रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- एक इंसान के जीवन का सबसे बड़ा और अंतिम सत्य उसकी मृत्यु है। दुनिया के हर धर्म, समाज और संस्कृति में यह मान्यता है कि इस दुनिया से विदा ले रहे व्यक्ति की अंतिम यात्रा पूरे सम्मान, गरिमा और पवित्रता के साथ निकाली जानी चाहिए। लेकिन क्या हो जब किसी प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी एक मृत देह से उसका यह आखिरी और बुनियादी अधिकार भी छीन ले? क्या हो जब अंतिम सफर पर निकले व्यक्ति को कंधा देने वाले ग्रामीण दलदल में तब्दील हो चुकी सड़क पर फिसलने लगें और मजबूरी में एक शव को ट्रैक्टर-ट्रॉली में लादकर श्मशान घाट तक ले जाना पड़े? यह कोई डरावनी कल्पना नहीं है, बल्कि यह एक 'विकासशील' राज्य के ग्रामीण अंचल की खौफनाक और शर्मनाक जमीनी हकीकत है, जो चमचमाती सड़कों और बुनियादी ढांचे के सरकारी दावों के मुंह पर एक करारा तमाचा जड़ रही है।
सिस्टम की संवेदनहीनता का शिकार हुआ ग्रामीण अंचल
इस हृदयविदारक घटना का गवाह बना है रायगढ़ जिले के जनपद पंचायत पुसौर के अंतर्गत आने वाला ग्राम पंचायत आमापाली का आश्रित ग्राम मौहापाली। इस गांव ने हाल ही में एक ऐसी त्रासदी, बेबसी और लाचारी का सामना किया है, जिसने हर संवेदनशील इंसान के रोंगटे खड़े कर दिए हैं। मौहापाली गांव से श्मशान घाट तक जाने वाला मार्ग कई दशकों से अपनी बदहाली और प्रशासनिक उपेक्षा पर आंसू बहा रहा है। सच्चाई तो यह है कि वहां कोई सड़क है ही नहीं, बल्कि वह केवल एक कच्ची पगडंडी है जो अब गहरे दलदल, गड्ढों और जलभराव में तब्दील हो चुकी है। एक तरफ देश डिजिटल इंडिया और स्मार्ट विलेज की ओर कदम बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ मौहापाली के ग्रामीण आज भी अठारहवीं सदी जैसी अमानवीय परिस्थितियों में जीने और मरने को मजबूर हैं। यह पूरा परिदृश्य सिस्टम की उस संवेदनहीनता को उजागर करता है, जहां फाइलों में तो करोड़ों के बजट पास हो जाते हैं, लेकिन जमीन पर एक अंतिम यात्रा के लिए दो गज साफ रास्ता तक नसीब नहीं होता।
मौत के बाद भी नसीब नहीं हुआ चार लोगों का ससम्मान कंधा
हाल ही में इस गांव में एक दुखद घटना घटी, जब एक स्थानीय ग्रामीण का निधन हो गया। शोकाकुल परिवार और गांव वाले जब हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शव को बांस की टिकटी पर बांधकर और कंधों पर उठाकर अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट की ओर निकले, तो उनके सामने एक ऐसा अभिशाप खड़ा था जिसे देखकर पत्थर दिल इंसान भी रो पड़े। श्मशान की ओर जाने वाला रास्ता इतना जर्जर और कीचड़ से सना हुआ था कि उस पर चार कदम पैदल चलना भी मौत को दावत देने जैसा था। कंधों पर एक मृत देह का भारी बोझ और पैरों के नीचे फिसलता हुआ एक-एक फीट गहरा कीचड़। ग्रामीणों ने अपने साथी को सम्मान देने के लिए किसी तरह कुछ दूरी तक शव को अपने कंधों पर ले जाने की हिम्मत जुटाई, लेकिन जब आगे बढ़ना पूरी तरह से असंभव हो गया और गिरने का खतरा पैदा हो गया, तो भरे मन और नम आंखों के साथ उन्हें एक ऐसा फैसला लेना पड़ा जो किसी भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक से कम नहीं है। हार-थक कर ग्रामीणों को एक ट्रैक्टर-ट्रॉली बुलानी पड़ी और उस मृत देह को ट्रैक्टर में रखकर श्मशान घाट तक पहुँचाया गया। एक मृत व्यक्ति की इससे बड़ी दुर्दशा और क्या हो सकती है कि उसे इंसान का कंधा तक नसीब न हो?
