रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- जिन चारदीवारियों के भीतर मासूमों को जिंदगी का पहला पाठ पढ़ना था, वे अब उनके लिए मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का अखाड़ा बनती जा रही हैं। अभिभावक अपने कलेजे के टुकड़े को इस भरोसे के साथ स्कूल बस में चढ़ाते हैं कि वहां उन्हें संस्कार, ज्ञान और महफूज पनाह मिलेगी। मगर कड़वी हकीकत यह है कि आज जिले के कई निजी स्कूलों में तालीम के नाम पर बच्चों के जेहन में खौफ, जलालत और सजा का ऐसा गहरा खौफनाक बीज बोया जा रहा है जो उनकी पूरी शख्सियत को कुचल रहा है। सवाल यह है कि बच्चों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार और शिक्षकों की बेजा सख्ती पर जिले का स्कूल शिक्षा विभाग गहरी नींद में क्यों सोया है? क्या प्रशासन केवल किसी गंभीर हादसे का इंतजार कर रहा है या फिर निजी शिक्षण संस्थानों के रसूख के आगे जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी आंखें मूंद ली हैं?
शिक्षा के मंदिर में 'खौफ का राज': अनुशासन के नाम पर शारीरिक यातनाएं
अनुशासन किसी भी शिक्षण संस्थान की पहली बुनियाद होना चाहिए, लेकिन जब अनुशासन का मुखौटा पहनकर मासूम बच्चों पर क्रूरता बरती जाने लगे, तो उसे तालीम नहीं बल्कि तानाशाही कहा जाएगा। जिले के कई स्कूलों से लगातार यह दर्दनाक तस्वीर उभर रही है कि कुछ मिनट की देरी होने पर नन्हें-मुन्ने बच्चों को घंटों धूप में खड़ा कर दिया जाता है, भरी असेंबली में सबके सामने बेइज्जत किया जाता है या फिर ऐसी शारीरिक सजाएं दी जाती हैं जिससे उनकी सेहत और मनोबल दोनों टूट जाते हैं। सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान कड़कड़ाती धूप में मासूमों को तपाना और गलती पर उठक-बैठक कराना आखिर किस शिक्षा नीति का हिस्सा है? शिक्षक का ओहदा एक मार्गदर्शक का होता है, किसी जल्लाद का नहीं। अगर बच्चा अपने शिक्षक का चेहरा देखकर ही सहम जाए और स्कूल जाने के नाम पर रोने लगे, तो यह उस स्कूल के समूचे माहौल पर सबसे बड़ा कलंक है।
अपात्रों के हाथ में भविष्य की डोर: नियुक्तियों और डिग्रियों पर गहराता संदेह
किसी भी स्कूल का स्तर उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी कक्षाओं में खड़े शिक्षकों की योग्यता और संवेदना से तय होता है। आज निजी स्कूलों के भीतर शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया सवालों के घेरे में खड़ी है। अनुभव और योग्यता की खुलेआम अनदेखी कर भाई-भतीजावाद, कम वेतन में काम चलाने की होड़ और व्यक्तिगत सिफारिशों के दम पर नियुक्तियां की जा रही हैं। जिन शिक्षकों को बच्चों के बाल मनोविज्ञान की रत्ती भर समझ नहीं है, वे कक्षाओं में अपनी निजी कुंठा बच्चों पर निकालते हैं। समर्पित और अनुभवी शिक्षकों को प्रबंधन अपनी मनमर्जी से बाहर का रास्ता दिखा देता है और अनुभवहीन हाथों में मासूमों का भविष्य सौंप दिया जाता है। शिक्षा विभाग ने आज तक कभी यह जहमत नहीं उठाई कि निजी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों की डिग्रियों, उनके पुलिस वेरिफिकेशन और उनके जरूरी शैक्षणिक प्रशिक्षण का धरातल पर सत्यापन करे।
खामोशी की मजबूरी: शिकायत की तो बच्चे का भविष्य दांव पर
