रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- रायगढ़ के आसमान पर अब काले धुएं और जहरीले डस्ट की ऐसी चादर बिछ चुकी है, जिसने हमारी सांसों के साथ-साथ हमारी संवेदनाओं का भी पूरी तरह से गला घोंट दिया है। जब भी शहर में प्रदूषण की बात होती है, हम बड़े ही आराम से सरकार, नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों को कोस कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन जरा ठहरिए और खुद से एक कड़वा सच पूछिए। क्या इस बढ़ते और जानलेवा प्रदूषण की असली समस्या वाकई सिर्फ सिस्टम है? हकीकत तो यह है कि इस महाविनाश की सबसे बड़ी वजह हम और आप हैं—वह आम जनता, जो सब कुछ जानते हुए भी मुर्दों जैसी खामोशी ओढ़े बैठी है।
हमारे और आपके घरों के आस-पास स्थित औद्योगिक इकाइयों और फैक्ट्रियों की चिमनियों से दिन-रात उड़ने वाली वह राख केवल धूल नहीं है। वह एक ऐसा मीठा जहर है जो हमारी आने वाली पीढ़ियों की रगों में उतर रहा है। हम अपनी ही आँखों के सामने अपने बच्चों को अस्थमा, फेफड़ों की बीमारियों और कैंसर जैसी भयानक आग में झोंक रहे हैं, और फिर भी हमारे होंठ सिले हुए हैं। यह कैसा अंधापन है? यह कैसी लाचारी है कि हम अपने ही खून को तिल-तिल कर घुटते और मरते देख रहे हैं और बस एक मूक दर्शक बने हुए हैं। हम उस जहरीले डस्ट को हर रोज नजरअंदाज कर रहे हैं, जो कल हमारे बच्चों के फेफड़ों को पूरी तरह छलनी कर देगी।
इतिहास जब रायगढ़ के इस दमघोंटू दौर को लिखेगा, तो उसमें नेताओं या अधिकारियों की नाकामी से कहीं ज्यादा हमारी बुजदिली का जिक्र होगा। जरा एकांत में बैठकर सोचिए, कल जब हमारी अपनी ही पीढ़ी, हमारे अपने ही बच्चे हमारी आँखों में आँखें डालकर यह सवाल करेंगे कि 'जब हमारे हिस्से की सांसें छीनी जा रही थीं, तब आप चुप क्यों थे?' तब हम उन्हें क्या जवाब देंगे? क्या हम उनसे यह कह पाएंगे कि हमने तुम्हें तुम्हारी मौत के मुंह में जाते देखा और उसे अपनी नियति मान लिया?
वक्त रेत की तरह हमारी मुट्ठी से फिसल रहा है। यह समय किसी और को दोष देने का नहीं, बल्कि अपने गिरेबान में झांकने का है। अगर अब भी रायगढ़ की जनता की यह गहरी नींद नहीं टूटी, अगर आज भी हमने इस जहर के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं की, तो याद रखिएगा कि कल रोने के लिए ना तो यह साफ हवा बचेगी और ना ही वो पीढ़ियां, जिनके लिए हम आज यह कायरता भरी खामोशी ओढ़े बैठे हैं।
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