रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- देश में महंगाई का नया मोर्चा अब रसोई की सबसे बुनियादी और आवश्यक चीज यानी चीनी पर खुल गया है। एक साल के भीतर चीनी के खुदरा मूल्यों में 53 प्रतिशत का अभूतपूर्व और डराने वाला उछाल दर्ज किया गया है। कभी 45 रुपये प्रति किलो बिकने वाली चीनी अब देश के कई हिस्सों, विशेषकर बिहार और ग्रामीण इलाकों में 70 रुपये प्रति किलो के स्तर को छू रही है, वहीं पैकेटबंद और ब्रांडेड चीनी की कीमत 80 रुपये प्रति किलो तक जा पहुंची है। यह कोई सामान्य बाजार जनित महंगाई नहीं है, बल्कि एक ऐसी नीतिगत अदूरदर्शिता का परिणाम नजर आ रही है, जिसने दुनिया के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक देश भारत को एक दशक बाद चीनी आयात करने के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। यह सवाल अब हर आम भारतीय की रसोई और अर्थशास्त्रियों के बीच गूंज रहा है कि क्या देश की जनता के हिस्से की मिठास किसी एकतरफा ऊर्जा नीति की भेंट चढ़ गई है?

एथेनॉल ब्लेंडिंग: जब ईंधन बनने लगा भोजन का हिस्सा

चीनी की इस बेतहाशा और बेलगाम महंगाई के पीछे का सबसे प्रमुख कारण सरकार की ई-20 (E20) नीति को माना जा रहा है। इस नीति के तहत पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम की जा सके। समस्या यह है कि एथेनॉल के उत्पादन के लिए मुख्य रूप से गन्ने के रस और शीरे का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, कुल गन्ना उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा यानी करीब 25 से 30 लाख टन चीनी बनाने लायक गन्ना सीधे एथेनॉल फैक्ट्रियों में झोंक दिया गया है। जब चीनी बनाने वाला कच्चा माल ही पेट्रोल की टंकियों में जलाया जाने लगेगा, तो घरेलू बाजार में चीनी की किल्लत होना और दाम बढ़ना लाजमी है। एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की इस सरकारी जिद ने चीनी की घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसका सीधा खमियाजा आम उपभोक्ता अपनी जेब ढीली करके चुका रहा है। इसके अलावा, चीनी का विकल्प माने जाने वाले गुड़ की कीमतों में भी भारी उछाल दर्ज किया गया है। जो गुड़ कभी 50 रुपये किलो बिकता था, वह अब 65 से 100 रुपये के बीच बिक रहा है। इससे साफ जाहिर होता है कि चीनी की किल्लत ने पूरे मिठास के बाजार का संतुलन बिगाड़ कर रख दिया है।

नीतियों में विरोधाभास और 10 साल बाद आयात की मजबूरी

इस पूरे संकट में नीतिगत स्तर पर भारी भ्रम और सरकारी विफलता साफ दिखाई देती है। एक तरफ जहां चीनी मिलें अपने मासिक घरेलू बिक्री कोटे को पूरा करने में संघर्ष कर रही थीं, वहीं दूसरी तरफ सरकार निर्यात की अनुमति बांटने में व्यस्त थी। नवंबर 2025 में सरकार ने 20 लाख टन चीनी निर्यात करने की अनुमति दी। यहां तक कि फरवरी 2026 में जब गन्ने की पेराई का सीजन चल ही रहा था और अल-नीनो (El Nino) के कारण मानसून कमजोर होने से उत्पादन में कमी के संकेत बिलकुल स्पष्ट थे, तब भी अतिरिक्त 5 लाख टन निर्यात की मंजूरी दे दी गई। उद्योग जगत के विशेषज्ञों के अनुसार, सिस्टम को पूरी तरह से गुमराह किया गया कि देश में चीनी के बुनियादी तत्व मजबूत हैं। जब अगस्त के महीने में खुदरा बाजार में चीनी की कीमतें हाहाकार मचाने लगीं और मंडियों में थोक भाव एक झटके में 400 से 525 रुपये प्रति क्विंटल तक उछल गए, तब सरकार की नींद टूटी। नतीजा यह हुआ कि आनन-फानन में निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी गई और अब देश को बाजार में आपूर्ति सामान्य करने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी बिना किसी आयात शुल्क के विदेश से मंगानी पड़ रही है। पिछले दस सालों में यह पहली बार है जब भारत चीनी का आयात करेगा, जो सीधे तौर पर सरकार की खाद्य प्रबंधन नीति पर सवालिया निशान लगाता है।

