रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- धनतेरस और दीपावली के पावन पर्व को लेकर जिले भर के बाजारों में खरीदारों का सैलाब उमड़ने लगा है। मुख्य बाजारों से लेकर गली-मोहल्लों की दुकानों तक ग्राहकों की चहल-पहल जोरों पर है। लेकिन त्योहार की इस खुशी और कारोबारी गहमागहमी के साए में एक संगठित वाहन चोर गिरोह भी पूरी तरह से सक्रिय हो चुका है। रायगढ़ जिले के विभिन्न थानों में दर्ज पुलिसिया आंकड़ों पर गौर करें तो 1 अक्टूबर से लेकर 22 अक्टूबर तक के महज 22 दिनों के अंतराल में ही जिले के अलग-अलग थाना क्षेत्रों से ताबड़तोड़ 14 दोपहिया वाहन चोरी होने की औपचारिक प्राथमिकियां दर्ज की जा चुकी हैं। त्योहारी सीजन के मुहाने पर इतने कम समय में इतनी बड़ी तादाद में दोपहिया वाहनों का गायब होना कानून व्यवस्था, गश्त प्रणाली और पुलिसिया मुस्तैदी की जमीनी हकीकत को बयां करने के लिए काफी है।

शहरी क्षेत्र से लेकर ग्रामीण इलाकों तक फैला चोरों का जाल..

थानावार दर्ज आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट नजर आता है कि वाहन चोरों का दुस्साहस केवल शहर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण और उपनगरीय थानों में भी उनका नेटवर्क बदस्तूर काम कर रहा है। शहर के सबसे व्यस्त, कारोबारी और संवेदनशील कोतवाली थाना क्षेत्र में चोरों का सबसे ज्यादा दबदबा देखने को मिला है, जहां से बीते तीन हफ्तों के भीतर सर्वाधिक 5 मोटरसाइकिलें पार कर दी गईं। दिन-रात लोगों की आवाजाही और भारी ट्रैफिक के बीच से गाड़ियों का यूं गायब होना सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलता है। कोतवाली के अलावा औद्योगिक क्षेत्र पूंजीपथरा थाने में 2 बाइक चोरी के मामले दर्ज किए गए हैं, जहां कामगारों और राहगीरों की गाड़ियों को निशाना बनाया गया। वहीं घनी आबादी वाले उपनगरीय जूटमिल थाना क्षेत्र से भी 2 दोपहिया वाहन चोरी हुए हैं। इसके साथ ही ग्रामीण और दूरदराज के अंचलों में भूपदेवपुर थाना से 1 बाइक, धरमजयगढ़ से 1 बाइक, कोयलांचल क्षेत्र घरघोड़ा से 1 बाइक, प्रमुख व्यापारिक मंडी खरसिया से 1 बाइक और लैलूंगा थाना क्षेत्र से 1 मोटरसाइकिल चोरी की रिपोर्ट आधिकारिक तौर पर दर्ज की गई है। जिले के लगभग हर कोने से वाहनों का गायब होना यह साबित करता है कि चोर गिरोह बेखौफ होकर अपनी योजना को अंजाम दे रहा है।

दर्ज एफआईआर से कहीं बड़ा हो सकता है वास्तविक आंकड़ा..

पुलिस फाइलों में दर्ज 14 एफआईआर तो केवल वही मामले हैं जो थानों की दहलीज तक पहुंच पाए हैं, जबकि धरातल की हकीकत इससे कहीं अधिक गंभीर और चिंताजनक नजर आती है। हमारे समाज में अमूमन यह देखा जाता है कि जब भी किसी आम नागरिक की दोपहिया गाड़ी चोरी होती है, तो वह तुरंत पुलिस थाने जाकर रिपोर्ट लिखाने के बजाय पहले खुद के स्तर पर उसकी तलाश शुरू करता है। लोग अपने परिचितों, रिश्तेदारों, आसपास के इलाकों और संभावित रास्तों पर कई दिनों तक गाड़ी की खोजबीन में जुटे रहते हैं। इसके अलावा कई मामलों में गाड़ियों के जरूरी कागजात अधूरे होने, थानों और कोर्ट-कचहरी के चक्करों से बचने की मानसिकता या फिर वाहन के अत्यधिक पुराना होने के कारण पीड़ित औपचारिक शिकायत दर्ज कराने से कतराते हैं। यदि ऐसे तमाम अघोषित और बिना शिकायत वाले मामलों को भी जोड़ लिया जाए, तो जिले से हर महीने गायब होने वाले वाहनों की वास्तविक संख्या दर्ज आंकड़ों से कहीं अधिक भयावह साबित हो सकती है।

हर महीने दर्जनों गाड़ियों की चोरी, घोर लापरवाही उजागर..