बारिश का मौसम और मौहापाली गांव की अंतहीन त्रासदी
बरसात के इस मौसम ने ग्राम मौहापाली की इस पहले से मौजूद समस्या को और भी विकराल और जानलेवा बना दिया है। बारिश की चंद बूंदें ही इस तथाकथित सड़क को एक खतरनाक कीचड़ के समंदर में बदल देती हैं। आम दिनों में तो यहां से गुजरना मुश्किल होता ही है, लेकिन मानसून के चार-पांच महीने इस गांव के लोगों के लिए किसी नरक से कम नहीं होते। जरा सोचिए उस बेबस परिवार पर क्या गुजरती होगी, जिसने अभी-अभी अपना कोई प्रियजन खोया है और उसे अपने दुख से ज्यादा इस बात की चिंता सता रही हो कि अब इस दलदल को पार करके शव को श्मशान तक कैसे ले जाया जाएगा? बारिश के दौरान श्मशान तक लकड़ियां, कंडे और अन्य अंतिम संस्कार की सामग्री पहुँचाना भी एक असंभव कार्य बन जाता है। कई बार ऐसी नौबत आ जाती है कि लोगों को भारी बारिश के बीच शव यात्रा रोककर पहले रास्ते का कीचड़ साफ करना पड़ता है या फिर घंटों तक बारिश रुकने का इंतजार करना पड़ता है। यह प्रकृति की मार से ज्यादा एक इंसान द्वारा बनाई गई व्यवस्था की क्रूरता है।
जनप्रतिनिधियों के खोखले वादे और प्रशासन की गहरी नींद
सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल यह है कि आखिर इस अमानवीय स्थिति का जिम्मेदार कौन है? ग्रामीणों का साफ और कड़ा कहना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि प्रशासन या स्थानीय जनप्रतिनिधियों को इस गंभीर समस्या की जानकारी नहीं है। ग्राम पंचायत के सरपंच से लेकर जनपद पंचायत के अधिकारियों और जिला स्तर के आला अफसरों तक, हर दरवाजे पर गुहार लगाई जा चुकी है। चुनावों के समय जब सफेदपोश नेता वोट मांगने इस गांव की चौखट पर हाथ जोड़कर आते हैं, तो इस सड़क को रातों-रात बनाने के बड़े-बड़े और चिकने-चुपड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं, ये वादे फाइलों की मोटी धूल के नीचे कहीं दफन हो जाते हैं। आखिर क्या वजह है कि सालों से यह सड़क अपनी मरम्मत की बाट जोह रही है? क्या मौहापाली के ग्रामीणों का यह अधिकार नहीं है कि उन्हें कम से कम एक ऐसा रास्ता मिले जहां से वे अपने परिजनों को बिना किसी शारीरिक और मानसिक पीड़ा के ससम्मान अंतिम विदाई दे सकें? स्थानीय नेताओं की यह चुप्पी उनके दोगलेपन को साफ दर्शाती है।
गरिमापूर्ण अंतिम विदाई हर नागरिक का बुनियादी अधिकार
प्रशासनिक अमले की यह घोर उदासीनता केवल एक गांव के रास्ते की समस्या नहीं है, बल्कि यह उस पूरे सिस्टम के खोखलेपन को दर्शाती है जो केवल कागजों पर विकास की गंगा बहाता है। क्या सरकारी फंड की कमी है? या फिर इस गांव के लोग उन वीआईपी राजनेताओं की सूची में नहीं आते, जिनके फार्म हाउस तक रातों-रात चमचमाती डामर की सड़कें बिछा दी जाती हैं? एक आम नागरिक जो जीवन भर सरकार को हर चीज पर टैक्स चुकाता है, क्या उसकी मौत के बाद भी यह लोकतांत्रिक व्यवस्था उसे सिर्फ जलालत और बेइज्जती ही देगी? मौहापाली गांव की इस ट्रैक्टर वाली घटना ने अब एक गहरे जन-आक्रोश का रूप ले लिया है। इस विवशता ने ग्रामीणों के स्वाभिमान को बहुत गहरी ठेस पहुंचाई है। अब यह सिर्फ एक सड़क निर्माण की साधारण मांग नहीं रह गई है, बल्कि यह इंसान की मौत के बाद उसकी गरिमा, उसकी इज्जत और उसके सम्मान को वापस लौटाने की एक आर-पार की लड़ाई बन गई है।
तत्काल समाधान नहीं तो होगा उग्र आंदोलन
यह रिपोर्ट सीधा सवाल पूछती है रायगढ़ के जिला कलेक्टर, जनपद पंचायत पुसौर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ), क्षेत्रीय विधायक और उन तमाम आला अधिकारियों से, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर विकास के बड़े-बड़े मॉडल तैयार करते हैं। क्या उन्हें इस गांव के बहते हुए आंसू और यह दुर्दशा दिखाई नहीं देती? अब समय आ गया है कि इस गंभीर मामले में तत्काल, प्रभावकारी और ठोस कदम उठाए जाएं। जिला प्रशासन को चाहिए कि वह तुरंत ग्राम मौहापाली का दौरा करे और श्मशान घाट तक जाने वाले इस जर्जर रास्ते के नवनिर्माण की प्रक्रिया को युद्ध स्तर पर शुरू करे। यदि अब भी इस ज्वलंत मुद्दे को नजरअंदाज किया गया और केवल कागजी आश्वासन देकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की गई, तो वह दिन दूर नहीं जब यह आक्रोश एक बड़े जन-आंदोलन में तब्दील हो जाएगा। मौहापाली की यह चीख अब प्रशासन को सुननी ही होगी, क्योंकि असली विकास वह नहीं है जो विज्ञापनों में दिखता है, बल्कि असली विकास वह है जहां अंतिम सांस लेने के बाद एक आम आदमी की देह भी बिना किसी ठोकर के सम्मानपूर्वक पंचतत्व में विलीन हो सके।
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