बस्तर@TAKKAR न्यूज :- बस्तर की हरी-भरी वादियों और खनिज संपदा से लदी बैलाडीला की पहाड़ियों के पीछे छिपा खौफनाक सच अब एक बड़े पर्यावरणीय और मानवीय नरसंहार की तस्वीर पेश कर रहा है। राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (NMDC) के डिपॉजिट 14, 13, 11C, 11B और 5 जैसी विशालकाय खदानों से होने वाले अंधाधुंध खनन का जहरीला कचरा सीधे तालपेरू नाले और सहायक नदियों में झोंका जा रहा है। जिस जलधारा से कभी पीढ़ियों की प्यास बुझती थी, आज वह किसी बहते हुए खून की तरह सुर्ख लाल और गाढ़े दलदल में तब्दील हो चुकी है। मुनाफा कमाने की अंधी दौड़ में सरकारी तंत्र और सार्वजनिक उपक्रम ने मिलकर बस्तर के प्राकृतिक जलस्रोतों को जहरीले रासायनिक मलबे का डंपिंग ग्राउंड बना दिया है।

खेती तबाह, मवेशी दफन और नदियों में दम तोड़ता जलीय जीवन

तमोरी, दोड़ीतुमनार, गमपुर, पेद्दापाल समेत दक्षिण बस्तर, बीजापुर और दंतेवाड़ा सीमा क्षेत्र के करीब 45 से 50 गांवों का अस्तित्व आज इस लाल कीचड़ की भेंट चढ़ चुका है। खदानों से बहकर आने वाले लोहे के बारीक कणों और मलबे ने हजारों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि को पथरीले और बंजर मैदान में बदल दिया है, जहां अब फसल का एक तिनका तक नहीं पनपता। फलदार पेड़ और घने जंगल धीरे-धीरे सूखकर ठूंठ बन रहे हैं, जबकि नदियों का पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह तबाह हो चुका है और मछलियों का नामोनिशान मिट गया है। नाले के किनारों पर बिछे इस खतरनाक लाल दलदल में चरने जाने वाले मवेशी धंसकर तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे हैं, जिससे किसानों की आजीविका की रीढ़ ही टूट गई है।

जहरीला पानी पीने को मजबूर ग्रामीण, स्वास्थ्य व्यवस्था के नाम पर शून्य

शुद्ध पेयजल का कोई वैकल्पिक साधन न होने के कारण ग्रामीण उसी नाले के किनारे गड्ढा खोदकर जहरीला, प्रदूषित और लाल पानी पीने को मजबूर हैं। नतीजतन, पूरे इलाके में पेट की गंभीर बीमारियां, त्वचा रोग और अन्य अज्ञात संक्रमण महामारी की तरह फैल रहे हैं। सात दशकों से अरबों-खरबों का लोहा निकालने वाली कंपनी और शासन ने इन गांवों में बुनियादी मानवीय सुविधाएं तक मुहैया नहीं कराईं। न तो यहां पीने के लिए स्वच्छ पानी के हैंडपंप हैं, न पक्की सड़कें और न ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र। बीमारी की हालत में खाट पर लादकर ले जाने वाले मरीजों और प्रसव पीड़ा से जूझती गर्भवती महिलाओं को जब अस्पताल पहुंचाया जाता है, तो दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले के प्रशासनिक सीमा विवाद के नाम पर उन्हें बिना इलाज के लौटा दिया जाता है।

70 सालों का अंधाधुंध दोहन और मूल निवासियों की झोली में सिर्फ उपेक्षा

बैलाडीला से निकलने वाले उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क से देश-विदेश में विकास की नई इमारतें गढ़ी जा रही हैं, लेकिन जिस जमीन से यह दौलत निकाली जा रही है, वहां के मूल आदिवासी चपरासी तक की नौकरी, उचित मुआवजे और सुरक्षित जीवन के लिए तरस रहे हैं। सरकारें बदलीं, व्यवस्थाएं बदलीं, लेकिन पहाड़ के उस पार बसे इन आदिवासियों की नियति नहीं बदली। ग्रामीणों का तीखा आक्रोश अब बगावत की शक्ल ले रहा है, क्योंकि वे साफ देख रहे हैं कि 'कॉर्पोरेट विकास' की आड़ में उनके पूरे समाज और संस्कृति को ही धीरे-धीरे समाप्त किया जा रहा है। शासन-प्रशासन और NMDC की यह आपराधिक चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि बस्तर का जीवन आज सिर्फ सत्ता और कंपनियों के बहीखातों में मुनाफा बटोरने का एक साधन बनकर रह गया है।