रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- छत्तीसगढ़ की औद्योगिक राजधानी कहा जाने वाला रायगढ़ इन दिनों विकास के नाम पर विनाश की कीमत चुका रहा है। आसमान से बरसती राखड़ (फ्लाई ऐश), हवाओं में घुला चिमनियों का काला धुआं और हर तरफ डस्ट के गुबार ने आम आदमी का सांस लेना मुहाल कर दिया है। इसी जहरीली आबोहवा के बीच शुक्रवार को रायगढ़ शहर की सियासत का पारा भी अचानक हाई हो गया। विश्व पर्यावरण दिवस के बहाने ही सही, लेकिन जिला कांग्रेस कमेटी की नींद टूटी और शहर अध्यक्ष शाखा यादव की अगुवाई में दर्जनों कांग्रेसी क्षेत्रीय पर्यावरण कार्यालय का घेराव करने निकल पड़े। रास्ते में पुलिस की तगड़ी बैरिकेडिंग मिली, तो पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जमकर धक्का-मुक्की और जोर-आजमाइश हुई। भारी हंगामे के बीच कांग्रेसियों ने पर्यावरण विभाग को 10 सूत्रीय ज्ञापन तो सौंपा ही, साथ ही सिस्टम के मुंह पर तमाचा जड़ते हुए बाकायदा एक केक काटा और कहा कि हम आज 'पर्यावरण' नहीं बल्कि 'प्रदूषण दिवस' मना रहे हैं। कांग्रेस का सीधा आरोप है कि यह विभाग उद्योगपतियों की जेब में है और इसका नाम बदलकर अब 'प्रदूषण विभाग' रख देना चाहिए।
शहर अध्यक्ष शाखा यादव ने बेहद आक्रामक तेवर दिखाते हुए सत्ता पक्ष को सीधे कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि आज रायगढ़ की जनता को सिर्फ प्रदूषण, दमा और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां परोसी जा रही हैं। घरों के आंगनों और छतों पर काली परतें जम रही हैं। कांग्रेस का आरोप है कि उद्योगों में प्रदूषण रोकने के लिए मशीनें (ईपीएस) तो लगी हैं, लेकिन उद्योगपति उन्हें चलाने में बेईमानी करते हैं। शाखा यादव ने 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान पर तंज कसते हुए कहा कि सरकार एक तरफ पेड़ लगाने का दिखावा करती है और दूसरी तरफ अपने पूंजीपति दोस्तों को फायदा पहुंचाने के लिए लाखों-लाख पेड़ों की बलि चढ़ा रही है। कांग्रेस ने मांग की है कि पूरे शहर में जगह-जगह एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) बताने वाले डिस्प्ले बोर्ड लगाए जाएं और शिक्षाविदों व सिविल सोसाइटी को मिलाकर एक निगरानी समिति बने जो हर छह महीने में इस 'काले खेल' की समीक्षा करे।
लेकिन, सड़कों पर कांग्रेस के इस उग्र शक्ति प्रदर्शन और तीखे बयानों के बीच सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल खुद विपक्ष की नीयत और उसके आंदोलनों के 'फेल्योर' पर उठ रहा है। रायगढ़ की जनता पूछ रही है कि क्या कांग्रेस के जन-आंदोलन अब सिर्फ 'फोटो-ऑप' और राजनीतिक इवेंट बनकर रह गए हैं? याद कीजिए वो दिन जब हसदेव और जिले के अन्य इलाकों में पेड़ों की बेतहाशा कटाई के विरोध में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से लेकर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज और कई विधायकों ने भारी हुंकार भरी थी। उस वक्त भी बड़े-बड़े धरने हुए, रैलियां निकाली गईं और ज्ञापन सौंपे गए। लेकिन उसका नतीजा क्या निकला? प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी और पेड़ फिर भी काटे गए। तो क्या इसका मतलब यह है कि कांग्रेस के उन तमाम आंदोलनों का कोई मतलब नहीं रह गया? क्या विपक्ष के धरने और ज्ञापन अब पूरी तरह से बेअसर और फेल साबित हो रहे हैं? सबसे बड़ा सवाल टाइमिंग का है—रायगढ़ की जनता साल के पूरे 365 दिन धूल और धुएं से जूझती है, लेकिन कांग्रेस को जनता के फेफड़ों की फिक्र सिर्फ 'पर्यावरण दिवस' के आस-पास ही क्यों सताती है? बाकी के दिन विपक्ष किस गहरी नींद में सोया रहता है?
उधर, विपक्ष के इन करारे हमलों के बीच क्षेत्रीय पर्यावरण विभाग भी मूकदर्शक बने रहने के आरोपों को सिरे से खारिज कर रहा है। क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी मानवेंद्र पांडे ने कांग्रेस के सभी दावों का खंडन करते हुए अपनी कार्रवाइयों की पूरी फेहरिस्त गिना दी। अधिकारी का स्पष्ट कहना है कि उनका विभाग सो नहीं रहा है, बल्कि लगातार एक्शन मोड में है। उन्होंने बताया कि जिले के सभी प्रदूषणकारी उद्योगों में ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम (CEMS) चालू हैं, जिनकी 24 घंटे निगरानी होती है। अगर कोई उद्योग तय सीमा से ज्यादा जहर उगलता है, तो उस पर भारी पर्यावरण क्षतिपूर्ति (जुर्माना) लगाई जाती है। पर्यावरण अधिकारी ने कड़े शब्दों में कहा कि पिछले महज डेढ़ महीने के भीतर ही हमने प्रदूषण फैलाने वाले अलग-अलग उद्योगों पर 40 लाख रुपये का भारी जुर्माना ठोका है। इसके अलावा सड़कों पर उड़ने वाली राखड़ पर लगाम कसने के लिए एक विशेष पोर्टल और व्हाट्सएप हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया गया है, जिसके जरिए वीडियो मिलते ही विभाग तत्काल दंडात्मक कार्रवाई कर रहा है।
अब दावों, आरोपों और ज्ञापनों की इस रवायत के बीच सबसे कड़वा सच यही है कि रायगढ़ का वह जहरीला आसमान आज भी साफ होने की राह देख रहा है। विभाग के 40 लाख के जुर्माने और विपक्ष की उग्र नारेबाजी के बीच आम आदमी की सांसों में घुल रहा जहर कम नहीं हुआ है। बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस की यह हुंकार और पर्यावरण विभाग की ये कार्रवाइयां जमीन पर कोई असली बदलाव ला पाएंगी, या फिर हर बार की तरह यह पूरा मुद्दा भी औद्योगिक चिमनियों के काले धुएं में कहीं उड़ जाएगा।



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