रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- औद्योगिक गलियारे में तब्दील हो रहे रायगढ़ के वनांचल क्षेत्र में जब विकास का पहिया घूमता है, तो अक्सर उसके नीचे किसी बेबस किसान की पुश्तैनी मिल्कियत ही कुचली जाती है। धरमजयगढ़ और घरघोड़ा के सीमावर्ती ग्राम चारमार से उभरा यह ताजा मामला केवल जमीन के टुकड़ों की खरीद-फरोख्त का नहीं, बल्कि राजस्व दफ्तरों के अंधेरे कोनों में बुने गए उस शातिर चक्रव्यूह का है, जिसने एक पूरे परिवार को उनकी ही मिट्टी से बेदखल करने की पटकथा लिख डाली। बी.एस. इस्पात कंपनी के प्रस्तावित विस्तार की जमीन तैयार करने के लिए जिस तरह नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं, उसने अब किसानों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। पीड़ित परिवार ने दो-टूक शब्दों में जिला प्रशासन को चेता दिया है कि जब तक उनकी पैतृक धरोहर का एक-एक इंच कानूनी तराजू पर नहीं तौला जाता, तब तक किसी भी उद्योगपति की चौखट यहां नहीं टिकने दी जाएगी।

फाइलों की बाजीगरी में 58 हेक्टेयर जमीन सिमटकर रह गई 57 एकड़

इस पूरे खेल की परतें जब खुलती हैं, तो सीधे तौर पर 1979 के उन ऐतिहासिक दस्तावेजों की ओर इशारा करती हैं जहां कभी न्याय दर्ज था। शिकायतकर्ता सरधाकर गुप्ता के मुताबिक, 1979 के दौर में उनके पिता के संयुक्त पैतृक खाते में 58.543 हेक्टेयर का एक विशाल रकबा दर्ज था, जिसके विधिक हिस्सेदार के रूप में उनके पिता का साफ तौर पर आधा यानी 29.2751 हेक्टेयर हिस्सा बनता था। मगर वक्त के साथ राजस्व रिकॉर्डों में ऐसा तिलिस्मी फेरबदल हुआ कि आज का किसान जब अपनी जमीन नापने निकलता है, तो पूरा रकबा घटकर महज 57 एकड़ के आसपास दम तोड़ता नजर आता है। मूल खसरा नंबर 86, जो अपने आप में लगभग 29 हेक्टेयर का भू-भाग समेटे बैठा था, उसे कागजों पर काटकर 86/1 से 86/42 तक के दर्जनों उप-खसरों में बांट दिया गया। बाकी हिस्सेदारों की सहमति और कानूनी हक को ताक पर रखकर ये टुकड़े संदिग्ध रूप से बी.एस. इस्पात की झोली में डाल दिए गए, जिसकी भनक तक मूल वारिसों को नहीं लगने दी गई।

नायब तहसीलदार के दफ्तर का दोहरा कानून: बंटवारे पर अड़ंगा, रजिस्ट्री पर चुप्पी

राजस्व अमले की संवेदनहीनता और पक्षपातपूर्ण रवैये का आलम देखिए कि जब पीड़ित पक्ष ने अपने हिस्से के विधिवत बंटवारे की अर्जी लगाई, तो नायब तहसीलदार की कलम ने यह फरमान सुना दिया कि खातेदारों की मौत हो चुकी है, इसलिए बंटवारा नहीं हो सकता। यहां सवाल उठता है कि अगर फौती और उत्तराधिकार तय किए बिना बंटवारा मुमकिन नहीं था, तो फिर उन्हीं मृत खातेदारों के नाम वाली जमीनों की रजिस्ट्रियां और नामांतरण उद्योगपतियों के नाम कैसे कर दिए गए? क्या कानून केवल तब जागता है जब किसान अपनी जमीन बचाने की गुहार लगाता है, और जब कोई पूंजीपति जमीन समेटने आता है तो सारे कायदे ताक पर रख दिए जाते हैं? यही वजह है कि पीड़ित पक्ष ने 1979 से लेकर अब तक के हर आदेश, फौती नामांतरण और साल 2012 में रेलवे अधिग्रहण के दौरान बांटे गए मुआवजे के पाई-पाई के हिसाब की उच्चस्तरीय जांच मांग ली है।

'जब तक इंसाफ नहीं, तब तक जनसुनवाई नहीं'—पीड़िता का सीधा अल्टीमेटम

कलेक्ट्रेट की दहलीज पर अपनी व्यथा सुनाते हुए संध्या गुप्ता के तेवर साफ बता रहे थे कि अब बात आर-पार की हो चुकी है। उनका सीधा आरोप है कि कंपनी अपने बाहुबल के सहारे उनकी सहमति के बगैर जमीन पर जेसीबी चला रही है, पेड़ काट रही है और जबरन बाउंड्रीवॉल खड़ी करने की फिराक में है। संध्या गुप्ता ने स्पष्ट कर दिया कि पुश्तैनी जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं, बल्कि पुरखों की पहचान है, जिसे वे किसी भी रसूखदार के हाथों लुटने नहीं देंगी। पीड़ितों ने प्रशासन को आईना दिखाते हुए मांग की है कि 28 सितंबर को होने वाली पर्यावरण जनसुनवाई को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए, क्योंकि जिस जमीन का विधिक मालिकाना हक ही अदालत और जांच के घेरे में हो, वहां जनसुनवाई का नाटक रचना केवल उद्योगपतियों के अवैध कब्जे पर सरकारी मुहर लगाने जैसा होगा।

बुलडोजर की रफ्तार पर अंतरिम रोक की दरकार

विवादित खसरा नंबर 86 और उससे जुड़े तमाम उप-खसरों पर कंपनी द्वारा दिन-रात कराए जा रहे समतलीकरण और निर्माण कार्य को फौरी तौर पर रोकने की दरख्वास्त की गई है। जमीनी हकीकत यह है कि अगर आज इस अंधाधुंध निर्माण पर प्रशासनिक चाबुक नहीं चला, तो कल को जमीन की मूल स्थिति को तलाशना भी नामुमकिन हो जाएगा और किसान सिर्फ अदालतों के चक्कर काटता रह जाएगा। अब देखना यह है कि रायगढ़ कलेक्ट्रेट की चौखट पर पहुंची यह गुहार फाइलों की धूल फांकती है या फिर प्रशासन अपनी रीढ़ दिखाते हुए पूंजी के दबाव को दरकिनार कर इन बेबस किसानों के हक में खड़ा होता है।