महंगाई का 'चेन रिएक्शन': दूध, अंडे और पशु आहार की कीमतों में आग

एथेनॉल नीति की मार सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं रही है। इस नीति ने पूरे खाद्य बाजार में महंगाई का एक ऐसा भयावह 'चेन रिएक्शन' शुरू कर दिया है, जिसकी चपेट में आम आदमी का पूरा निवाला आ गया है। एथेनॉल बनाने के लिए केवल गन्ने का ही नहीं, बल्कि मक्का, चावल की टुकड़ी और खराब अनाज का भी बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। कुल एथेनॉल उत्पादन में मक्के की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत और चावल की 16 प्रतिशत तक हो गई है। इसका सीधा और विनाशकारी असर पशु आहार (पोल्ट्री और कैटल फीड) पर पड़ा है। मुर्गियों और पशुओं का चारा रातों-रात 10 से 11 प्रतिशत तक महंगा हो गया है। अर्थशास्त्र का सीधा नियम है कि जब पशु आहार महंगा होगा, तो स्वाभाविक रूप से दूध और अंडे के उत्पादन की लागत भी बढ़ेगी। यही कारण है कि दूध और अंडे की कीमतों में भी 5 से 10 प्रतिशत तक का उछाल आ चुका है। यानी जिस नीति को देश की अर्थव्यवस्था के लिए मास्टरस्ट्रोक बताया जा रहा था, वह दरअसल आम आदमी की रसोई के बजट को पूरी तरह से खोखला कर रही है।

विदेशी मुद्रा की बचत बनाम जनता का प्रत्यक्ष और भारी नुकसान

सरकार की ओर से बार-बार यह आंकड़ा बड़े गर्व से पेश किया जाता है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण 2014-15 से लेकर अब तक लगभग 1.97 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की भारी बचत हुई है। सुनने में यह आंकड़ा बेहद प्रभावशाली लगता है, लेकिन जब मुख्य आर्थिक सलाहकारों के नजरिए से इसे 12 सालों की लंबी अवधि और कच्चे तेल के 11-12 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम सालाना आयात बिल के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है, तो यह बचत मात्र 3 से 4 प्रतिशत की मामूली राहत प्रतीत होती है। दूसरी ओर, इस ई-20 नीति का एक और स्याह पहलू है जो सीधे तौर पर मध्यम वर्ग को आर्थिक चोट पहुंचा रहा है। देश की सड़कों पर दौड़ रहे लगभग 8 करोड़ पुराने दोपहिया वाहन ई-10 ईंधन (यानी 10% एथेनॉल वाले पेट्रोल) पर चलने के लिए बनाए गए थे। जब इन वाहनों में जबरन ई-20 पेट्रोल डाला जाता है, तो न केवल इनका माइलेज कम हो जाता है, बल्कि इंजन के खराब होने का भी बड़ा जोखिम पैदा हो जाता है। अपने खून-पसीने की कमाई से खरीदे गए वाहनों को बचाने और बेहतर माइलेज पाने की मजबूरी में आम लोग अब सामान्य पेट्रोल छोड़कर 110 से 115 रुपये प्रति लीटर वाला महंगा 'प्रीमियम पेट्रोल' डलवा रहे हैं। यही वजह है कि प्रीमियम पेट्रोल की बिक्री जो कभी मात्र 4 प्रतिशत थी, वह अब उछलकर 14 प्रतिशत के चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है।

निष्कर्ष

वर्तमान में चीनी और खाद्य पदार्थों की जो भीषण महंगाई देश झेल रहा है, वह केवल बाजार के प्राकृतिक उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं है। यह ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर देश की खाद्य सुरक्षा के साथ किए जा रहे एक बड़े और असंतुलित प्रयोग का सीधा नतीजा है। सरकार को अब यह गंभीरता से सोचना ही होगा कि क्या महज कुछ विदेशी मुद्रा बचाने और चुनिंदा उद्योगों को लाभ पहुंचाने के लिए देश की करोड़ों की कामकाजी आबादी को महंगाई की भट्टी में झोंक देना न्यायसंगत है? एथेनॉल ब्लेंडिंग के अंधाधुंध लक्ष्यों की समीक्षा का यह सबसे उपयुक्त समय है। यदि ऊर्जा नीतियों का भार सीधे तौर पर आम आदमी की थाली, उसके निवाले और उसकी जेब पर पड़ने लगे, तो ऐसी नीतियों की सफलता और मंशा दोनों पर सवाल उठना लाजिमी है।