रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- रायगढ़ की आबोहवा में घुलता फ्लाई ऐश (राख) का जहर अब केवल फेफड़ों को ही नहीं, बल्कि समूचे लोकतांत्रिक ढांचे को गलाने लगा है। विकास और औद्योगीकरण के नाम पर पनपा यह 'राख का सिंडिकेट' अब इतना रसूखदार हो चुका है कि पंचायत की चुनी हुई सरकारों को अपनी उंगलियों पर नचाने की जुर्रत करने लगा है। सत्ता, प्रशासन और कॉर्पोरेट के इस नापाक गठजोड़ की सबसे खौफनाक बानगी तमनार ब्लॉक की ग्राम पंचायत 'भुईकुरी' में देखने को मिल रही है। यहां एक आदिवासी महिला सरपंच सुशीला बाई मांझी की कुर्सी केवल इसलिए खतरे में डाल दी गई है, क्योंकि उसने कॉर्पोरेट की मनमानी के आगे घुटने टेकने से इनकार कर दिया था। यह पूरी दास्तान महज एक पंचायत के राजनीतिक कलह की नहीं है, बल्कि यह पूंजीपतियों के उस असीमित अहंकार की कहानी है जो अपने मुनाफे की राह में आने वाले हर जनवादी मूल्य को कुचलने के लिए आतुर है।

फर्जी एनओसी का फरेब और पर्यावरण विभाग का पलटवार..

इस खौफनाक सियासी ड्रामे की पटकथा पूरी तरह से फ्लाई ऐश डंपिंग के करोड़ों के काले कारोबार पर टिकी है। रसूखदार उद्योगपतियों और उनके खासमखास ट्रांसपोर्टर्स की गिद्ध दृष्टि पंचायत के आश्रित ग्राम की उस जमीन पर थी, जिसे वे राख के डंपिंग यार्ड में तब्दील करना चाहते थे। जब पंचायत की मौजूदा सरपंच ने इस जनविरोधी और पर्यावरणघाती कृत्य के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देने से साफ इनकार कर दिया, तो कॉर्पोरेट के गुर्गों ने सरेआम लोकतंत्र का चीरहरण शुरू कर दिया।

सत्ता और पैसे के नशे में चूर इन धन्नासेठों ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए पूर्व पंचायत प्रतिनिधियों के साथ मिलकर दो साल पुरानी 'बैकडेट' में एक फर्जी एनओसी तैयार करवा ली। इसी कागजी फरेब के दम पर गांव में रातों-रात फ्लाई ऐश के विषैले पहाड़ खड़े कर दिए गए। लेकिन जब सरपंच सुशीला बाई मांझी ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए इस फर्जीवाड़े के पुख्ता सबूतों के साथ पर्यावरण विभाग में दस्तक दी, तो महकमे में हड़कंप मच गया। भारी दबाव और अकाट्य साक्ष्यों के आगे मजबूर होकर विभाग को अंततः उस फर्जी एनओसी को निरस्त करना पड़ा।

राख की मलाई और बिकता ईमान: तिजोरी खुलते ही बिछी अविश्वास की बिसात..

एनओसी के छिनते ही कॉर्पोरेट घरानों और फ्लाई ऐश के बड़े ट्रांसपोर्टर्स के पैरों तले जमीन खिसक गई। करोड़ों के मुनाफे पर सीधा प्रहार होता देख उन्होंने उस अस्त्र का इस्तेमाल किया जो आज के भ्रष्ट तंत्र में सबसे अचूक माना जाता है- 'धनबल'। सरपंच की बगावत को कुचलने के लिए कॉर्पोरेट ने अपनी तिजोरियों के मुंह खोल दिए और उन्हीं चेहरों को अपना मोहरा बनाया जिन्होंने उस फर्जी एनओसी पर दस्तखत किए थे। यह घोर विडंबना ही है कि जो सरपंच राख के इस अवैध साम्राज्य के खिलाफ एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ी हुई, आज उसी के खिलाफ आगामी 30 जून को अविश्वास प्रस्ताव लाया जा रहा है।

