रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- संस्कारधानी रायगढ़ कल विजयादशमी के महापर्व पर आस्था, परंपरा और उल्लास के एक अनूठे संगम की साक्षी बनी। शहर के ऐतिहासिक रामलीला मैदान, नटवर स्कूल परिसर और मिनी स्टेडियम में गगनभेदी जयकारों, ढोल-नगाड़ों और आतिशबाजी के भीषण धमाकों के बीच बुराई के प्रतीक दशानन के गगनचुंबी पुतले धू-धू कर जल उठे। मैदानों में लाखों का जनसैलाब उमड़ा, बच्चों ने पिताओं के कंधों पर बैठकर साठ-सत्तर फीट ऊंचे पुतले को जलते देखा और हर किसी ने एक-दूसरे को 'असत्य पर सत्य की विजय' की बधाइयां दीं।

परंतु, इस पूरे जलसे और शांत हो चुके बारूदी धुएं के बीच एक अत्यंत चुभता, निष्पक्ष और बेचैन कर देने वाला सवाल हर संवेदनशील नागरिक के जेहन में कौंध रहा है। जिस रावण को हम हर साल लाखों-करोड़ों रुपये के पटाखे लगाकर जलाते हैं, वह तो त्रेतायुग में ही भगवान श्रीराम के बाणों से मोक्ष पा चुका था। फिर हम हर साल किसे जला रहे हैं? और उससे भी बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि जो लाखों लोग उस पुतले का दहन देखकर तालियां पीटते घर लौटे, क्या वे अपने भीतर के दुर्गुणों, लालच और वासना को मारकर लौटे हैं? या फिर यह सिर्फ एक सालाना रस्म अदायगी बनकर रह गई है, जहां बाहर का पुतला जलकर राख हो जाता है और हमारे भीतर का रावण मंद-मंद मुस्कुराते हुए सुरक्षित घर लौट आता है?

त्रेता का धर्मयुद्ध: मर्यादा की रक्षा के लिए उठा था कोदंड

रावण दहन कोई आधुनिक तमाशा नहीं, बल्कि यह सनातन संस्कृति के उस सर्वोच्च नैतिक दर्शन की याद दिलाता है जहां अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित माना गया है। रामायण के पन्नों को निष्पक्षता से पलटें, तो लंकापति रावण कोई साधारण सत्ताधीश नहीं था। वह चारों वेदों का ज्ञाता, शास्त्रों का मर्मज्ञ, महान ‘शिव तांडव स्तोत्र’ का रचयिता और त्रिकालदर्शी महाविद्वान था। उसकी लंका स्वर्णमयी थी और उसकी शक्ति के आगे दिशाएं कांपती थीं। मगर ऐसे महापराक्रमी और ज्ञानी का समूल विनाश क्यों हुआ?

वजह स्पष्ट थी— मर्यादा का घोर उल्लंघन, परस्त्री के प्रति दूषित वासना और सत्ता का अंधा अहंकार। जब रावण ने माता सीता का छल से हरण किया, तब उसने अक्षम्य पाप की नींव रखी। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई किसी जमीन के टुकड़े या स्वर्ण सिंहासन के लिए नहीं की थी; वह युद्ध धर्म की पुनर्स्थापना और मानवता की मर्यादा की रक्षा का महासंग्राम था। प्रभु श्रीराम ने रावण को सुधार के कई मौके दिए, लेकिन जब बुद्धि पर अहंकार का पर्दा पड़ जाता है तो विनाश ही एकमात्र मार्ग बचता है। अंततः दशमी के दिन श्रीराम ने रावण की नाभि के अमृत कुंड को सुखाते हुए दिव्य बाण का संधान किया और अधर्म का वह विशालकाय स्तम्भ धराशायी हो गया। उसी दिन से समाज को यह अमर संदेश देने के लिए रावण दहन की परंपरा शुरू हुई कि पद, प्रतिष्ठा, ज्ञान और दौलत चाहे कितनी भी बड़ी हो, यदि चरित्र भ्रष्ट हो गया तो अंत सर्वनाश ही होगा।

शांत होता धुआं और समाज का दोहरा चरित्र

त्रेता का वह पावन संदेश आज के कलयुग में कहां खो गया, यह सोचना आज सबसे जरूरी हो चुका है। रायगढ़ के मैदानों में जब आग की लपटें उठीं, तो हजारों हाथ तालियां बजा रहे थे। अभिभावक अपने बच्चों को सीख दे रहे थे कि रावण कितना बुरा था। लेकिन क्या कभी हमने अपने भीतर झांकने का साहस किया?

