रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- छत्तीसगढ़ की ऊर्जा और उद्योग धानी के रूप में अपनी पहचान रखने वाला रायगढ़ जिला अब एक ऐसे काले साम्राज्य के केंद्र के रूप में कुख्यात हो रहा है, जहां देश के कानून, सड़क सुरक्षा के मानकों और नागरिकों के जीवन की कीमत को चंद रुपयों के लालच में दलालों की तिजोरी में बंद कर दिया गया है। रायगढ़ क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय यानी आरटीओ इन दिनों भ्रष्टाचार, मनमानी और संगठित फर्जीवाड़े की एक ऐसी अंतहीन प्रयोगशाला में तब्दील हो चुका है, जहां से बिना किसी वैध दस्तावेज, बिना स्थानीय निवास और बिना स्टेयरिंग पर हाथ रखे धड़ल्ले से ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए जा रहे हैं। यह कोई मामूली प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि अफसरों, रसूखदार नेताओं और अंतरराज्यीय दलालों का ऐसा संगठित सिंडिकेट है, जो चंद टुकड़ों की खातिर आम जनता को मौत के मुहाने पर धकेलने में जरा भी नहीं झिझक रहा। जिस विभाग का बुनियादी दायित्व सड़कों को सुरक्षित बनाना और सिर्फ योग्य चालकों को वाहन चलाने का प्राधिकार देना था, वही विभाग आज फर्जी शपथपत्रों और फर्जी कागजातों के दम पर अयोग्य, अप्रशिक्षित चालकों को कानूनी कवच पहनाने की फैक्टरी बन चुका है। सड़कों पर हर दिन बिखरती लाशें, उजड़ती मांगें और अनाथ होते बच्चे चीख-चीख कर सवाल कर रहे हैं कि रायगढ़ के इस फर्जीवाड़े का असली आका कौन है और आखिर किसके अभयदान से यह खूनी खेल सालों से बदस्तूर जारी है।

सीमा पार से उमड़ता हुजूम और रायगढ़ में सजती फर्जीवाड़े की मंडी..

रायगढ़ जिले की भौगोलिक सीमाएं पड़ोसी राज्य ओडिशा से सटी हुई हैं, और इसी सीमाई निकटता का नाजायज फायदा उठाकर यहां एक समानांतर व्यवस्था खड़ी कर दी गई है। ओडिशा में कड़े नियमों, आधुनिक सेंसर वाले स्वचालित ट्रैक्स, बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन और सख्त प्रशासनिक निगरानी के चलते जब अयोग्य लोगों को लाइसेंस मिलना नामुमकिन हो गया, तो उनके लिए रायगढ़ आरटीओ स्वर्ग बन गया। ओडिशा के हजारों नागरिक, जिनका न तो रायगढ़ में कोई रिहायशी ठिकाना है, न कोई कारोबार है और न ही वे यहां किसी कारखाने या दुकान में मजदूरी करते हैं, वे रातों-रात रायगढ़ के वैध नागरिक बनकर लाइसेंस हासिल कर रहे हैं। नियम-कायदे कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति का लाइसेंस तभी बन सकता है जब वह संबंधित आरटीओ क्षेत्र का स्थायी या अस्थायी निवासी हो। यदि कोई अस्थायी निवासी है तो उसके पास वैध किरायानामा, बिजली बिल, स्थानीय संस्थान का नियुक्ति पत्र या पुलिस सत्यापन होना अनिवार्य है। लेकिन रायगढ़ के भ्रष्ट तंत्र में इन कानूनी औपचारिकताओं की कोई कीमत नहीं बची है। यहां कुछ फर्जी नोटरी कर्ताओं और दलालों के गठजोड़ से फर्जी एफिडेविट गढ़े जाते हैं, जिन पर बिना आवेदक की शारीरिक मौजूदगी के सील और दस्तखत थोप दिए जाते हैं। थाने से चरित्र या पते का सत्यापन कराने की जहमत तक नहीं उठाई जाती और महज कुछ घंटों के भीतर बाहरी राज्य का एक अनजान चेहरा रायगढ़ का बाशिंदा बनकर ड्राइविंग लाइसेंस की सरकारी मान्यता जेब में डालकर सीना तानकर बाहर निकल जाता है।

बाबा ट्रैवल्स पर पड़ी रेड ने खोली पोल, मगर बड़े मगरमच्छ अब भी गिरफ्त से बाहर..

