रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- "एक दिन आयेगा, तुम खट्ट से निकल जाओगे... उस ऊपर वाले को जा के देखो तो सही किस दुनिया में तुम्हे भेजा है। जहाँ पानी है, चिड़िया है, अलग-अलग पक्षी हैं।" जीवन की इस शाश्वत सच्चाई को बयां करते ये शब्द आज रायगढ़ के हालात पर एक क्रूर मजाक की तरह लगते हैं। जिस खूबसूरत दुनिया में हमें भेजा गया था, उसके सीने में तथाकथित विकास के नाम पर एक गहरा और नासूर बन चुका खंजर घोंप दिया गया है। विस्तार की इस अंधी बारिश में भीगता शहर यह नहीं देख पा रहा है कि इस चमक के पीछे कितना घना अंधकार छिपा है। रायगढ़ की आबोहवा में अब चिड़ियों की चहचहाहट नहीं, बल्कि भारी मशीनों की घरघराहट गूंजती है। नलों में जीवन देने वाला जल नहीं, गंदा और जहरीला पानी आ रहा है। सुबह की पहली किरण के साथ यहां के नागरिकों का स्वागत ताजी हवा नहीं, बल्कि प्लांटों की चिमनियों से बरसती मौत की काली राख करती है।
आखिर यह कैसा विकास है जो हमारी सांसों का सौदा कर रहा है? सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि इस विनाशकारी विस्तार के लिए सिर्फ रायगढ़ जिले को ही बलि का बकरा क्यों बनाया जा रहा है? सरकारी और प्रशासनिक आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि कंक्रीट का यह जंगल बसाने के लिए अब तक 10 लाख से अधिक हरे-भरे पेड़ों को बेदर्दी से काटा जा चुका है। खौफनाक सच यह है कि यह विनाशलीला यहीं नहीं रुकने वाली, 10 लाख और पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलने का फरमान लगभग तय है। हरियाली के इस कत्लेआम ने रायगढ़ की छाती को छलनी कर दिया है।
लगातार नए उद्योगों की कतारें लग रही हैं और जो प्लांट पहले से स्थापित हैं, उनकी चिमनियों से निकलता जानलेवा डस्ट यहां की जनता के फेफड़ों में रोज एक धीमे जहर की तरह उतर रहा है। सवाल यह है कि इन प्लांटों की इस बेतहाशा मार को रायगढ़ की जनता आखिर कब तक और कैसे झेल पाएगी?
विस्तार और तरक्की किसी भी समाज के लिए आवश्यक है, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता। लेकिन उस विस्तार के पीछे छिपी मौत और तबाही को लेकर सरकारें आंखें क्यों मूंदे बैठी हैं? सत्ता और प्रशासन आखिर किस मुनाफे की नींद सो रहे हैं? जब हवा में सांस लेना ही एक संघर्ष बन जाए, तो कागजों पर दर्ज विकास दर के आंकड़ों का क्या मोल रह जाता है। क्या कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे के आगे एक आम नागरिक की जिंदगी और पर्यावरण की कोई कीमत नहीं बची?
आज हम भले ही आसमान चूमती चिमनियों को अपनी प्रगति का पैमाना मान लें, लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी हमसे यह हिसाब जरूर मांगेगी। हम उन्हें विरासत में क्या सौंपने जा रहे हैं? एक ऐसा शहर जहां पेड़ देखने के लिए इतिहास की किताबें पलटनी पड़ें? एक ऐसा आसमान जो हमेशा धुएं की काली चादर ओढ़े रहे? वक्त रहते अगर इस विनाशकारी औद्योगिक विस्तार पर लगाम नहीं लगाई गई, तो रायगढ़ एक ऐसा खंडहर बन जाएगा, जहां विकास तो होगा, लेकिन उस विकास को देखने के लिए शायद ही कोई इंसान स्वस्थ बचे।
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