स्कूलों में होने वाले इस दुर्व्यवहार की भनक अभिभावकों को होती है, लेकिन अधिकांश माता-पिता जुबान खोलने से थर-थर कांपते हैं। यह खौफ प्रबंधन के उस अघोषित बदले की भावना का नतीजा है, जिसमें शिकायतकर्ता अभिभावक के बच्चे को निशाना बनाया जाता है। अगर किसी माता-पिता ने स्कूल प्रबंधन के रवैये या शिक्षक की डांट-फटकार पर ऐतराज जताया, तो अगले ही दिन से बच्चे को कक्षा में अलग-थलग कर दिया जाता है। आंतरिक मूल्यांकन और परीक्षाओं में जानबूझकर नंबर काटने, बच्चे को बार-बार अपमानित करने और अभिभावकों के फोन कॉल्स तक ब्लॉक कर देने के गंभीर मामले सामने आते रहे हैं। इस दमनकारी माहौल के चलते अभिभावक सब कुछ सहकर भी चुप रहने को विवश हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी एक आवाज उनके बच्चे का करियर हमेशा के लिए बर्बाद कर सकती है।
फीस के नाम पर संगठित लूट: पारदर्शिता के तमाम दावों की खुली हवा
प्रताड़ना का यह खेल सिर्फ कक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि अभिभावकों की जेबों पर भी डाका डाला जा रहा है। निजी स्कूलों ने शिक्षा को एक ऐसा व्यापार बना दिया है जहां हर दिन एक नया फरमान जारी होता है। कभी प्रतियोगी परीक्षाओं के नाम पर, कभी गैर-जरूरी गतिविधियों तो कभी खास आयोजनों के नाम पर अभिभावकों से अनिवार्य तौर पर मोटी रकम वसूली जाती है। नियम कायदों की धज्जियां उड़ाकर यह तय नहीं किया जाता कि कौन सा शुल्क वैकल्पिक है और कौन सा अनिवार्य। अभिभावकों से मनमानी फीस वसूली जाती है और रसीद के नाम पर खानापूर्ति कर दी जाती है। शिक्षा विभाग के अधिकारी सब कुछ जानते-बूझते हुए भी आंखें मूंदे बैठे हैं, मानो निजी स्कूलों को खुली लूट की अनकही छूट दे दी गई हो।
सिर्फ दफ्तरों तक सीमित निरीक्षण: कागजी रिपोर्टों में सब चंगा सी!
स्कूल शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पूरी तरह से औपचारिकता बनकर रह गई है। साल में एकाध बार होने वाले कथित निरीक्षण सिर्फ स्कूल प्रबंधन के साथ चाय-नाश्ते और कागजी खानापूर्ति तक सिमट जाते हैं। इन निरीक्षणों में न तो बच्चों से कोई अकेले में बात करता है, न ही उनके मानसिक स्वास्थ्य की पड़ताल की जाती है। अभिभावकों से सीधे संवाद की तो विभाग ने कभी कोई परिपाटी ही नहीं बनाई। जब तक जांच अधिकारी निजी स्कूलों के कमरों में बैठकर उनकी तैयार की गई मीठी रिपोर्टों पर मुहर लगाते रहेंगे, तब तक जमीनी हकीकत कभी सामने नहीं आ सकती। यह महज निगरानी नहीं, बल्कि बच्चों के मूल अधिकारों के साथ किया जा रहा सबसे बड़ा धोखा है।
अब आर-पार की दरकार: कलेक्टर स्वयं करें अभिभावकों के साथ खुली जनसुनवाई
अब वक्त आ चुका है कि जिला प्रशासन अपनी औपचारिक बैठकों से बाहर निकले और जमीनी स्तर पर दखल दे। रायगढ़ कलेक्टर को सीधे तौर पर इस मामले को अपने संज्ञान में लेते हुए अभिभावकों के साथ एक विशेष और खुली बैठक बुलानी चाहिए। इस जनसुनवाई में शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अफसरों को हाजिर किया जाए और अभिभावकों को बिना किसी डर के अपनी शिकायतें रखने की खुली छूट मिले। इसके साथ ही, एक ऐसी गोपनीय हेल्पलाइन और निगरानी सेल का गठन किया जाए जहां अभिभावक अपनी पहचान उजागर किए बिना उत्पीड़न, अवैध वसूली और अमानवीय व्यवहार की शिकायत दर्ज करा सकें। दोषी पाए जाने वाले स्कूलों पर केवल दिखावटी नोटिस जारी न हों, बल्कि नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों की मान्यता रद्द करने और जिम्मेदार शिक्षकों व प्रबंधकों पर दंडात्मक कानूनी कार्रवाई करने का सख्त संदेश दिया जाए, ताकि शिक्षा के नाम पर बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों की कमर तोड़ी जा सके।
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