षेत्र भीषण जल संकट और अत्यधिक तापमान की चपेट में आ जाएगा। विकास के नाम पर खोदा जा रहा यह कोयला दरअसल आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को राख में तब्दील कर देगा।
आज की यह घटना कोई अचानक हुआ विरोध नहीं है, बल्कि यह एक लंबी प्रशासनिक अनदेखी का नतीजा है। यह याद रखना बेहद जरूरी है कि पिछले साल दिसंबर 2025 में इसी कोल ब्लॉक को लेकर लिबरा और धौराभाठा गांवों में हालात किस कदर बेकाबू हो गए थे। जनसुनवाई और भूमि अधिग्रहण के विरोध में हुए उस आंदोलन ने इतना उग्र रूप ले लिया था कि कई पुलिसकर्मी और ग्रामीण गंभीर रूप से घायल हुए थे, तथा कंपनी के वाहनों व संयंत्रों में भारी तोड़फोड़ और आगजनी हुई थी। उस समय भी प्रशासन की हठधर्मिता और कंपनी की मनमानी ही इस हिंसा का मुख्य कारण थी। ऐसा प्रतीत होता है कि शासन और कंपनी ने उस खौफनाक मंजर से कोई सबक नहीं लिया है। नागरामुड़ा में जबरन पेड़ों की कटाई का यह नया प्रयास एक बार फिर उसी बारूद के ढेर में चिंगारी लगाने का काम कर रहा है। ग्रामीण अब आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके हैं और वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन से एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
निष्कर्ष के तौर पर, नागरामुड़ा का यह संघर्ष अब केवल एक गांव या एक खदान का मुद्दा नहीं रह गया है; यह कॉर्पोरेट लालच और आम नागरिक के जीवन के अधिकार के बीच की एक बड़ी कानूनी और नैतिक लड़ाई बन चुका है। सरकार को यह समझना होगा कि बंदूकों के साए में और मशीनों के शोर से विकास नहीं लिखा जा सकता। यदि तत्काल इस अवैध कटाई पर रोक नहीं लगाई गई और ग्रामीणों के साथ न्यायपूर्ण संवाद स्थापित नहीं किया गया, तो यह असंतोष एक ऐसे व्यापक जन-आंदोलन में बदल सकता है, जिसे संभालना प्रशासन के लिए नामुमकिन हो जाएगा। न्याय की यह गुहार अब सीधे सत्ता के गलियारों तक पहुंच रही है, और यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार कॉरपोरेट की तिजोरी चुनती है या अपने नागरिकों की जिंदगी।
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