इस संगठित फर्जीवाड़े का पर्दाफाश तब हुआ जब पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीम ने कुछ समय पहले रायगढ़ के बाबा ट्रैवल्स पर अचानक छापेमारी की थी। इस छापेमारी में दफ्तर से करीब 180 लाइसेंस, ढेरों संदिग्ध आवेदन, कूटरचित दस्तावेज और फर्जी सील-मुहरें बरामद की गईं। यह कार्रवाई चीख-चीख कर गवाही दे रही थी कि जिले में एक समानांतर आरटीओ चल रहा था जहां ओडिशा के सैकड़ों लोगों के कागजात थोक के भाव तैयार किए जा रहे थे। इस खुलासे के बाद पूरे प्रशासनिक हलके में हड़कंप मच गया और आनन-फानन में मामले को दबाने और केवल छोटे प्यादों की बलि देने का खेल शुरू हो गया। पुलिस ने एजेंटों को पकड़कर वाहवाही तो लूट ली, लेकिन इस पूरे प्रकरण का सबसे स्याह और विचलित करने वाला पहलू यह रहा कि उन परिवहन अधिकारियों के गिरेबान तक कानून के हाथ नहीं पहुंचे, जिनकी डिजिटल आईडी और पासवर्ड से इन सभी 180 फाइलों को फाइनल अप्रूवल दिया गया था। एजेंट तो केवल ऑनलाइन आवेदन भर सकता है, फर्जी दस्तावेज अपलोड कर सकता है, लेकिन उन दस्तावेजों की मूल प्रतियों का मिलान करना, आवेदक की वास्तविक पहचान देखना, उसे ड्राइविंग ट्रैक पर उतारकर उसकी गाड़ी चलवाने की क्षमता जांचना और अंत में सिस्टम पर ‘पास’ का बटन दबाना तो पूरी तरह से परिवहन विभाग के जांच और अनुमोदन अधिकारी के हाथ में होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दफ्तर में बैठकर आंख मूंदकर फाइलों को पास करने वाले अफसर दूध के धुले हैं? बाबा ट्रैवल्स मामले में उन जांच अधिकारियों को सरकारी फाइलों में क्लीन चिट जैसी खामोशी क्यों बख्शी गई? क्या उनका हिस्सा पहले से तय था, या फिर उनके ऊपर किसी सफेदपोश राजनीतिक ताकत का वरदहस्त था जिसके दबाव में जांच की सुई को अफसरों की दहलीज से पहले ही मोड़ दिया गया?

सदन में गूंजी फर्जीवाड़े की गूंज: 1.48 लाख में केवल एक फेल, क्या यह अंधेरगर्दी का चरम नहीं?

रायगढ़ और छत्तीसगढ़ के परिवहन महकमे में चल रही इस अंधेरगर्दी का कच्चा चिट्ठा जब प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत यानी विधानसभा के पटल पर खुला, तो हर कोई दंग रह गया। भारतीय जनता पार्टी के विधायक अनुज शर्मा ने सदन में सीधे सरकार और परिवहन मंत्रालय को घेरते हुए 1 अप्रैल 2024 से 1 जनवरी 2026 तक के आधिकारिक आंकड़े पेश किए। मंत्रालय की ओर से दिए गए जवाब ने पूरे सिस्टम की बखिया उधेड़ कर रख दी। इस समयावधि के दौरान प्रदेश में कुल 1 लाख 48 हजार ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए गए, और हैरत की बात यह रही कि इस पूरी प्रक्रिया में महज 1 व्यक्ति को टेस्ट में फेल किया गया। यह आंकड़ा अपने आप में एक भद्दा मजाक है। क्या छत्तीसगढ़ और विशेषकर रायगढ़ के आरटीओ में लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाला हर नौसिखिया, बुजुर्ग, युवा या अनपढ़ व्यक्ति ड्राइविंग का इतना बड़ा धुरंधर था कि 1.48 लाख लोगों में से किसी ने एक खंभा नहीं गिराया, किसी ने रिवर्स में गलती नहीं की, किसी ने सिग्नल की अनदेखी नहीं की? यह अविश्वसनीय आंकड़ा इस बात का निर्विवाद और पुख्ता सबूत है कि परिवहन विभाग के टेस्टिंग ट्रैक्स पर गाड़ियां नहीं, बल्कि सिर्फ रिश्वत की फाइलें दौड़ती हैं। वहां किसी का ट्रायल लिया ही नहीं जाता। विधायक ने सदन में सीधे तौर पर परिवहन मंत्री केदार कश्यप से गुहार लगाई कि हर एक आवेदक के ड्राइविंग ट्रायल की अनिवार्य रूप से वीडियोग्राफी कराई जाए, ताकि कैमरे की आंख से सच सामने आ सके। यह आंकड़ा साबित करता है कि आरटीओ कार्यालय में सुरक्षा की कसौटी को पूरी तरह ताक पर रखकर लाइसेंस की रेवड़ियां बांटी जा रही हैं, और इसी का खूनी परिणाम है कि आज प्रदेश की सड़कें हर दिन खून से लाल हो रही हैं और सड़क हादसों का ग्राफ बेतहाशा बढ़ रहा है।

