नई दिल्ली@TAKKAR न्यूज :- देश की राजधानी नई दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर इन दिनों भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे बड़े छात्र, युवा और नागरिक आक्रोश का केंद्र बन चुका है। लद्दाख की पर्यावरण और शिक्षा की बुलंद आवाज, प्रख्यात शिक्षा सुधारक एवं पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके के नेतृत्व में चल रहा यह आंदोलन अब महज एक धरना-प्रदर्शन नहीं रह गया है, बल्कि यह देश के भ्रष्ट परीक्षा तंत्र, प्रशासनिक निरंकुशता और करोड़ों युवाओं के भविष्य के साथ घृणित खिलваड़ करने वाली इस बहरी और अंधी केंद्र सरकार के खिलाफ एक निर्णायक और आर-पार की जंग का रूप ले चुका है। पिछले 21 दिनों से लगातार सुलग रही इस आग ने सत्ता के सिंहासन पर बैठी नरेंद्र मोदी सरकार की चूलें हिला दी हैं और आज, 20 जुलाई के दिन घोषित 'संसद मार्च' और देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों ने प्रशासनिक अमले में भारी खलबली मचा दी है। दिल्ली से लेकर देश के कोने-कोने तक छात्र, युवा, किसान और सामाजिक कार्यकर्ता इस महा-आंदोलन में शामिल होकर यह खुली चुनौती दे रहे हैं कि अब शिक्षा, रोजगार और युवाओं के भविष्य का सौदा करने वाली इस तानाशाही हुकूमत को बख्शा नहीं जाएगा।
इस देशव्यापी आक्रोश की सुई हालिया महीनों में देश की सबसे संवेदनशील प्रतियोगी परीक्षाओं में सामने आए घोर घोटालों, धांधलियों और पेपर लीक की उन शर्मनाक घटनाओं पर टिकी हुई है, जिन्होंने इस सरकार के 'सबका साथ, सबका विकास' के झूठे दावों की पोल खोलकर रख दी है। सबसे पहले देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी यानी NEET-UG में कथित प्रश्नपत्र लीक होने और उसके बाद केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई की मूल्यांकन प्रक्रिया और पुनर्मूल्यांकन में बड़े पैमाने पर सामने आई धांधलियों ने देश के लाखों मेधावी और गरीब घरों के छात्रों के सपनों को बेरहमी से चकनाचूर कर दिया है। वर्षों तक अपने घरों से दूर, भूखे-प्यासे रहकर दिन-रात एक करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा जब परीक्षा हॉल में पहुंचते हैं और वहां से पेपर लीक होने की खबरें सामने आती हैं, तो उनके भीतर का गुस्सा किस हद तक उबलता है, इसका जीवंत और विस्फोटक उदाहरण आज जंतर-मंतर की सड़कों पर दिखाई दे रहा है। इस प्रशासनिक लापरवाही और शासन की घोर असंवेदनशीलता के खिलाफ युवा एक्टिविस्ट अभिजीत दिपके द्वारा गठित 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने जून की शुरुआत में दिल्ली की सड़कों पर सुगबुगाहट तेज की। शुरुआत में सोशल मीडिया और छोटे सत्रों के रूप में शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन 20 जून को जंतर-मंतर पर एक विशाल और अनियंत्रित जन-आंदोलन में पूरी तरह तब्दील हो गया। इसके बाद जब इस आंदोलन से देश के जाने-माने गांधीवादी पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक जुड़े, तो इस संघर्ष को एक अभूतपूर्व राष्ट्रीय और वैचारिक आधार मिल गया। वांगचुक ने जंतर-मंतर पर कदम रखते ही अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल यानी आमरण अनशन का ऐलान कर दिया, जिसके बाद देश के हर हिस्से से युवा इस मुहिम से जुड़ते चले गए और यह आंदोलन एक राष्ट्रव्यापी जनक्रांति में बदल गया।
यह पूरा जनसैलाब सीधे तौर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और वर्तमान केंद्र सरकार की भ्रष्ट नीतियों के खिलाफ है। आंदोलनकारियों और सीजेपी के मंच से सरकार के समक्ष अत्यंत सख्त और दो टूक मांगें रखी गई हैं। इस आंदोलन का सबसे पहला और कड़ा प्रहार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर है। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि देश में लगातार हो रहे पेपर लीक, परीक्षा माफियाओं के फलने-फूलने और युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलваड़ की पूरी और सीधी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए धर्मेंद्र प्रधान को तुरंत अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए, क्योंकि यह सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने में पूरी तरह विफल साबित हुई है। इसके साथ ही उनकी दूसरी बड़ी मांग परीक्षा तंत्र में आमूल-चूल और कठोर सुधार लाने की है। नीट और अन्य राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की