नई दिल्ली@TAKKAR न्यूज :- देश में एक तरफ 'विकसित भारत', स्टार्टअप बूम और तेज आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ जमीनी आंकड़े भारत के युवाओं के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट, मंत्रालयों के दस्तावेज और रोजगार बाजार के आंकड़े मिलकर एक ऐसा आईना पेश करते हैं जहाँ शिक्षा, स्किलिंग और नौकरी—तीनों मोर्चों पर एक बड़ा असंतुलन नजर आता है। भारत की सबसे बड़ी ताकत कही जाने वाली 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' यानी युवा आबादी आज एक अभूतपूर्व चौराहे पर खड़ी है।

नीति आयोग का 'NEET' खुलासा: मुख्यधारा से बाहर करोड़ों युवा

नीति आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में देश के युवाओं की एक ऐसी श्रेणी को चिह्नित किया है जिसे नीति निर्माण की भाषा में NEET यानी Not in Education, Employment, or Training कहा जाता है। यह उन युवाओं का वर्ग है जो न तो किसी स्कूल या कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं, न कोई तकनीकी या वोकेशनल ट्रेनिंग ले रहे हैं और न ही किसी प्रकार के रोजगार से जुड़े हैं।

आंकड़ों के अनुसार, 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में करीब 8.7 करोड़ (पौन नौ करोड़) युवा इस निष्क्रिय श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा करीब 2 करोड़ ऐसे युवा हैं जो सक्रिय रूप से बाजार में काम तलाश रहे हैं लेकिन उन्हें काम नहीं मिल पा रहा है। इन दोनों आंकड़ों को जोड़ दिया जाए तो 10 करोड़ से अधिक युवा देश की मुख्य आर्थिक और शैक्षणिक धारा से पूरी तरह कटे हुए हैं। इतनी बड़ी संख्या में ऊर्जावान कार्यबल का बेकार बैठे रहना न केवल एक सामाजिक संकट है, बल्कि यह आर्थिक विकास की गति को भी कुंद कर रहा है।

डिग्री बनाम योग्यता का संकट: कॉलेजों से निकलती बेरोजगारों की फौज

भारत में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार तो हुआ है, लेकिन उस शिक्षा की बाजार में क्या उपयोगिता है, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। आर्थिक सर्वेक्षण और संबंधित रिपोर्टों के मुताबिक, देश में ग्रेजुएशन पूरा करने वाले युवाओं में से मात्र 8.25 प्रतिशत को ही उनकी डिग्री और योग्यता के अनुसार काम मिल पाता है।

उच्च शिक्षा में जाने वाले करीब 3.4 करोड़ छात्रों में से 1.3 करोड़ छात्र अकेले बीए (कला संकाय) की डिग्री ले रहे हैं। इन छात्रों के पास डिग्री तो होती है, लेकिन व्यावहारिक कौशल और बाजार की मांग के अनुरूप तैयारी का अभाव होता है। नतीजतन, लाखों युवा वर्षों तक सरकारी भर्तियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की अंधी दौड़ में फंसे रहते हैं, जहाँ पदों की संख्या मुट्ठी भर होती है और आवेदकों की संख्या करोड़ों में।

10 साल का स्किलिंग मॉडल: बड़े वादे, सीमित परिणाम

साल 2014-15 के दौरान जब केंद्र सरकार ने स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसे महत्वाकांक्षी अभियानों की घोषणा की थी, तब 2022 तक 40 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि पिछले 10 से 12 वर्षों का लेखा-जोखा बताता है कि परिणाम लक्ष्यों के अनुपात में काफी पीछे रह गए।

तमाम मंत्रालयों के अंतर्गत चलने वाले कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिए 2014 से अब तक कुल 7 करोड़ 67 लाख लोगों को ही ट्रेनिंग दी जा सकी। इनमें प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के तहत महज 1.64 करोड़ लोग ही कवर हो पाए। कपड़ा मंत्रालय की 'समर्थ' योजना का उदाहरण देखें तो 2017 से अब तक 1000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करके लगभग 6.17 लाख लोगों को प्रशिक्षित किया गया, जिनमें से 5.17 लाख को काम मिलने का दावा किया गया। यानी पूरे देश के सबसे बड़े रोजगार प्रदाता सेक्टरों में से एक में हर महीने औसतन सिर्फ 10 हजार लोगों को ही रोजगार मिल सका। अब सरकार ने समर्थ 2.0 के तहत अगले 5 वर्षों के लिए ₹2,800 करोड़ का बजट रखकर 15 लाख लोगों को 'इंडस्ट्री रेडी' करने का नया खाका खींचा है, जिस पर पुराने अनुभवों को देखते हुए सवाल उठ रहे हैं।

