रायगढ़@TAKKAR न्यूज :- सरकारी मंचों से गूंजते गोसंरक्षण के बुलंद नारे और अखबारों के पन्नों पर चमकते लोकलुभावन वादों की असली हकीकत रायगढ़ की सड़कों पर लहूलुहान होकर दम तोड़ रही है। सत्ता प्रतिष्ठान गोसेवा और संवर्द्धन के नाम पर चाहे जितने कसीदे पढ़ ले, लेकिन जमीनी धरातल पर रायगढ़ जिले का पशु चिकित्सा विभाग इन दावों के ताबूत में आखिरी कील ठोकता नजर आ रहा है। एक तरफ हुक्मरानों के संकल्पों का शोर है, तो दूसरी तरफ शहर के चौक-चौराहों पर भूख, बीमारी और हादसों से कराहते बेजुबानों का दारुण क्रंदन। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि शहर का कोई भी कोना ऐसा नहीं बचा, जहां जख्मी और बेसहारा गोवंश अपनी बेबसी पर आंसू न बहा रहा हो, मगर जिम्मेदार अमला इन मूक प्राणियों की चीखों को अनसुना कर कागजी खानापूर्ति के गहरे सन्नाटे में सिमटा हुआ है।

कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच पसरा प्रशासनिक सन्नाटा

शहर के मुख्य मार्गों से लेकर रिहायशी वार्डों तक पसरा नजारा विभागीय संवेदनहीनता की खुली गवाही देता है। बेतरतीब दौड़ते वाहनों की चपेट में आकर लहूलुहान होती गायों के जख्मों पर मरहम लगाने वाला कोई नहीं है। बात केवल नियमित चिकित्सा तक सीमित नहीं है, बल्कि आपातकालीन व्यवस्था का ढांचा भी पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। सरकार द्वारा बड़े तामझाम के साथ शुरू की गई पशु एंबुलेंस सेवा रायगढ़ की सड़कों से पूरी तरह लापता है। जब भी किसी गंभीर रूप से घायल मवेशी को तत्काल उपचार की दरकार होती है, तो आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर सिर्फ औपचारिक घंटी बनकर रह जाते हैं। न कोई रिस्पॉन्स मिलता है और न ही मौके पर कोई त्वरित दल पहुंचता है। लाखों-करोड़ों के बजट से सजी योजनाएं दफ्तरों की फाइलों में सुरक्षित दफन हैं, जबकि हकीकत में तड़पते गोवंश की अंतिम सांसें प्रशासनिक लापरवाही पर तमाचा जड़ रही हैं।

सेवाभाव पर हावी सियासी पैंतरेबाजी और श्रेय की घिनौनी होड़

मवेशियों की यह दुर्गति केवल सड़कों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गोवंश के सुरक्षित ठिकाने के नाम पर बनाए गए गौठानों का यथार्थ भी बेहद शर्मनाक और विचलित करने वाला है। जो गौठान कभी गोसेवा, संरक्षण और संवर्धन का पवित्र केंद्र बनने चाहिए थे, वे आज संकीर्ण राजनीति के अखाड़े में तब्दील हो चुके हैं। जमीन पर पसीना बहाकर, चिलचिलाती धूप और बारिश में संसाधनों के घोर अभाव के बावजूद गोवंश की सेवा में जुटे सच्चे गोसेवकों और ग्रामीणों को हाशिए पर धकेल दिया गया है। उनकी निःस्वार्थ मेहनत को किनारे कर सत्ता और संगठन से जुड़े लोग केवल फोटो खिंचवाने, प्रचार बटोरने और श्रेय लूटने की अंधी दौड़ में मशगूल हैं। गौठानों के विकास की मूल भावना इस अवसरवादी राजनीति की भेंट चढ़ चुकी है।

बैनर-पोस्टरों की चमक में दम तोड़ती गोवंश की मूक संवेदनाएं

आज गौठानों के द्वारों पर सेवा और समर्पण की सुगंध के बजाय राजनीतिक आकाओं के बड़े-बड़े बैनर-पोस्टरों की नुमाइश ज्यादा नजर आती है। बेजुबानों के खाली पड़े चारे-पानी के बर्तनों के ठीक ऊपर लगे सियासी पोस्टर इस पूरी व्यवस्था की क्रूर विडंबना को उजागर करते हैं। जिन चेहरों को गोवंश के स्वास्थ्य और पोषण की चिंता होनी चाहिए थी, वे केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए इन गौठानों को प्रचार का जरिया बना रहे हैं। यह स्थिति बेहद गंभीर सवाल खड़े करती है कि क्या गोवंश की महत्ता केवल चुनावी भाषणों, घोषणापत्रों और सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने तक ही सीमित है? अगर मंशा सचमुच गोसेवा की है, तो फिर जमीन पर राहत देने के बजाय प्रचार का यह भौंडा प्रदर्शन किसके हित में किया जा रहा है?

रायगढ़ की सड़कों पर बिखरा यह मानवीय और प्रशासनिक दिवालियापन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कागजी योजनाओं से जमीनी दर्द का इलाज मुमकिन नहीं है। यदि पशु चिकित्सा विभाग ने अपनी गहरी तंद्रा को नहीं तोड़ा और हुक्मरानों ने गोसेवा के नाम पर चल रही ओछी राजनीति पर लगाम नहीं कसी, तो आने वाले दिनों में यह प्रशासनिक असंवेदनशीलता एक बड़े जनाक्रोश और गोवंश के सामूहिक विनाश का कारण बनेगी। जिम्मेदार तंत्र को यह समझना होगा कि बेजुबानों की यह आह किसी भी व्यवस्था के पतन के लिए काफी है।