रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- चक्रवाती तूफान 'अरनब' के प्रभाव के चलते रायगढ़ जिले में बीते चौबीस घंटों के दौरान मूसलाधार बारिश दर्ज की गई। मौसम में आए इस बदलाव और भारी बारिश के ठीक बाद जिले की जीवनदायिनी मानी जाने वाली केलो नदी को लेकर एक गंभीर स्थिति सामने आई है। सुबह के समय स्थानीय नागरिकों और नदी किनारे मौजूद लोगों ने देखा कि केलो नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ ही उसका पानी पूरी तरह से काला और मटमैला नजर आ रहा है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि पानी की सामान्य रंगत अचानक बदलकर स्याह हो गई है, जिससे यह संदेह गहरा रहा है कि बारिश के बहाव का लाभ उठाते हुए औद्योगिक इकाइयों द्वारा अनुपचारित या अपशिष्ट जल नालों के जरिए नदी में छोड़ा गया हो सकता है।
भारी बारिश के बहाव के बीच नदी के जल में बदलाव
जिले में औद्योगिक गतिविधियों और उनसे जुड़े प्रदूषण नियंत्रण को लेकर समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। हालांकि, तेज बारिश के दौरान अक्सर यह आशंका बनी रहती है कि औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला स्लरी युक्त अथवा केमिकल मिश्रित पानी खुले नालों में समाहित होकर प्राकृतिक जल स्रोतों तक पहुंच सकता है। अरनब तूफान के असर से जब कई इलाकों में जलभराव की स्थिति बनी, उसी दौरान केलो नदी के विभिन्न घाटों पर पानी के रंग में आया यह अचानक बदलाव प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दिया। स्थानीय लोगों का मानना है कि सामान्य मानसूनी गाद का रंग भूरा या मटमैला होता है, जबकि वर्तमान में नदी के पानी की सतह पर गहरा कालापन और झाग देखा जा रहा है, जो रासायनिक अपशिष्ट या कोयला मिश्रित पानी की उपस्थिति की ओर इशारा करता प्रतीत होता है।
सौंदर्यीकरण परियोजना के बीच उठता तकनीकी और प्रशासनिक सवाल
यह स्थिति ऐसे समय में देखने को मिली है जब शासन और जिला प्रशासन की ओर से केलो नदी के संरक्षण और सौंदर्यीकरण को लेकर करोड़ों रुपये की विकास योजनाओं को हरी झंडी दी गई है। नदी तटों के विकास, घाटों के जीर्णोद्धार और तटबंध निर्माण से जुड़े कई कार्य वर्तमान में धरातल पर संचालित किए जा रहे हैं। निर्माण स्थलों पर तकनीकी अमला और श्रमिक लगातार मौजूद रहते हैं। ऐसे में यह सवाल प्रशासनिक और तकनीकी दोनों ही दृष्टिकोणों से अहम हो जाता है कि जब नदी के प्रवाह और पानी के रंग में इतना बड़ा बदलाव आया, तो क्या कार्यदायी संस्था अथवा निर्माण में लगे इंजीनियरों द्वारा इसकी तात्कालिक सूचना जल संसाधन विभाग या सक्षम प्रशासनिक अधिकारियों को दी गई। किसी भी जल संरक्षण परियोजना की सफलता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब मूल जलस्रोत की गुणवत्ता सुरक्षित रहे, अन्यथा किनारे के निर्माण कार्य के बीच जल का दूषित होना पूरी योजना के मूल उद्देश्य को प्रभावित कर सकता है।
पर्यावरण संरक्षण विभाग की भूमिका और तकनीकी जांच की दरकार
नदी में पानी के अचानक काले पड़ने की घटना के बाद अब निगाहें पूरी तरह से राज्य पर्यावरण संरक्षण मंडल और संबंधित विनियामक एजेंसियों की कार्यशैली पर टिकी हैं। नियमों के मुताबिक ऐसी किसी भी संदिग्ध परिस्थिति में तुरंत जल परीक्षण के लिए मानक नमूने संकलित किए जाने चाहिए, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि पानी में रासायनिक विषाक्तता, बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड), सीओडी (केमिकल ऑक्सीजन डिमांड) और ठोस कणों की मात्रा किस स्तर तक पहुंची है। अभी तक इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है कि क्या विभाग की तकनीकी टीम ने प्रभावित हिस्सों से जल के नमूने एकत्र किए हैं अथवा संबंधित औद्योगिक क्षेत्रों के डिस्चार्ज पॉइंटों का भौतिक सत्यापन किया है। औपचारिक जांच रिपोर्ट सामने आने से पहले किसी एक स्रोत को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराना तकनीकी रूप से उचित नहीं होगा, लेकिन पारदर्शिता बनाए रखने के लिए समय पर की गई जांच अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।
नदी की पारिस्थितिकी और जनस्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव
केलो नदी केवल एक जलस्रोत नहीं, बल्कि रायगढ़ शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों की जलापूर्ति, भूजल स्तर और कृषि गतिविधियों की मुख्य आधारशिला है। नदी में अपशिष्ट प्रवाहित होने की स्थिति में जलीय जीवों के जीवन पर सीधा संकट खड़ा हो जाता है, साथ ही तटीय इलाकों के कुओं और बोरवेल के भूजल पर भी इसका दीर्घकालिक असर पड़ता है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए नागरिक समाज और विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन को तुरंत एक संयुक्त जांच दल गठित करना चाहिए, जिसमें पर्यावरण अभियंता, राजस्व और जल संसाधन विभाग के प्रतिनिधि शामिल हों। यह दल वास्तविक कारणों की पड़ताल करे कि यह कालापन केवल ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों की मिट्टी का कटाव है, या फिर वास्तव में किसी औद्योगिक इकाई द्वारा जानबूझकर नियमों की अनदेखी करते हुए गंदा पानी नदी में बहाया गया है, ताकि वस्तुस्थिति स्पष्ट हो सके और नियमानुसार उचित कदम उठाए जा सकें।
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