रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- जिले के पूर्वांचल स्थित वनाच्छादित ऐतिहासिक स्थल कर्मागढ़ में मां मानकेश्वरी देवी की 15 दिवसीय अनूठी शक्ति उपासना और बलपूजा पूरी भव्यता व रोमांच के साथ संपन्न हुई। जहां पूरे देश में चैत्र और आश्विन मास की नवरात्रि नौ दिनों तक मनाई जाती है, वहीं रायगढ़ राजवंश की कुलदेवी मां मानकेश्वरी के दरबार में यह शक्ति पर्व आश्विन प्रतिपदा से आरंभ होकर शरद पूर्णिमा तक पूरे 15 दिनों तक चलता है। करीब 550 वर्षों से निरंतर चली आ रही इस प्राचीन गोंडवाना राज परंपरा में शामिल होने के लिए छत्तीसगढ़ और ओडिशा सीमा के हजारों ग्रामीण जंगलों व घाटियों को पार कर कर्मागढ़ पहुंचे। इस पावन अवसर पर रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य और राज्यसभा सांसद राजा देवेंद्र प्रताप सिंह सपरिवार मां मानकेश्वरी की पारंपरिक पूजा-अर्चना और पुन्नीबल अनुष्ठान में शामिल हुए।
रियासतकालीन परंपरा और आदिवासी भाइयों का दशहरा: सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह..
आयोजन के अवसर पर मीडिया से चर्चा करते हुए राज्यसभा सांसद राजा देवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि कर्मागढ़ में आयोजित होने वाला यह पर्व हमारे ग्रामीण जन और आदिवासी भाइयों का पारंपरिक दशहरा है। उन्होंने बताया कि रायगढ़ में सामान्य दशहरा संपन्न होने के बाद शरद पूर्णिमा के अवसर पर रियासत काल से ही कर्मागढ़ का यह विशेष दशहरा उत्सव मनाया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि यह पूजा पद्धति 400 से 500 वर्षों से भी अधिक पुरानी है, जो महाराज चक्रधर सिंह और राजा भूपदेव सिंह के समय से भी पहले से निरंतर चली आ रही है। सांसद श्री सिंह ने इस अवसर पर समस्त नगरवासियों और क्षेत्र की जनता को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए मां मानकेश्वरी से सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करने की प्रार्थना की। उन्होंने बताया कि इस पारंपरिक पुन्नीबल अनुष्ठान में राजमाता स्नेहलता देवी, उनकी बहन उर्वशी देवी सिंह और पुत्र सहित पूरा परिवार शामिल होने पहुंचा है।
बूढ़ादेव, खाड़ाबल और पुन्नीबल: 15 दिनों तक शक्ति का अनुष्ठान और 100 से अधिक बकरों की बलि..
कर्मागढ़ में 15 दिनों तक चलने वाली इस बलपूजा में गोंडवाना परंपरा के अनुरूप प्रथम दिन ‘बूढ़ा देव-राजाबल’ की पूजा की जाती है। इसके पश्चात महाअष्टमी के दिन ‘खाड़ाबल’ और शरद पूर्णिमा के दिन ‘पुन्नीबल’ का मुख्य आयोजन होता है। पूर्णिमा की अलसुबह से ही कांसे के लोटे में दूध, सराई पत्ता, सिंदूर, फूल माला और नारियल लिए श्रद्धालु कतारबद्ध होकर मां के दरबार में पहुंचते हैं। दोपहर बाद राजपरिवार की भव्य शोभायात्रा ढोल-नगाड़ों और युद्धकालीन पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के साथ मंदिर पहुंचती है, जिससे पूरा बीहड़ जंगल गुंजायमान हो उठता है।
राजपरिवार द्वारा माता के अभिषेक और पूजन के उपरांत गोंडवाना पद्धति से बैगा द्वारा सबसे पहले राजपरिवार की ओर से बलि अनुष्ठान संपन्न कराया जाता है। राजपरिवार की बलि समर्पित होने के पश्चात, जिन श्रद्धालुओं की मन्नतें पूरी हो चुकी होती हैं, वे अपनी श्रद्धा स्वरूप बकरों की बलि अर्पित करते हैं। इस दौरान करीब 100 से भी अधिक बकरों की बलि दी जाती है। बलि अनुष्ठान के समय बैगा पर मां की सवारी आने का रौद्र रूप और श्रद्धालुओं द्वारा उन पर दूध अर्पित कर आशीर्वाद लेने का दृश्य अगाध श्रद्धा और रोमांच का संचार करता है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनौती अवश्य पूरी होती है।
अंगूठियों का रहस्य और हिमगिर राजपरिवार से अटूट मितान संबंध..
मां मानकेश्वरी की सवारी के प्रमाण के संबंध में राजपरिवार की सदस्य उर्वशी देवी सिंह बताती हैं कि पूजा से पूर्व बैगा की अंगुलियों में चार बड़े छल्ले पहनाए जाते हैं, जो सामान्य स्थिति में बहुत ढीले होते हैं, लेकिन सवारी आते ही वे अंगुलियों में कस जाते हैं और सवारी उतरते ही स्वतः ढीले होकर निकल जाते हैं। इस पावन धाम से हिमगिर राजपरिवार का भी गहरा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक नाता जुड़ा हुआ है। सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि रियासतकाल में अंग्रेजों द्वारा टकौली (टैक्स) मांगे जाने पर हिमगिर के राजा ने अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया था, जिसके चलते अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बना लिया था। बंदी बनाए जाने के बाद हिमगिर के राजा बेड़ियों सहित वहां से निकल भागे और कर्मागढ़ स्थित मां मानकेश्वरी के दरबार पहुंचे, जहां माता के आशीर्वाद से उनकी बेड़ियां स्वतः टूट गईं। तभी से हिमगिर राजपरिवार ने मां मानकेश्वरी को अपनी ईष्ट देवी स्वीकार किया और रायगढ़ व हिमगिर राजपरिवार के बीच अटूट ‘मितान’ संबंध स्थापित हुआ, जो आज भी कायम है।
प्राकृतिक सौंदर्य, बाघों की उपस्थिति और प्राचीन शैलचित्रों की धरोहर..
तीन ओर से ऊंची-नीची सुरम्य पहाड़ियों से घिरे होने के कारण कर्मागढ़ में सूर्योदय लगभग 30 मिनट विलंब से और सूर्यास्त 35 मिनट पहले हो जाता है। स्थानीय बुजुर्गों और वन सुरक्षा समिति के अनुसार, पूर्व में नवरात्रि के दौरान मंदिर परिसर में रॉयल बंगाल टाइगर का जोड़ा भी स्वच्छंद घूमता देखा जाता था, जिसने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। इसके अलावा, कर्मागढ़ की ऐतिहासिक 'उषा कोठी' में पांच से दस हजार ईसा पूर्व के आदिमानवों द्वारा निर्मित बहुरंगी शैलचित्र आज भी मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र की अति-प्राचीन ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाते हैं। आस्था, इतिहास और जनजातीय संस्कृति को संजोए कर्मागढ़ का यह 15 दिवसीय शक्ति पर्व आज भी अपनी पूरी दिव्यता और मूल स्वरूप के साथ जीवंत बना हुआ है।
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