साख को पूरी तरह बहाल किया जाए, परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं में बैठे भ्रष्ट तंत्र, दलालों और पेपर लीक कराने वाले माफियाओं को बेनकाब किया जाए और दोषियों पर सख्त से सख्त गैर-जमानती कानूनी शिकंजा कसा जाए ताकि भविष्य में कोई भी राजनीतिक शह पाने वाला माफिया युवाओं के जीवन के साथ खेलने का दुस्साहस न कर सके। इसके अलावा, हालिया घोटालों और परीक्षा तनाव के कारण जिन छात्रों ने अवसाद में आकर आत्महत्या जैसे चरम कदम उठाए हैं या जो गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं, उन्हें और उनके पीड़ित परिवारों को पूरा न्याय मिले तथा ऐसी अमानवीय घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए संसद में एक बेहद कड़ा कानून बनाया जाए।
सोनम वांगचुक के लिए सत्ता के दमन और अनशन का यह रास्ता कोई नया नहीं है। इससे पहले वे लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने, भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत क्षेत्र को विशेष संवैधानिक सुरक्षा देने और हिमालयी पर्यावरण को बचाने के लिए कई बड़े और ऐतिहासिक आंदोलन कर चुके हैं। मार्च 2024 का उनका 21 दिवसीय क्लाइमेट फास्ट, सितंबर 2024 की 'दिल्ली चलो' पदयात्रा और सितंबर 2025 का 35 दिवसीय भूख हड़ताल देश के राजनीतिक गलियारों में हमेशा चर्चा का विषय रहे हैं, जिनसे डरकर सरकार ने हर बार उन्हें दबाने की कोशिश की। पिछले लद्दाख आंदोलनों के दौरान उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए जैसी सख्त और दमनकारी पाबंदियां भी लगाई गईं और उन्हें जबरन हिरासत में भी रखा गया था, लेकिन उनकी वैचारिक दृढ़ता कभी नहीं डगमगाई। मार्च 2026 में उन पर लगी पाबंदियां हटने के बाद जैसे ही वे बाहर आए, उन्होंने देश के आम युवाओं के भविष्य को बचाने के लिए इस नए मोर्चे पर अनशन का बीड़ा उठा लिया और आज वे दिल्ली की धरती पर तानाशाही व्यवस्था को सीधी चुनौती दे रहे हैं।
जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के इस ऐतिहासिक आमरण अनशन का शनिवार को 21वां दिन पूरा हो गया। लगातार तीन हफ्तों से अन्न का एक भी दाना ग्रहण न करने और केवल पानी के सहारे जीवित रहने के कारण 59 वर्षीय सोनम वांगचुक का शरीर अत्यधिक क्षीण हो चुका है। मेडिकल बुलेटिन के अनुसार उनका वजन काफी घट चुका है और वे गंभीर शारीरिक कमजोरी व मेटाबॉलिक क्राइसिस से जूझ रहे हैं। बावजूद इसके, अहंकार में डूबी केंद्र सरकार और प्रशासन ने संवेदनशीलता दिखाने के बजाय पूरी तरह दमनकारी और तानाशाही नीतियों का सहारा लिया। शनिवार सुबह दिल्ली पुलिस ने भारी पुलिस बल के साथ जंतर-मंतर पर धावा बोला और आंदोलन स्थल से जबरन सोनम वांगचुक को उठाकर सफदरजंग अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में भर्ती करा दिया। इस दौरान मौके पर मौजूद आक्रोशित छात्रों और पुलिस के बीच तीखी झड़प हुई और माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने सरकार और अस्पताल प्रशासन पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें परिवार से मिलने और मनपसंद निजी चिकित्सा सुविधा चुनने तक से वंचित रखा जा रहा है, और अस्पताल के पूरे फ्लोर को एक पुलिस छावनी में बदल दिया गया है, जो इस बात का खुला सबूत है कि यह सरकार इस लोकतांत्रिक और सच की आवाज से बुरी तरह डर चुकी है।
अस्पताल के बिस्तर पर होने के बावजूद सोनम वांगचुक के तेवर और हौसले बिल्कुल भी ठंडे नहीं पड़े हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि उनका अनशन अस्पताल के अंदर भी पूरी सख्ती के साथ जारी रहेगा। सोशल मीडिया और वीडियो संदेश के जरिए देश के नाम जारी अपने एक अत्यंत ओजस्वी बयान में वांगचुक ने कहा कि उनका शरीर भले ही कमजोर हुआ है, लेकिन उनका संकल्प और देश के युवाओं के प्रति उनका विश्वास और अधिक चट्टानी हो चुका है। उन्होंने कहा कि यह सरकार युवाओं की आवाज को बलपूर्वक और पुलिस के डंडे के जोर पर दबाना चाहती है, लेकिन यह कभी संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि यह डर, अन्याय और तानाशाही के खिलाफ आजादी का दूसरा आंदोलन है। इसके साथ ही उन्होंने देश के हर नागरिक, छात्र और किसान से यह अपील की है कि वे किसी भी कीमत पर पीछे न हटें और आज संसद के मानसून सत्र के पहले दिन आयोजित होने वाले शांतिपूर्ण 'संसद मार्च' को ऐतिहासिक सफलता दिलाएं। वांगचुक की इस दहाड़ के बाद देश भर के छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों के नेताओं ने भी सरकार के खिलाफ चौतरफा मोर्चा खोल दिया है। यहां तक कि देश के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भी केंद्र सरकार को खुली चेतावनी दी है कि वह सोनम वांगचुक के लंबे संयम और देश के युवाओं के धैर्य की और अधिक परीक्षा न ले तथा तत्काल बातचीत का रास्ता अपनाकर इस संकट का समाधान निकाले।
