रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- कल की ही तो बात है जब शहर के मैदान में असत्य पर सत्य की विजय की दुंदुभि बज रही थी, पटाखों के गगनभेदी धमाकों के बीच रावण का विशालकाय पुतला राख के ढेर में तब्दील हो रहा था और मंच से जनप्रतिनिधियों से लेकर प्रशासनिक अमला मर्यादा, अनुशासन और कानून के राज की कसमें खा रहा था। मगर उस भव्य आयोजन की राख अभी पूरी तरह ठंडी भी नहीं हुई थी कि शहर के परिवहन विभाग के दफ्तर से निकलती बदबू ने यह साबित कर दिया कि असली रावण कहीं बाहर नहीं, बल्कि खुद इस सड़े-गले सिस्टम की कुर्सियों पर आसीन होकर ठहाके लगा रहा है। एक तरफ जहां समाज बुराई के अंत का उत्सव मना रहा था, वहीं दूसरी तरफ संभागीय परिवहन कार्यालय की बंद दीवारों के भीतर मोटर वाहन अधिनियम, न्यायिक आदेशों और जनसुरक्षा के सारे कायदे-कानूनों की चिता सजाई जा रही थी। जिले में बिना किसी ड्राइविंग ट्रायल, बिना किसी तकनीकी जांच और बिना आवेदक की क्षमता परखे ड्राइविंग लाइसेंस धड़ाधड़ बांटे जा रहे हैं, मानो किसी धार्मिक जलसे में प्रसाद का वितरण हो रहा हो। सबसे दिल दहला देने वाली बात यह है कि पूरे जिले की नब्ज थामने वाले और कानून-व्यवस्था के सबसे बड़े पहरेदार जिला कलेक्टर इस खुली आपराधिक लापरवाही पर रहस्यमयी चुप्पी साधे बैठे हैं, मानो यह तमाशा उनके अधिकार क्षेत्र से परे किसी दूसरे ग्रह पर घटित हो रहा हो।

धूल फांकते आधुनिक टेस्ट ट्रैक और दलालों के ठिकानों से चलती समानांतर सरकार

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के स्पष्ट और कड़े निर्देश हैं कि किसी भी व्यक्ति को स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने से पहले उसे सख्त ड्राइविंग टेस्ट से गुजरना होगा, जहां उसकी दृष्टि, सिग्नल की समझ, गाड़ी पर नियंत्रण और आपातकालीन परिस्थितियों में लिए जाने वाले फैसले की बाकायदा परीक्षा ली जाए। इसी मंशा से सरकारी खजाने से लाखों-करोड़ों रुपये फूंककर अत्याधुनिक ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक तैयार किए गए, चारों तरफ हाई-डेफिनेशन कैमरे लगाए गए और यह दावा किया गया कि अब कोई भी अयोग्य व्यक्ति स्टीयरिंग नहीं थाम सकेगा। लेकिन जमीनी हकीकत पर नजर दौड़ाइए तो आरटीओ दफ्तर का यह ट्रैक आज वीराने में तब्दील हो चुका है, जहां घास और जंगली झाड़ियां उग आई हैं, सेंसर धूल फांक रहे हैं और कैमरे केवल एक दिखावे का पुतला बनकर रह गए हैं। खेल ट्रैक पर नहीं, बल्कि दफ्तर के बाहर चाय की गुमटियों, फोटोकॉपी की दुकानों और निजी एजेंटों के दफ्तरों से चल रहा है। आवेदक को न कार का क्लच छूना है, न दोपहिया वाहन का बैलेंस दिखाना है और न ही ट्रैफिक नियमों की बुनियादी किताब खोलनी है; सिर्फ दलालों के तयशुदा रेट कार्ड के मुताबिक मोटी रकम की गड्डी मेज के नीचे से सरका दी जाती है। चंद घंटों के भीतर सिस्टम में फर्जी हाजिरी, फर्जी टेस्ट पास का डेटा अपलोड होता है और सरकारी मुहर के साथ एक ऐसा प्लास्टिक कार्ड आवेदक के हाथ में आ जाता है, जो वास्तव में ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बल्कि सड़क पर बेकसूरों को कुचलने का सरकारी परमिट है।