यदि केवल 22 दिनों के भीतर 14 गाड़ियां आधिकारिक रूप से चोरी हो रही हैं, तो यह सीधे तौर पर संकेत देता है कि जिले में हर महीने दर्जनों वाहन गायब हो रहे हैं या यह आंकड़ा इससे भी आगे निकल रहा है। इतनी भारी संख्या में दोपहिया वाहनों की लगातार चोरी कहीं न कहीं सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस प्रशासन की घोर लापरवाही और ढुलमुल कार्यशैली को उजागर करती है। शहर के मुख्य चौराहों पर लगे सीसीटीवी कैमरों के नियंत्रण और रात की गश्त के बड़े-बड़े दावों के बीच से गाड़ियां रातों-रात या दिनदहाड़े गायब हो जाती हैं और पुलिस के हाथ खाली रह जाते हैं। यदि हर महीने इसी रफ्तार से गाड़ियां चोरी होती रहीं, तो आम जनता की गाढ़ी कमाई पर चोरों का डाका इसी तरह पड़ता रहेगा और लोगों का भरोसा पुलिस व्यवस्था से उठने लगेगा।

सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न: आखिर कहां खप रही हैं चोरी की बाइकें?

जिले भर में लगातार हो रही वारदातों के बीच सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी तादाद में चोरी होने वाली गाड़ियां जा कहां रही हैं। स्थानीय स्तर पर यह आशंका जताई जा रही है कि एक सुव्यवस्थित गिरोह चोरी की गाड़ियों के नंबर प्लेट तत्काल बदल देता है और उनके चेचिस व इंजन नंबर से छेड़छाड़ कर उन्हें दूरदराज के ग्रामीण इलाकों या सीमावर्ती दूसरे जिलों में औने-पौने दामों में बेच देता है। इसके अलावा पुरानी गाड़ियों को कबाड़ियों के ठिकाने पर ले जाकर उनके कल-पुर्जे अलग-अलग कर खपाए जाने का संदेह भी बना हुआ है। वहीं दूसरी ओर, स्थानीय स्तर पर दबी जुबानों और कुछ अपुष्ट सूत्रों से यह चर्चा भी निकलकर सामने आ रही है कि चोरी की कुछ गाड़ियों का इस्तेमाल नशीले पदार्थों, विशेष रूप से गांजे की अवैध तस्करी और खेप को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में किया जा रहा है, ताकि चेकिंग या पकड़े जाने की स्थिति में मुख्य तस्करों की पहचान उजागर न हो सके। हालांकि, इन दावों और चर्चाओं की पुष्टि न तो यह अखबार करता है और न ही आधिकारिक तौर पर पुलिस विभाग ने इस संबंध में कोई पुष्टि की है। यह पूरी तरह से एक संवेदनशील जांच का विषय है, जिसकी गहराई से पड़ताल केवल पुलिस प्रशासन ही कर सकता है।

धनतेरस और दीपावली की भारी भीड़ में बढ़ सकता है जोखिम..

आने वाले दिनों में धनतेरस और दीपावली के मौके पर बाजारों में पैर रखने की जगह नहीं होगी। शहर के सराफा बाजार, कपड़ा मार्केट, बर्तन बाजार और इलेक्ट्रॉनिक दुकानों के सामने सैकड़ों गाड़ियां बेतरतीब तरीके से खड़ी होंगी। यदि पुलिस ने अभी से कड़े कदम नहीं उठाए, तो त्योहार की इस आपाधापी का फायदा उठाकर यह चोर गिरोह और भी बड़ी वारदातों को अंजाम दे सकता है। अब वक्त आ चुका है कि पुलिस केवल कागजी खानापूर्ति करने के बजाय बाजार के प्रमुख पार्किंग स्थलों पर सादे लिबास में पुलिसकर्मियों की तैनाती करे, शहर के प्रवेश और निकास द्वारों पर सघन जांच अभियान चलाए और पूर्व में पकड़े गए वाहन चोरों के वर्तमान मूवमेंट को खंगालकर इस संगठित गिरोह की जड़ों पर कड़ा प्रहार करे, ताकि त्योहारों के इस पावन मौके पर आम नागरिकों की मेहनत की कमाई सुरक्षित रह सके।