आज का यह दिन इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़ साबित होने जा रहा है। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के साथ ही जंतर-मंतर से संसद की ओर कूच करने के लिए हजारों की संख्या में छात्र, युवा, महिलाएं और देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे नागरिक पूरी तरह लामबंद हो चुके हैं। वे हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर सरकार विरोधी नारे लगा रहे हैं और न्याय की मांग कर रहे हैं। राजधानी ही नहीं, बल्कि आज देश के अलग-अलग राज्यों के विभिन्न जिलों में भी इस आंदोलन की आग पूरी तरह फैल चुकी है। विभिन्न छात्र संगठनों, युवा मोर्चों और सामाजिक संगठनों के आह्वान पर आज देश के कोने-कोने में कलेक्ट्री कार्यालयों के बाहर भारी प्रदर्शन किया जा रहा है और राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के नाम जिला कलेक्टरों को ज्ञापन सौंपकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और परीक्षा सुधारों की मांग की जा रही है।
दूसरी तरफ, दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुरक्षा का हवाला देते हुए साफ कर दिया है कि संसद मार्च के लिए किसी भी प्रकार की अनुमति नहीं दी गई है और नई दिल्ली जिले के संवेदनशील इलाकों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू कर दी गई है। चप्पे-चप्पे पर भारी पुलिस बल, रैपिड एक्शन फोर्स और अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर दी गई है तथा जगह-जगह मजबूत बैरिकेडिंग लगाकर रास्तों को पूरी तरह सील कर दिया गया है। हालांकि, सीजेपी संस्थापक अभिजीत दिपके और अन्य युवा नेताओं ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि प्रशासन की कितनी भी दमनकारी रोक और बैरिकेडिंग क्यों न हो, यह मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी तय मंजिल की ओर आगे बढ़ेगा और युवाओं के अधिकारों की यह गूंज संसद के भीतर तक सुनाई देगी। उधर, सोनम वांगचुक की पत्नी ने यह भी संकेत दिया है कि यदि जिम्मेदार राजनीतिक दल अस्पताल में आकर उन्हें यह आश्वस्त करते हैं कि संसद के इस मौजूदा सत्र में शिक्षा की जवाबदेही, पेपर लीक कानूनों और परीक्षा सुधारों पर गंभीर और सार्थक चर्चा होगी, तो वे अपने अनशन को समाप्त करने पर विचार कर सकते हैं, लेकिन तब तक यह संघर्ष किसी भी कीमत पर रुकने वाला नहीं है।
सोनम वांगचुक का यह 21 दिवसीय महा-अनशन, देश के विभिन्न जिलों में कलेक्टोरैट पर सौंपे जा रहे ज्ञापनों का यह सिलसिला और दिल्ली की सड़कों पर उमड़ा यह अभूतपूर्व जनसैलाब इस बात का अकाट्य और जीवंत प्रमाण है कि देश का युवा अब रोजगार, शिक्षा, पारदर्शिता और अपने अधिकारों के मुद्दों पर इस भ्रष्ट सरकार के सामने खामोश बैठने वाला नहीं है। सरकार चाहे लाख कोशिश कर ले कि पुलिस बल के जोर पर दमन चक्र चलाकर ऐसे आंदोलनों को कुचल दिया जाए, लेकिन जब वैचारिक दृढ़ता, राष्ट्रव्यापी छात्र शक्ति और जन-आक्रोश आमने-सामने आ जाते हैं, तो सत्ता के बड़े-बड़े महलों और अहंकार की दीवारों को भी झुकना ही पड़ता है। आज संसद भवन के ठीक बाहर, देश भर के जिला मुख्यालयों पर और सफदरजंग अस्पताल के बिस्तरों से उठती यह हुंकार आने वाले दिनों में देश की राजनीतिक दिशा और दशा को हमेशा के लिए तय करने के लिए पूरी तरह तैयार है। पूरे देश की निगाहें इस समय इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह बहरी सरकार अपना अहंकार छोड़कर देश के युवाओं की बात सुनेगी और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा व सुधारों को स्वीकार करेगी, या फिर दमन का क्रूर रास्ता चुनकर इस सुलगती हुई आग को और अधिक भड़काएगी। वक्त आ गया है कि हुक्मरान यह अच्छी तरह समझ लें कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का दौर अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है और भारत का जागरूक नागरिक अब बिना न्याय लिए चुप बैठने वाला नहीं है।
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