कड़वा सच यह है कि आज का समाज एक भयानक पाखंड के साए में जी रहा है। हम साल के 364 दिन समाज में अनीति, झूठ, बेईमानी और शोषण का तांडव देखते हैं, कई बार मूकदर्शक या भागीदार बनते हैं, और विजयादशमी के दिन बांस-कागज के बेजान ढांचे को जलता देखकर यह मुगालता पाल लेते हैं कि हमने बुराई को समाप्त कर दिया। अगर पुतले को फूंकने भर से बुराई खत्म हो जाती, तो हर साल अपराधों का ग्राफ क्यों बढ़ रहा है? आखिर यह कौन सी दोहरी मानसिकता है जो मैदान में रावण के जलने पर सीटी बजाती है, लेकिन सड़क पर उतरते ही खुद किसी दुर्दांत रावण की तरह आचरण करने लगती है?

चीखती अस्मतें: देवी पूजने वाले मुल्क में बेटियां कब होंगी महफूज?

यह सवाल कलेजे को चीर देता है कि जिस देश में अभी कल तक नवरात्र की नवमी पर कन्याओं के पांव पखार कर उन्हें साक्षात जगदम्बा माना गया, उसी देश में महिलाओं और मासूम बच्चियों की चीखें क्यों नहीं थम रहीं? क्या हम भूल गए कि रावण ने माता सीता का हरण तो किया था, मगर अशोक वाटिका में उन्हें बिना उनकी सहमति के स्पर्श तक नहीं किया था। आज के वहशी दरिंदों ने तो उस रावण की मर्यादाओं को भी पाताल में धकेल दिया है।

अस्पतालों से लेकर स्कूलों तक, सुनसान गलियों से लेकर घरों की चहारदीवारी तक— मासूम बच्चियों और युवतियों के साथ होने वाली दरिंदगी, बलात्कार और हत्या की घटनाएं बताती हैं कि समाज में हवस का रावण आज भी खुलेआम घूम रहा है। वे दरिंदे भी हमारे ही समाज का हिस्सा हैं; संभव है कि कल वे भी नए कपड़े पहनकर रावण दहन देखने की भीड़ में शामिल रहे हों। क्या उनके अंदर का रावण मरा? जब तक इस देश की बेटी आधी रात को बिना किसी भय के सड़क पर सिर उठाकर नहीं चल सकती, तब तक किसी भी मैदान में रावण का पुतला जलाना महज़ एक खोखला दिखावा है।

करप्शन की दीमक: सरकारी चौखटों पर दलालों की समानांतर हुकूमत

अधर्म केवल देह की हिंसा में नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक सड़न में भी है जो एक आम नागरिक की हड्डियों तक को निचोड़ रही है। यह व्यवस्था की वह नंगी हकीकत है जिसे हर आदमी रोज झेलता है। एक अदद राशन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, जमीन का नामांतरण या किसी सरकारी योजना के लाभ के लिए आम आदमी को दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते चप्पलें घिसनी पड़ती हैं।

सवाल यह है कि अगर तंत्र इतना ही पारदर्शी और ईमानदार है, तो सरकारी दफ्तरों के इर्द-गिर्द बिचौलियों और दलालों की समानांतर दुकान क्यों सजती है? क्यों एक गरीब और बेसहारा नागरिक सीधे टेबल तक पहुंचने से कतराता है? किसी जरूरतमंद की लाचारी पर अपनी जेबें भरने वाले, फाइलों को अटकाकर रिश्वत की सौदेबाजी करने वाले क्या किसी रावण से कम हैं? टेबल के नीचे से जाने वाला वह हर नोट किसी गरीब के बच्चों की भूख और उसके हक का खून है। व्यवस्था में कुंडली मारकर बैठा यह लालच का रावण देश की जड़ों को दीमक की तरह चाट रहा है।

खाकी, कानून और झूठे मुकदमे: न्याय की तराजू पर किसका पहरा?