सड़कों पर दौड़ते 'लाइसेंसधारी हत्यारे' और सरकारी जागरूकता का ढोंग

सरकारें हर साल जनता की गाढ़ी कमाई से अरबों रुपये पानी की तरह बहाकर सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाती हैं, नामी हस्तियों से विज्ञापनों में भाषण दिलवाए जाते हैं, दीवारों पर जीवन रक्षा के नारे पोते जाते हैं और ट्रैफिक पुलिस चौराहे पर बिना हेलमेट या सीटबेल्ट वाले आम आदमी की जेब खाली करने में पूरी मुस्तैदी दिखाती है। लेकिन क्या किसी ने कभी यह सोचने की जहमत उठाई कि जब सड़क पर उतरने वाले इंसान को गाड़ी की बुनियादी समझ ही नहीं है, तो हेलमेट और सीटबेल्ट उसे किस हद तक बचा पाएंगे। जब एक ऐसे व्यक्ति को चार पहिया या भारी वाहन चलाने की खुली छूट दे दी जाती है जिसने कभी आपात स्थिति में ब्रेक तक नहीं दबाया, तो वह सड़क पर केवल एक चालक नहीं होता, बल्कि चलता-फिरता यमदूत बन जाता है। आए दिन हाईवे पर, शहर के व्यस्त चौराहों पर और संकरी गलियों में लहूलुहान होकर दम तोड़ते राहगीरों, अनाथ होते बच्चों और उजड़ते परिवारों के खून के छींटे सिर्फ उस गाड़ी के पहियों पर नहीं हैं, बल्कि सीधे तौर पर आरटीओ के उन भ्रष्ट अफसरों के सफेदपोश कॉलर पर भी हैं जिन्होंने नोटों की चमक देखकर अयोग्य हाथों में स्टीयरिंग थमाई है। यह महज सामान्य रिश्वतखोरी का मामला नहीं है, यह सीधे तौर पर जनसंहार को न्योता देने वाली संगठित आपराधिक साजिश है।

कलेक्टर का मौन: प्रशासनिक लाचारी या रसूखदार सिंडिकेट के आगे आत्मसमर्पण

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक मुखिया यानी जिला कलेक्टर की भूमिका पर उठता है। कलेक्टर जिले की आंख, कान और नाक होता है; उसके पास जिले के किसी भी सरकारी दफ्तर में औचक निरीक्षण करने, अनियमितता पाए जाने पर मौके पर ताला जड़ने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिक दर्ज कराकर शासन को निलंबन की संस्तुति भेजने की असीमित शक्तियां होती हैं। शहर का बच्चा-बच्चा जानता है कि आरटीओ दफ्तर में किस दलाल का क्या रेट चल रहा है, स्थानीय अखबार और सजग नागरिक लगातार इस धांधली की ओर इशारा कर रहे हैं, फिर भी कलेक्ट्रेट की तीसरी मंजिल पर बैठे साहब के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। क्या जिला कलेक्टर इतने असहाय हैं कि वे अपने ही जिले के एक विभाग के अफसरों पर नकेल नहीं कस सकते, या फिर परिवहन विभाग का यह सिंडिकेट इतना रसूखदार और राजनीतिक रूप से ताकतवर है कि उसके सामने जिले की सर्वोच्च प्रशासनिक कुर्सी ने भी घुटने टेक दिए हैं। अक्सर अधिकार क्षेत्र और तकनीकी पेचीदगियों की आड़ लेकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि आरटीओ एक अलग कैडर है, लेकिन जब बात हजारों निर्दोष नागरिकों की जान की सुरक्षा की हो, तो कोई भी नियम किसी संवेदनशील प्रशासक को हाथ पर हाथ धरे बैठने की इजाजत नहीं देता। यह खामोशी आम जनता के मन में यह गहरा संदेह पैदा करती है कि कहीं इस बंधी-बंधाई व्यवस्था की मलाई की धार ऊपर तक तो नहीं पहुंच रही।

दिखावटी जांच समितियों का दौर खत्म कर सीधे फॉरेंसिक और तकनीकी ऑडिट की जरूरत

अब वक्त कागजी खानापूर्ति और लीपापोती वाली ऐसी जांच कमेटियों के गठन का नहीं है, जिनकी रिपोर्टें आने से पहले ही ठंडे बस्ते में दफन हो जाती हैं। यदि शासन और प्रशासन में जरा सी भी जनहित की भावना बची है, तो तत्काल एंटी करप्शन ब्यूरो, राज्य सतर्कता विंग और तकनीकी विशेषज्ञों की संयुक्त टीम बनाकर आरटीओ दफ्तर पर छापा मारा जाना चाहिए। पिछले छह महीनों में जितने भी स्थायी लाइसेंस जारी किए गए हैं, उनका आरटीओ सर्वर पर दर्ज ट्रायल समय और उसी समय के ट्रैक के सीसीटीवी कैमरों के फुटेज का फॉरेंसिक मिलान कराया जाए; दूध का दूध और पानी का पानी उसी पल हो जाएगा कि कितने आवेदक वास्तव में ट्रैक पर गाड़ी दौड़ा रहे थे और कितनों की हाजिरी बंद कमरों में फर्जी तरीके से लगाई गई है। उन तमाम बिचौलियों, कंप्यूटर ऑपरेटरों और परिवहन अधिकारियों के कॉल डिटेल्स और बैंक खातों की गहन जांच होनी चाहिए जो इस सिंडिकेट की रीढ़ बने हुए हैं। जब तक इन सफेदपोश अपराधियों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता और बिना टेस्ट के जारी हुए हजारों लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निरस्त नहीं किए जाते, तब तक कल जलाया गया रावण केवल एक तमाशा ही रहेगा, क्योंकि समाज को असल में उस रावण से खतरा है जो रोज जनता के विश्वास और इंसानी जिंदगियों की सरेआम बलि चढ़ा रहा है।