ओडिशा का सख्त पहरा बनाम छत्तीसगढ़ का खुला चारागाह..

इस पूरे खेल का एक और स्याह पहलू दोनों राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था का वह भारी अंतर है, जो रायगढ़ को दलालों की पहली पसंद बनाता है। ओडिशा के आरटीओ अधिकारी संजय बेहरा ने पूर्व में बहुत स्पष्ट शब्दों में सार्वजनिक तौर पर आगाह किया था कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के स्पष्ट निर्देश हैं कि पूरे देश का डेटाबेस सिर्फ और सिर्फ 'सारथी' पोर्टल पर एक समान होना चाहिए। ओडिशा ने इस दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाते हुए अपने 19 आधुनिक ड्राइविंग टेस्टिंग ट्रैक्स को अत्याधुनिक सेंसरों और हाई-डेफिनेशन कैमरों से लैस कर दिया है। वहां कोई भी व्यक्ति तब तक लाइसेंस हासिल नहीं कर सकता जब तक वह खुद ट्रैक पर उतरकर सेंसरों के सामने अपनी ड्राइविंग कुशलता साबित न कर दे, और इसके साथ ही बायोमेट्रिक व फेशियल रिकग्निशन के जरिए उसकी शारीरिक मौजूदगी दर्ज न हो जाए। वहां फर्जीवाड़े की कोई गुंजाइश नहीं बची, दलालों की दुकानें बंद हो गईं। इसी सख्ती से बचने के लिए ओडिशा के गैर-कुशल चालक और आपराधिक प्रवृत्ति के लोग रायगढ़ की ओर रुख करते हैं। अधिकारी ने दो टूक चेतावनी दी थी कि बिना ट्रायल और बिना असल पते के दलालों को पैसे देकर बनवाया गया लाइसेंस एक गंभीर और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे लाइसेंस कानूनी रूप से शून्य हैं। यदि कोई चालक ऐसे फर्जी लाइसेंस के आधार पर गाड़ी चलाते हुए किसी की जान ले लेता है, तो कानूनन उसे और वाहन मालिक को सीधे जेल जाना पड़ेगा। इतना ही नहीं, किसी भी सड़क हादसे की स्थिति में कोई भी बीमा कंपनी एक पैसे का क्लेम पास नहीं करेगी, क्योंकि बिना वैध सत्यापन के जारी हुआ लाइसेंस कानूनी रूप से अवैध माना जाता है।

ओडिशा STA का ऐतिहासिक हंटर: अफसरों पर एफआईआर और सीधी बर्खास्तगी की चेतावनी..

