रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- औद्योगिक नगरी रायगढ़ की सड़कें अब सफर के लिए नहीं, बल्कि यमराज के घर जाने का सीधा रास्ता बन चुकी हैं। जिले का शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो जब किसी घर का चिराग सड़क हादसे में न बुझता हो। रफ्तार और लापरवाही के इस खूनी खेल ने जिले की सड़कों को लाल कर दिया है। शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक चारों तरफ बिछा मौत का यह जाल केवल एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, लचर व्यवस्था और बेलगाम वाहन चालकों की सनक का नतीजा है। आए दिन हो रही दुर्घटनाओं से आम जनता में दहशत और भारी आक्रोश का माहौल है।

खूनी गड्ढों में हिचकोले खाती जिंदगी, विभागों की आंखें बंद

जिले की बदहाल सड़कें हादसों का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी हैं। नेशनल हाईवे से लेकर मुख्य जिला मार्गों तक की हालत ऐसी है कि यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों के बीच थोड़ी बहुत सड़क बची है। पीडब्ल्यूडी और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के दावों की धज्जियां उड़ाते ये जानलेवा गड्ढे भारी वाहनों के दबाव से और गहरे होते जा रहे हैं। दोपहिया वाहन चालक जरा सा चूके नहीं कि सीधे इन गड्ढों में गिरकर अपनी जान गंवा बैठते हैं। धूल के गुबार और बदहाल डामरीकरण के कारण लोगों को सड़क का अंदाजा तक नहीं लग पाता, मगर जिम्मेदार विभाग कागजी फाइलों और लीपापोती में मस्त हैं।

शराब के नशे में स्टीयरिंग पर यमदूत, कानून की धज्जियां

जिले में सड़क हादसों की दूसरी सबसे खौफनाक वजह शराब पीकर गाड़ी चलाना है। शाम ढलते ही ढाबों और अवैध शराब अड्डों से निकले चालक सड़कों पर यमदूत बनकर फर्राटा भरने लगते हैं। नशे में धुत भारी वाहन चालकों को न तो ट्रैफिक नियमों की परवाह होती है और न ही किसी इंसान की जान की। भारी वाहनों के साथ-साथ दोपहिया और चारपहिया वाहन चलाने वाले युवा भी नशे की गिरफ्त में आकर जानलेवा रफ्तार का शिकार हो रहे हैं। पुलिस और यातायात विभाग की खानापूर्ति वाली जांच केवल हेलमेट और चालान तक सिमट कर रह गई है, जबकि ब्रेथ एनालाइजर से सख्त जांच के अभाव में नशेड़ी चालक सरेआम लोगों की जान ले रहे हैं।

अंधा कर देने वाली ‘अपर लाइट’ का कहर, सामने नजर आ रही सिर्फ मौत

इन सब के बीच जिले में रात के समय सड़क हादसों की सबसे घातक और अनदेखी वजह 'हाई बीम' यानी अपर लाइट का बेतहाशा इस्तेमाल बनकर सामने आई है। रात के वक्त सामने से आ रहे वाहनों द्वारा लगातार तेज और चमकीली अपर लाइट जलाने से दूसरी तरफ के चालक की आंखें कुछ पलों के लिए पूरी तरह अंधी हो जाती हैं। मात्र दो से तीन सेकंड का यह अंधापन किसी की जिंदगी खत्म करने के लिए काफी साबित हो रहा है। तेज रोशनी के चलते चालकों को न तो सामने का गड्ढा दिखता है और न ही सड़क किनारे चल रहा कोई पैदल या दोपहिया सवार। स्थिति यह है कि शहर के अंदर भी लोग 'डिपर' का इस्तेमाल करना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। अपर लाइट का यह अनियंत्रित इस्तेमाल रात के समय होने वाले 60 फीसदी से अधिक हादसों का मूक कारण बन चुका है।

सिर्फ लाशें गिनने तक सीमित रह गया सिस्टम, अब ठोस कार्रवाई की दरकार

रायगढ़ जिले की सड़कों पर हर दिन उजड़ते परिवारों का दर्द बयां करने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं। प्रशासन सिर्फ बैठकों और सड़क सुरक्षा सप्ताह के नाम पर औपचारिकता निभाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। यदि समय रहते बदहाल सड़कों की तत्काल मरम्मत नहीं कराई गई, शराब पीकर वाहन चलाने वालों पर गैर-जमानती धाराओं के तहत कार्रवाई नहीं हुई और रात में हाई बीम लाइट का दुरुपयोग करने वालों पर नकेल नहीं कसी गई, तो रायगढ़ की ये सड़कें रोज यूं ही मासूमों का खून पीती रहेंगी। जनता अब आश्वासन नहीं, धरातल पर ठोस कार्रवाई और सुरक्षित सड़क चाहती है।