राज्य में 'ट्रिपल इंजन' की सत्ता का दंभ भरने वाली सरकार के राज में, उसी दल से समर्थित मानी जाने वाली एक आदिवासी सरपंच का यह हश्र पूरी राजनीतिक व्यवस्था के गाल पर एक करारा तमाचा है। फ्लाई ऐश की इस 'काली मलाई' का स्वाद इतना चस्केदार है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही खेमे एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की नूराकुश्ती तो कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में दोनों ही इस कॉर्पोरेट नेक्सस के मूक दर्शक या मूक समर्थक नजर आते हैं। इस हमाम में हर कोई नंगा प्रतीत हो रहा है।

रहस्यमयी ढंग से गायब पंच और सुलगता जन-आक्रोश..

इस सुनियोजित साजिश का सबसे स्याह पहलू बीते 24 जून 2026 को भुईकुरी में आयोजित ग्राम सभा में उजागर हुआ। जब ग्रामीण इस अन्याय के खिलाफ लामबंद हुए और ग्राम सभा की महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई, तो उपसरपंच ननकीराम राठिया सहित पंच मनमोहन राठिया, पारस रौतिया, रुक्मणी राठिया, फूल बाई चौहान और तारामती राठिया रहस्यमयी ढंग से नदारद रहे। भारी हंगामे के बीच पंचायत में जब इन गायब जनप्रतिधिनियों के परिजनों से तीखे सवाल दागे गए, तो उनके जवाबों ने साजिश की गहराई को और बढ़ा दिया।

परिजनों ने बेबसी जताते हुए सरेआम स्वीकार किया कि वे सभी पिछले कुछ दिनों से घर से गायब हैं और उनके मोबाइल फोन भी लगातार बंद आ रहे हैं। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इतने दिन बीत जाने के बावजूद, किसी भी अनहोनी की आशंका के चलते पुलिस थाने में उनकी गुमशुदगी की कोई रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराई गई है। परिजनों का रटा-रटाया जवाब कि "शिकायत करवाएंगे", कई अनकहे रहस्यों की ओर इशारा करता है। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद ग्राम पंचायत में आक्रोश का ज्वालामुखी फूट पड़ा है और ग्रामीणों ने इस पूरी साजिश के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की हुंकार भरी है।

पूंजी बनाम प्रजातंत्र: क्या 'राख' में दफन हो जाएगा रायगढ़ का भविष्य?

अब सबसे बड़ा और ज्वलंत सवाल यह नहीं है कि 30 जून को होने वाले अविश्वास प्रस्ताव में सरपंच सुशीला बाई मांझी की कुर्सी बचती है या नहीं। असल और खौफनाक सवाल यह है कि क्या रायगढ़ के इस लोकतांत्रिक ढाँचे में जनता के पवित्र वोट की कीमत एक उद्योगपति की 'राख' से भी सस्ती हो गई है? यदि आज प्रशासन की आंखों के सामने, चंद पैसों और बाहुबल के दम पर एक चुनी हुई पंचायत को गिराने का यह 'ट्रायल' सफल हो गया, तो आने वाले कल में यह फ्लाई ऐश का सिंडिकेट पूरे जिले की बड़ी लोकतांत्रिक संस्थाओं की भी बोली लगा देगा। प्रशासन की मौजूदा आपराधिक खामोशी अगर यूं ही बरकरार रही, तो यह तय मानिए कि उद्योगपतियों की यह काली राख रायगढ़ के बचे-खुचे लोकतांत्रिक मूल्यों को हमेशा के लिए भस्म कर देगी। वक्त आ गया है कि इस कॉर्पोरेट फंडिंग और राजनीतिक फरेब की उच्च स्तरीय जांच हो, अन्यथा यह राख का बवंडर लोकतंत्र की बुनियाद को ही उखाड़ फेंकेगा।