रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- गौमाता को लेकर मंचों से बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, रैलियां निकाली जाती हैं, लेकिन जब बात ज़मीनी हकीकत की आती है, तो व्यवस्थाएं दम तोड़ती नज़र आती हैं। रायगढ़ शहर से सामने आया एक ताज़ा वीडियो समाज की संवेदनहीनता और सिस्टम की नाकामी की एक दर्दनाक तस्वीर पेश कर रहा है।
रात का अंधेरा, एक 'छोटा हाथी' (लोडिंग वाहन) और उसमें दर्द से तड़पता एक घायल 'नंदी'। इस बेज़ुबान की जान बचाने के लिए कुछ युवा शहर की सड़कों पर भटकते रहे, लेकिन उन्हें जिस मदद की उम्मीद थी, वो आसानी से नहीं मिली।
पहला दरवाज़ा: भगवती गौशाला केंद्र की निराशा
वीडियो के अनुसार, घायल नंदी को लेकर युवा सबसे पहले नीलांचल धर्मशाला के पास स्थित 'भगवती गौशाला केंद्र' पहुंचे। उम्मीद थी कि वहां बेज़ुबान को त्वरित चिकित्सा मिलेगी। लेकिन वहां का जवाब हैरान करने वाला था। प्रबंधन ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उनके पास इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है और रात में कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता। यह जवाब उन तमाम दावों पर एक बड़ा तमाचा है जो गौ रक्षा के नाम पर किए जाते हैं।
डॉ. पटेल की सलाह और चक्रधर गौशाला की ओर रुख
निराश होने के बावजूद इन युवाओं ने हार नहीं मानी। उन्होंने पशु चिकित्सालय के डॉक्टर पटेल से संपर्क किया। डॉक्टर पटेल के निर्देश के बाद, नंदी को लेकर ये युवा रामलीला मैदान स्थित 'चक्रधर गौशाला' पहुंचे। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे युवा लोडिंग वाहन का गेट खोलकर घायल नंदी को सुरक्षित नीचे उतारने और उसके इलाज की जद्दोजहद में लगे हैं।
"कोई साथ नहीं देता..." - एक गौसेवक का छलकता दर्द
इस पूरी घटना में सबसे ज्यादा झकझोरने वाली बात वीडियो बना रहे युवक का दर्द है। कैमरे के पीछे से उसकी आवाज़ समाज को आईना दिखा रही है। वो कहता है, "इस काम में बहुत परेशानी है, कोई साथ नहीं देता। सब खुद ही मेहनत करना पड़ता है... किसी का भरोसा नहीं है। जो आदमी गौमाता के लिए नहीं आ पा रहा है, वो किसके लिए आएगा?"
यह सिर्फ एक युवक की हताशा नहीं है, बल्कि उन गिने-चुने लोगों की पीड़ा है जो बिना किसी स्वार्थ के बेज़ुबानों की सेवा में लगे हैं, लेकिन समाज और प्रशासन उन्हें अकेला छोड़ देता है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं:
यह घटना रायगढ़ प्रशासन और गौशाला संचालकों के सामने कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
गौशालाओं में आपातकालीन चिकित्सा की सुविधा क्यों नहीं है?
गौ रक्षा और संवर्धन के नाम पर आने वाला फंड आखिर कहां खर्च हो रहा है?
क्या बेज़ुबानों की जान बचाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ कुछ युवाओं की है, समाज और सिस्टम की नहीं?
आज भले ही इन युवाओं की मेहनत से उस नंदी को चक्रधर गौशाला में आश्रय मिल गया हो, लेकिन इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि कागज़ी दावों और ज़मीनी हकीकत में ज़मीन-आसमान का फर्क है। ज़रूरत है कि प्रशासन इस घटना का संज्ञान ले और गौशालाओं में 24 घंटे पशु चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करे, ताकि किसी और 'नंदी' को रात के अंधेरे में दर-दर न भटकना पड़े।
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