रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- सत्ता, प्रशासन और औद्योगिक घरानों के नापाक गठजोड़ ने रायगढ़ जिले की आबोहवा में मौत का जहर घोल दिया है। जिले के बरपाली और गदगांव के बीच बहने वाला वह नाला, जो कभी हजारों ग्रामीणों और मवेशियों की प्यास बुझाता था, आज कॉर्पोरेट लालच और प्रशासनिक पंगुता की भेंट चढ़ चुका है। औद्योगिक विकास का ढिंढोरा पीटने वाले नवदुर्गा प्लांट और रुपाणा धाम प्लांट ने ठेकेदार रोहतास नेहरा के साथ मिलकर प्रकृति के सीने पर जो खंजर घोंपा है, वह केवल एक पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ एक सुनियोजित साजिश है। चंद रुपयों के मुनाफे के लिए हजारों हरे-भरे पेड़ों की बलि चढ़ा दी गई है और सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन को रातों-रात फ्लाई ऐश (राखड़) के जहरीले दलदल में तब्दील कर दिया गया है।

ठेकेदार और औद्योगिक घरानों का बेलगाम दुस्साहस..

इस पूरे काले कारोबार का मुख्य कर्ताधर्ता और मोहरा ठेकेदार रोहतास नेहरा है, जिसने नवदुर्गा और रुपाणा धाम प्लांट के इशारों पर बेखौफ होकर इस विनाशलीला को अंजाम दिया है। नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए ठेकेदार रोहतास नेहरा ने भारी मशीनों से प्राकृतिक जलस्रोत को पाट दिया और वहां उद्योगों से निकलने वाली जानलेवा राख को डंप कर दिया। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इन औद्योगिक घरानों के लिए इंसानी जान और प्रकृति की कीमत उनके मुनाफे के आगे कौड़ी भर भी नहीं है। फ्लाई ऐश के सुरक्षित निपटान के वैज्ञानिक और कानूनी मापदंडों को ताक पर रखकर, इन कंपनियों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने और पैसा बचाने के लिए एक पूरे गांव के भविष्य को मौत के मुहाने पर धकेल दिया है।

जिंदगी छीनता जहरीला पानी और महामारी की आहट..

बरपाली और गदगांव के ग्रामीणों की आंखों में तैरती बेबसी इस खौफनाक मंजर की गवाही दे रही है। फ्लाई ऐश के भारी डंपिंग के कारण नाले का पानी अब काले, गाढ़े और जानलेवा जहर में बदल चुका है। ग्रामीण हरिहर यादव का हाथों में उस जहरीले पानी को लेकर छटपटाना इस बात का सुबूत है कि कैसे एक हंसते-खेलते गांव का पारिस्थितिकी तंत्र तबाह कर दिया गया है। यह सिर्फ एक नाले की बर्बादी का मामला नहीं है, बल्कि यह धीमा जहर रबो डैम से होता हुआ तमनार पावर प्लांट तक पहुंच रहा है। गदगांव, रबो सहित आसपास के लगभग एक दर्जन गांवों की जीवनरेखा इस पानी पर टिकी थी। आज हालात इतने भयावह हैं कि मवेशी इस पानी को सूंघने से भी कतराते हैं। यदि यही आलम रहा, तो आने वाले कुछ ही समय में यह पूरा इलाका कैंसर, अस्थमा और त्वचा से जुड़ी भयंकर महामारियों की चपेट में होगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी इस ठेकेदार और प्लांट प्रबंधन की होगी।

बिक गई पंचायत, कुंभकर्णी नींद में पर्यावरण विभाग..

इस महाविनाश में सबसे शर्मनाक और घिनौनी भूमिका स्थानीय प्रशासन और पंचायत की उभर कर सामने आई है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरपंच और सचिव ने चंद सिक्कों की खनक के आगे अपना जमीर बेच दिया और अपनी ही माटी का सौदा करते हुए इस अवैध डंपिंग के लिए 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (एनओसी) जारी कर दिया। एक पंचायत, जिसका काम गांव की रक्षा करना होता है, वह खुद मौत के सौदागरों के साथ खड़ी हो गई।

वहीं, पर्यावरण विभाग और वन विभाग की कार्यप्रणाली भी गहरे संदेह और भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी नजर आती है। कागजों पर अपनी पीठ थपथपाने वाले इन विभागों के आला अधिकारी जमीनी हकीकत से पूरी तरह आंखें मूंदे बैठे हैं। विभाग द्वारा पूर्व में की गई आठ लाख रुपये के चालान की कार्रवाई महज एक 'दिखावटी तमाशा' और 'आईवॉश' साबित हुई है। इतने बड़े पैमाने पर हो रहे पर्यावरणीय नरसंहार के सामने यह मामूली जुर्माना इन रसूखदार ठेकेदारों और औद्योगिक घरानों के लिए किसी मजाक से कम नहीं है। सवाल यह उठता है कि जब खुलेआम लोगों की जान से खिलवाड़ हो रहा है, तो ठेकेदार रोहतास नेहरा और प्लांट के मालिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें सलाखों के पीछे क्यों नहीं भेजा गया? क्या विभाग के अधिकारियों ने भी इस राखड़ के एवज में अपनी जेबें गर्म कर ली हैं?

कठोर कार्रवाई की दरकार?

यह घटना रायगढ़ प्रशासन के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है। ग्रामीण अब आक्रोशित हैं और इस अन्याय के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके हैं। 'दैनिक खबर सार' यह मांग करता है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच हो। पंचायत द्वारा दी गई एनओसी को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए और ठेकेदार रोहतास नेहरा सहित नवदुर्गा व रुपाणा धाम प्लांट के प्रबंधकों पर हत्या के प्रयास और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत गैर-जमानती मामले दर्ज हों। यदि प्रशासन अब भी अपनी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागा, तो यह तय है कि विकास की इस अंधी दौड़ में रायगढ़ का यह हिस्सा जल्द ही एक ऐसा वीरान श्मशान बन जाएगा, जहां सांस लेने के लिए हवा और पीने के लिए एक बूंद पानी तक मयस्सर नहीं होगा।