न्याय व्यवस्था समाज की अंतिम उम्मीद होती है, जहां पीड़ित इंसाफ की आस लेकर पहुंचता है। मगर आज के दौर में रंजिश, ब्लैकमेलिंग और अवैध वसूली के लिए थानों में झूठे मुकदमे दर्ज कराने की प्रवृत्ति एक गंभीर नासूर बन चुकी है। किसी शरीफ इंसान को फर्जी केस में उलझाकर उसका जीवन, सामाजिक प्रतिष्ठा और पूरा परिवार बर्बाद कर दिया जाता है।

कानून की किताबों में—चाहे वह पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 182 व 211 रही हो, या वर्तमान भारतीय न्याय संहिता (BNS) के कड़े प्रावधान—प्रशासन को गुमराह कर झूठी शिकायत दर्ज कराने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का स्पष्ट अधिकार मौजूद है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन धाराओं का इस्तेमाल न के बराबर होता है। पुलिस महकमा झूठे षड्यंत्रकारियों पर तत्काल नकेल कसने से आखिर क्यों कतराता है? जब किसी बेकसूर की चीखें थानों की दीवारों से टकराकर लौट जाती हैं और रसूख के बल पर सच का दम घोंट दिया जाता है, तब खाकी की मर्यादा पर भी सवाल खड़े होते हैं। क्या वहां भी किसी के भीतर का रावण सच का गला घोंट रहा है?

साइबर ठगी का मायाजाल: स्क्रीन के पीछे छिपे आधुनिक मारीच

समय के साथ अपराध के हथियार बदल गए हैं। त्रेतायुग में रावण ने छल के लिए मारीच को सोने के हिरण का रूप धराया था; आज का साइबर अपराधी मोबाइल स्क्रीन और इंटरनेट के अदृश्य जाल के पीछे छिपकर वही मायावी खेल खेल रहा है। आज साइबर फ्रॉड देश का सबसे घातक और खामोश हथियार बन चुका है। खून-पसीने की गाढ़ी कमाई, बुजुर्गों की पेंशन और बेटियों की शादी के लिए संजोया एक-एक रुपया मोबाइल पर आए एक लिंक, फर्जी कॉल या ‘डिजिटल अरेस्ट’ की धमकी से सेकंडों में लुट जाता है।

लोग अवसाद में आकर जान दे रहे हैं। यह कौन सा रावण है? यह वह अदृश्य और निर्दयी रावण है जो बिना कोई अस्त्र उठाए, सिर्फ अपनी मक्कारी से हंसते-खेलते परिवारों को सड़क पर ला खड़ा करता है। समाज में पसरा यह अंधी कमाई का लालच इस बात का सबूत है कि हमारी सामूहिक नैतिकता वेंटिलेटर पर चली गई है।

जब तक भीतर का अंधकार नहीं मिटेगा, तब तक दहन अधूरा है

कल शाम रायगढ़ के नटवर स्कूल, रामलीला मैदान और मिनी स्टेडियम में बारूद का शोर कान के पर्दों को फाड़कर शांत हो गया, पुतले जलकर मिट्टी में मिल गए और मैदान खाली हो गए।

अब उस ठंडी पड़ चुकी राख के ढेर की तरफ देखकर खुद से यह सवाल जरूर पूछिए—क्या आज सुबह इस शहर की सड़कें महिलाओं के लिए महफूज हो गईं? क्या सरकारी दफ्तरों से दलाल गायब हो गए? क्या किसी गरीब का हक छीनना बंद हो गया? क्या साइबर ठगों की उंगलियां रुक गईं?

यदि जवाब 'ना' है, तो समझ लीजिए कि कल शाम हमने सिर्फ बांस और कागज का एक पुतला जलाया है; असली रावण तो हमारे आसपास, हमारे समाज में और कई बार हमारे अपने ही सीने के भीतर अट्टहास कर रहा है।

दशहरा सिर्फ एक रस्म नहीं, आत्मशुद्धि का महासंकल्प है। रावण को मैदानों में नहीं, अपने भीतर के अहंकार, लोभ, वासना और भ्रष्टाचार की नाभि में मारना होगा। जिस दिन समाज का हर नागरिक पराई स्त्री के सम्मान की रक्षा को अपना धर्म मान लेगा, जिस दिन एक अधिकारी बिना घूस के फाइल को आगे बढ़ा देगा, और जिस दिन हम दूसरों के हक पर डाका डालना बंद कर देंगे—उसी दिन इस देश में भगवान श्रीराम का सच्चा राज आएगा और विजयादशमी का पर्व अपनी वास्तविक सार्थकता को हासिल करेगा।