रायगढ़ में मचे इस तांडव की तपिश जब सीमा पार पहुंची और वहां की व्यवस्था पर सवाल उठने लगे, तो ओडिशा राज्य परिवहन प्राधिकरण (STA) ने एक अत्यंत कड़ा और गैर-समझौतावादी परिपत्र जारी कर दिया। ओडिशा सरकार के परिवहन आयुक्त ने साफ लफ्जों में फरमान जारी किया कि बिना जमीनी पड़ताल, बिना आवेदक के वास्तविक स्थानीय निवास और कार्यस्थल की भौतिक जांच किए बिना किसी भी फाइल को केवल कंप्यूटर स्क्रीन पर ‘मैकेनिकल अप्रूवल’ देना कानून का खुला उल्लंघन और आपराधिक कृत्य माना जाएगा। ओडिशा में हुए एक भीषण सड़क हादसे की जांच में यह खौफनाक सच सामने आया था कि एक बाहरी राज्य के व्यक्ति के नाम पर बिना किसी सत्यापन के सिर्फ केयर ऑफ (C/o) पते पर कमर्शियल गाड़ी का मालिकाना हक ट्रांसफर कर दिया गया था। वह वाहन बिना फिटनेस, बिना वैध परमिट, बिना इंश्योरेंस और बिना टैक्स भरे सड़कों पर दौड़ता रहा और एक दिन उसने कई निर्दोष राहगीरों को कुचलकर मौत की नींद सुला दिया। जब पुलिस और परिवहन विभाग ने गाड़ी मालिक के पते पर नोटिस भेजा, तो वह पता पूरी तरह फर्जी और हवा-हवाई निकला। इस खौफनाक घटना से सबक लेते हुए ओडिशा ने यह तय कर दिया कि अब अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय होगी। यदि किसी आरटीओ अधिकारी ने अपनी लॉगिन आईडी और पासवर्ड किसी बाबू, क्लर्क या दलाल से साझा किया, या बिना मूल दस्तावेजों की जांच किए फर्जी पते पर मुहर लगाई, तो उसे सिर्फ निलंबित नहीं किया जाएगा, बल्कि सेवा से बर्खास्त करते हुए उसके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का आपराधिक मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा जाएगा।

रायगढ़ के अफसरों की संवेदनहीनता: कब टूटेगी सत्ता और सिस्टम की रहस्यमयी चुप्पी?

ओडिशा सरकार की इस त्वरित, कठोर और पारदर्शी कार्रवाई के आईने में जब हम रायगढ़ के परिवहन तंत्र को देखते हैं, तो वहां की तस्वीर शर्मनाक और स्तब्ध करने वाली नजर आती है। ओडिशा ने जहां फर्जीवाड़े की आहट मात्र से अपने समूचे तंत्र को झकझोर कर रख दिया और लापरवाह अफसरों की गर्दन नापने के आदेश जारी कर दिए, वहीं रायगढ़ का परिवहन विभाग आज भी कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ है। यहां के जिम्मेदार अधिकारी अपनी वातानुकूलित केबिनों में बैठकर सिर्फ कागजों पर डिजिटल साइन करने में व्यस्त हैं। जिस बाबा ट्रैवल्स से 180 लाइसेंस जब्त हुए, उस मामले में आज तक यह सार्वजनिक नहीं किया गया कि वे लाइसेंस किन कंप्यूटर सिस्टमों से, किन अफसरों के डिजिटल सिग्नेचर से और किस बाबू की अनुशंसा पर अप्रूव हुए थे। क्या रायगढ़ के अफसरों की यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वे उन सभी करीब 180 लाइसेंसों को तुरंत प्रभाव से 'सारथी' पोर्टल पर ब्लॉक करते, उनके खिलाफ सार्वजनिक नोटिस जारी करते और फर्जी नोटरी बनाने वाले एजेंटों व वकीलों की सनद रद्द करने के लिए बार काउंसिल और पुलिस को पत्र लिखते? लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, ताकि वक्त बीतने के साथ धूल जम जाए और दलालों का यह अरबों का सिंडिकेट बिना किसी रुकावट के दोबारा अपनी जड़ें जमा सके। विभाग का यह ढुलमुल रवैया साफ इशारा करता है कि इस हमाम में सब नंगे हैं और जब तक ऊपर से नीचे तक कमीशन की मलाई बंटती रहेगी, तब तक जनता की जान की हिफाजत की उम्मीद करना बेमानी है।

फर्जी लाइसेंस यानी खुलेआम घूमता ‘लाइसेंस टू किल’