सरकारी रिक्तियों की हकीकत और संविदा संस्कृति

एक तरफ निजी क्षेत्र में नौकरियां सीमित हैं, तो दूसरी तरफ सरकारी महकमों में स्थाई भर्तियों की गति भी सवालों के घेरे में है। संसद और आधिकारिक रिपोर्टों में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार के विभागों में खाली पदों की संख्या 2015 के 4.20 लाख (11.5%) से बढ़कर 2024 तक 8.24 लाख (21%) तक पहुंच गई है।

रेलवे जैसे विशाल तंत्र में, जहाँ 2015 में रिक्तियों की स्थिति नगण्य मानी जाती थी, वहाँ आज 2.40 लाख से अधिक पद खाली पड़े हैं। इसके साथ ही सरकारी उपक्रमों और सार्वजनिक क्षेत्रों में नियमित भर्तियों के स्थान पर ठेकेदारी और संविदा प्रथा में भारी इजाफा हुआ है। पीएसयू में ठेका कर्मचारियों की हिस्सेदारी 2015 के 18.6% से बढ़कर लगभग 49% के करीब पहुंच चुकी है। पद खाली रहने और नियमित नौकरियों के संविदा में बदलने से उन युवाओं में गहरा असंतोष है जो वर्षों से इन परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।

भर्ती परीक्षाओं का 'अर्थशास्त्र' और परिवारों पर बोझ

देश की पांच सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं—एसएससी, यूपीएससी, आरआरबी, जेईई और नीट—में हर साल करोड़ों युवा शामिल होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, कोचिंग फीस, आवेदन शुल्क, किराए और परीक्षा यात्राओं के रूप में Gen-Z युवाओं के परिवारों की जेब से करीब ₹3.5 लाख करोड़ खर्च हो जाते हैं। यह राशि कई प्रमुख सरकारी मंत्रालयों के संयुक्त बजट से भी अधिक बैठती है। इतनी भारी रकम और युवाओं के बहुमूल्य वर्षों के निवेश के बावजूद अंतिम रूप से चयन की दर दशमलव के अंकों में सिमटी रहती है, जिससे छात्रों में मानसिक दबाव और हताशा बढ़ रही है।

स्टार्टअप्स का यथार्थ और एआई (AI) का नया खतरा

स्टार्टअप और तकनीकी क्षेत्र को नए रोजगार का सबसे बड़ा केंद्र माना जा रहा था, लेकिन इसके आंतरिक आंकड़े भी मिश्रित तस्वीर पेश कर रहे हैं। संसद में वाणिज्य राज्य मंत्री के जवाब के मुताबिक, सरकार से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में से करीब 6,789 स्टार्टअप्स बंद हो चुके हैं।

इसके साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन के तेजी से बढ़ते प्रसार ने आईटी सेक्टर की पारंपरिक रोजगार व्यवस्था पर सीधा असर डाला है। ICRIER के एक सर्वे के अनुसार, देश की 55% आईटी कंपनियों ने स्वीकार किया है कि जनरेटिव एआई के चलते एंट्री-लेवल यानी फ्रेशर्स की भर्तियों में भारी गिरावट आई है। नीति आयोग का भी अनुमान है कि 2031 तक टेक सर्विसेज सेक्टर में काम करने वाले कार्यबल में एक-चौथाई तक की कमी आ सकती है और संगठित क्षेत्र की 60% नौकरियों पर ऑटोमेशन का गहरा असर देखने को मिलेगा।

गिग इकॉनमी की मजबूरी और कोर सेक्टर में मंदी

अच्छी तनख्वाह और सुरक्षित नौकरियों के अभाव में देश के करीब 1.25 करोड़ युवा आज गिग इकॉनमी में डिलीवरी बॉय या राइडर के रूप में काम करने को मजबूर हैं। हालांकि यह क्षेत्र तात्कालिक आजीविका तो देता है, लेकिन इसमें न तो कोई सामाजिक सुरक्षा है, न पेंशन और न ही दीर्घकालिक करियर का कोई भविष्य। वहीं दूसरी ओर, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की जीडीपी में हिस्सेदारी बीते एक दशक में 15% के आसपास ही स्थिर बनी हुई है, जिससे बड़े पैमाने पर स्थायी नौकरियों का सृजन नहीं हो पा रहा है।

देश में रोजगार की यह समग्र स्थिति यह स्पष्ट करती है कि समस्या केवल ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू करने या नए नारे गढ़ने से हल नहीं होगी। युवाओं को वास्तविक रोजगार से जोड़ने के लिए जमीनी स्तर पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाने, सरकारी विभागों में खाली पड़े पदों को पारदर्शी तरीके से भरने और शिक्षा प्रणाली को बाजार की वास्तविक जरूरतों के साथ जोड़ने की सख्त दरकार है।