सड़क सुरक्षा के विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि बिना टेस्ट और बिना कड़े प्रशिक्षण के किसी भी व्यक्ति के हाथ में ड्राइविंग लाइसेंस थमाना, दरअसल उसके हाथ में एक लोडेड बंदूक थमाने जैसा है। जब एक अप्रशिक्षित, अनुभवहीन या अक्षम चालक रायगढ़ की संकरी, भारी वाहनों से पटी और बदहाल सड़कों पर निकलता है, तो वह केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि सामने से आ रहे किसी बेकसूर बाइक सवार, स्कूल जाते बच्चे या पैदल चलते राहगीर के लिए साक्षात मौत बनकर दौड़ता है। रायगढ़ जिला पहले से ही भारी औद्योगिक प्रदूषण, कोल ट्रांसपोर्टिंग और अनियंत्रित भारी वाहनों के दबाव से कराह रहा है। यहां रोजाना होने वाले जानलेवा सड़क हादसों में बेकसूर लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। इन हादसों की तह में जब जाया जाता है, तो अधिकांश मामलों में चालकों के पास या तो फर्जी कागजात होते हैं, या फिर वे उस भारी वाहन को चलाने की बुनियादी तकनीकी समझ तक नहीं रखते। और इस पूरे खूनी खेल का सबसे बड़ा गुनहगार कोई और नहीं, बल्कि रायगढ़ का परिवहन कार्यालय है, जो अपनी तिजोरियां भरने के लिए ऐसे अयोग्य हत्यारों को सड़कों पर कानूनी तौर पर खुला छोड़ रहा है। अगर कोई अप्रशिक्षित चालक किसी परिवार के इकलौते चिराग को कुचल देता है, तो उस मौत की पहली एफआईआर उस चालक के साथ-साथ रायगढ़ आरटीओ के उस अनुमोदन अधिकारी पर दर्ज होनी चाहिए, जिसने बिना ट्रायल लिए केवल अपनी टेबल के नीचे पहुंचे लिफाफे के दम पर उसे ‘पारंगत’ घोषित कर दिया था।

दलाली के दलदल में धंसता सिस्टम: अब आर-पार की लड़ाई का वक्त..

रायगढ़ में परिवहन विभाग की यह सड़ांध अब सिर्फ एक जिले या एक दफ्तर की प्रशासनिक अव्यवस्था नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे राज्य के सुशासन के दावों पर एक करारा तमाचा बन चुकी है। क्या स्थानीय प्रशासन, जिला कलेक्टर, संभागायुक्त और राजधानी रायपुर में बैठे नीति-नियंताओं को रायगढ़ की यह बदहाली दिखाई नहीं देती? क्या खुफिया एजेंसियों के पास यह जानकारी नहीं है कि किस एजेंट के जरिए, किस नोटरी के पास फर्जी एफिडेविट का कच्चा माल तैयार होता है और वह कैसे आरटीओ की दहलीज पार करके डिजिटल अप्रूवल में तब्दील हो जाता है? सच सब जानते हैं, लेकिन इस सिंडिकेट के तार इतने गहरे और रसूखदार हैं कि कोई भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने को तैयार नहीं है। स्थानीय विधायक द्वारा विधानसभा में मुद्दा उठाए जाने के बाद भी अगर रायगढ़ में जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नहीं आता, ट्रैक्स पर अनिवार्य वीडियोग्राफी शुरू नहीं होती, सभी पुराने संदिग्ध लाइसेंसों की फोरेंसिक जांच नहीं कराई जाती और भ्रष्ट अफसरों को हथकड़ी नहीं लगती, तो यह मान लिया जाएगा कि यह पूरा तंत्र सड़ चुका है और इसे आम जनता की जान-माल की कोई परवाह नहीं है। अब वक्त लीपापोती का नहीं, बल्कि आर-पार की कार्रवाई का है। जब तक रायगढ़ आरटीओ के पिछले तीन सालों के पूरे रिकॉर्ड की किसी उच्चस्तरीय स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच नहीं कराई जाती और डिजिटल हस्ताक्षर करने वाले बड़े चेहरों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक सड़कों पर यूं ही खून बहता रहेगा और रायगढ़ का यह फर्जीवाड़ा पूरे प्रदेश के माथे पर कलंक बनकर चमकता रहेगा। जनता अब जवाब मांग रही है, और इस बार जवाब केवल कागजी आश्वासनों से नहीं, बल्कि ठोस कार्यवाहियों से देना होगा।